भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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भारतीय विद्वान् तथा पाश्चात्य जगत् के विद्वानों का मतभेद

भारतीय विद्वान् भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार नाटकों की उत्पत्ति त्रेतायुग में ब्रह्मा के द्वारा की गई मानते हैं। सत्ययुग में सभी प्राणी सुखी थे, उन्हें किसी तरह के मनोविनोद के साधनों की आवश्यकता नहीं थी, किन्तु त्रेतायुग में सांसारिक दुःखों का प्रादुर्भाव हो गया। इसलिये देव-दानव दोनों ने मिलकर लोकपितामह ब्रह्मा जी के पास जाकर प्रार्थना की कि भगवन् ! सांसारिक दुःखों से क्षणिक मुक्ति के लिए या मनोविनोद के निमित्त हमें कोई ऐसी वस्तु प्रदान करें जिससे हमारा मनोरंजन हो और हम कुछ देर के लिए दुःखों को भूल जाँय। तदनुसार ब्रह्मा जी उनकी प्रार्थना से सन्तुष्ट होकर उठ बैठे और ध्यानावस्थित हो गये। अनन्तर उन्होंने सांसारिक जीवों के मनोरञ्जनार्थ चारों वेदों के सहायता से नाट्य वेद को प्रगट किया है। ऋग्वेद से पाठ्य यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से सङ्गीत तथा अथर्ववेद से रस लेकर नाट्यकला की सृष्टि की¹ और इसे पञ्चम वेद कह कर प्रसिद्ध किया। इसमें भगवान् शिव ने ताण्डवनृत्य, पार्वतीजीने लास्य-नृत्य, और भगवान् विष्णु से चार वृत्तियों का समावेश कर इसमें पूर्ण कलात्मकता उत्पन्न कर दी। बाद स्वर्गलोक के शिल्पी विश्वकर्मा ने एक रमणीय रंगमञ्च का निर्माण किया। सर्वप्रथम इन्द्रध्वज पर्वपर त्रिपुरदाह तथा समुद्रमन्थन नाटक अभिनीत हुए। ब्रह्मा जी ने नाटक खेलने के लिए भरत मुनिको एक सौ अप्सरायें भी इसलिए सौंप दी कि मुनि उन्हें नाट्यकला की व्यावहारिक शिक्षा दें। अनन्तर इस कला को मर्त्य-लोक तक पहुँचाने का भार भरत मुनि को सौंप दिया गया। इस प्रकार द्युलोक से यह नाट्यकला मर्त्यलोक में पहुँच गई। इस प्रकार भारतीय परम्परा नाटकों की उत्पत्ति दैवी मानती है।

पाश्चात्य जगत् के विद्वान् भारतीयों का पूर्वोक्त मत मानने को तैयार नहीं। अतः वे नाटकों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक अटकलबाजियाँ किया करते हैं :—

( १ ) विदेशी विद्वान् डा० रिजवे सारे संसार में नाटकों की उत्पत्ति मृतात्माओं के प्रति व्यक्त की गई श्रद्धा से मानते हैं। उनका मत है कि पहले मृत व्यक्तियों के शव सुरक्षित रखे जाते थे तथा उनके श्राद्ध के दिन उनके पूर्व जीवन का प्रदर्शन किया जाता था। अतः उसी परम्परा को रामलीला एवं कृष्णलीला के सम्बद्ध कर भारत में नाटक खेलने की प्रथा चलाई गई।

( २ ) डा० हिलवैण्ड और स्टेन कानो का कहना है कि पूर्व भारत में पहले लोकप्रिय स्वांग अधिक प्रचलित थे, उन्हीं से नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ। इन स्वांगों में रामायण महाभारत और पुरुषों के आख्यान-उपाख्यानों को मिलाकर ही नाटकों की कथावस्तु का चयन किया गया होगा।

( ३ ) डा० कीथ ने ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ होने वाले उत्सवों तथा नृत्यगानों से नाटकों की उत्पत्ति माना है। उनका विचार है कि पाश्चात्य जगत् में मई मास अत्यन्त आनन्दप्रद होता है। इसी समय से वहाँ अधिक उत्सव मनाये जाते हैं। एक लम्बा बांस गाड़कर उसके नीचे इकट्ठे होकर स्त्री-पुरुष मिलकर नाचते हैं, गाते हैं, और आनन्द मनाते हैं। भारतवर्ष में भी वर्षाकालीन इन्द्रध्वज रथयात्रा महोत्सव भी इसी ढंग का


१. जग्राह नाट्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतमेव च।
यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥ भ. ना. ७।