अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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होता है। इससे सिद्ध होता है कि नाटकों की उत्पत्ति विभिन्न ऋतुओं में मनाये जाने वाले त्यौहारों के आधार पर हुई होगी।
( ४ ) जर्मनी के लोकप्रिय विद्वान पिशेल साहब ने नाटकों की उत्पत्ति कठपुतली के नाच से मान ली है। कठपुतली के नाच में उसका व्यवस्थापक नचाने वाला डोरी ( सूत्र ) पकड़कर पुतलियों को नचाता है। अतः इसे सूत्रधार कहते हैं। इस आधार पर सूत्रधार शब्द नाटकों में ज्यों का त्यों ले लिया गया है। अतः नाटकों की उत्पत्ति कठपुतली के नाच से हुई मानना सर्वथा संगत है।
( ५ ) इनके अतिरिक्त कुछ विद्वानों ने नाटकों की उत्पत्ति का स्रोत यूनानी नाट्य कला को माना है। इसके लिए वे प्रमाण में यवन शब्द से उत्पन्न यवनिका शब्द उपस्थित करते हैं। इस सम्बन्ध में इतना ही कहना पर्याप्त है कि संस्कृत नाटकों में जवनिका शब्द का व्यवहार होता है जिसका अर्थ है ढकने वाला पर्दा। अमरसिंह अपने अमरकोश में स्पष्ट लिखते हैं कि—जवनिका पटमण्डपम् ।
प्रोफेसर मैक्समूलर की खोज है कि संस्कृत नाटकों की उत्पत्ति का बीज ऋग्वेद के सम्पाद सूक्तों में मिलते हैं। इसके अनन्तर अनेक पाश्चात्य और पौर्वात्य विद्वान् भी ऋग्वेद के संवादों में नाटकोत्पत्ति की मूल सामग्री खोजने की चेष्टा किया करते हैं।
जर्मनी विद्वान् श्रोडर साहब भी मानते हैं कि पहले संवाद सूक्त गायन तथा नर्तन के साथ अभिनीत किये जाते थे। यज्ञ के कुछ विशिष्ट अवसरों पर नृत्य गीत आदि के साथ याज्ञिकों द्वारा इनका अभिनय किया जाता है। वस्तुतः संवाद सूक्तों को गायन में एक से अधिक व्यक्ति सम्मिलित होते थे, क्योंकि संवाद का कार्य एक व्यक्ति से संभव नहीं है। अतः संवाद सूक्तों में नाटकों के बीज निहित हैं। इस प्रकार नाट्य के बीज वेद ही में जो अङ्कुरित, पल्लवित तथा पुष्पित होकर हमारे सामने प्रतिफलित हैं। यह बात दूसरी है कि नाट्य को पूर्णता प्रदान करने में अन्य कई बातों ने भी सहयोग प्रदान किया होगा।
नाटकों के विकास का समय—
नाट्यशास्त्र के काल के विषय ने विद्वानों ने विभिन्न मत व्यक्त किये हैं। महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने नाटकों का समय दूसरी शताब्दी माना है। डा० कीथ का विचार है कि इसका समय तीसरी से पूर्व नहीं हो सकता है। डी० डी० सरकारने नाट्यशास्त्र का समय दूसरो के बाद माना है। मनमोहन घोष ने नाट्यशास्त्र का समय १००० और २००० के मध्य में निर्धारित किया है। वी० पी० काणे ने नाट्यशास्त्र का समय तीसरी शताब्दी के बाद संभव नहीं माना है।
शेक्सपीयर और कालिदास
कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल की तुलना प्रायः शेक्सपीयर के सुखान्त नाटक टेम्पेस्ट ( तूफान ) से की जाती है तथा शकुन्तला की समता उसकी नायिका मिराण्डा से की जाती है। दोनों नाटक उत्कृष्टकोटि की रचनाएँ हैं। किन्तु दोनों की कल्पना में मौलिक अन्तर है।
वस्तुतः शाकुन्तल के साथ प्रतिस्पर्धा करने वाला शेक्सपीयर का कोई नाटक नहीं है। शाकुन्तल का शिल्पसौन्दर्य अनिन्द्य है। इसकी ख्याति में इसके कलात्मक सौष्ठव का यथेष्ट योगदान है। जिस प्रकार पुष्प से किसी छोटी से छोटी पंखुड़ी को अलग कर देने