भारतकोश
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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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भारतीय विद्वान् तथा पाश्चात्य जगत् के विद्वानों का मतभेद

भारतीय विद्वान् भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार नाटकों की उत्पत्ति त्रेतायुग में ब्रह्मा के द्वारा की गई मानते हैं। सत्ययुग में सभी प्राणी सुखी थे, उन्हें किसी तरह के मनोविनोद के साधनों की आवश्यकता नहीं थी, किन्तु त्रेतायुग में सांसारिक दुःखों का प्रादुर्भाव हो गया। इसलिये देव-दानव दोनों ने मिलकर लोकपितामह ब्रह्मा जी के पास जाकर प्रार्थना की कि भगवन् ! सांसारिक दुःखों से क्षणिक मुक्ति के लिए या मनोविनोद के निमित्त हमें कोई ऐसी वस्तु प्रदान करें जिससे हमारा मनोरंजन हो और हम कुछ देर के लिए दुःखों को भूल जाँय। तदनुसार ब्रह्मा जी उनकी प्रार्थना से सन्तुष्ट होकर उठ बैठे और ध्यानावस्थित हो गये। अनन्तर उन्होंने सांसारिक जीवों के मनोरञ्जनार्थ चारों वेदों के सहायता से नाट्य वेद को प्रगट किया है। ऋग्वेद से पाठ्य यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से सङ्गीत तथा अथर्ववेद से रस लेकर नाट्यकला की सृष्टि की¹ और इसे पञ्चम वेद कह कर प्रसिद्ध किया। इसमें भगवान् शिव ने ताण्डवनृत्य, पार्वतीजीने लास्य-नृत्य, और भगवान् विष्णु से चार वृत्तियों का समावेश कर इसमें पूर्ण कलात्मकता उत्पन्न कर दी। बाद स्वर्गलोक के शिल्पी विश्वकर्मा ने एक रमणीय रंगमञ्च का निर्माण किया। सर्वप्रथम इन्द्रध्वज पर्वपर त्रिपुरदाह तथा समुद्रमन्थन नाटक अभिनीत हुए। ब्रह्मा जी ने नाटक खेलने के लिए भरत मुनिको एक सौ अप्सरायें भी इसलिए सौंप दी कि मुनि उन्हें नाट्यकला की व्यावहारिक शिक्षा दें। अनन्तर इस कला को मर्त्य-लोक तक पहुँचाने का भार भरत मुनि को सौंप दिया गया। इस प्रकार द्युलोक से यह नाट्यकला मर्त्यलोक में पहुँच गई। इस प्रकार भारतीय परम्परा नाटकों की उत्पत्ति दैवी मानती है।

पाश्चात्य जगत् के विद्वान् भारतीयों का पूर्वोक्त मत मानने को तैयार नहीं। अतः वे नाटकों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक अटकलबाजियाँ किया करते हैं :—

( १ ) विदेशी विद्वान् डा० रिजवे सारे संसार में नाटकों की उत्पत्ति मृतात्माओं के प्रति व्यक्त की गई श्रद्धा से मानते हैं। उनका मत है कि पहले मृत व्यक्तियों के शव सुरक्षित रखे जाते थे तथा उनके श्राद्ध के दिन उनके पूर्व जीवन का प्रदर्शन किया जाता था। अतः उसी परम्परा को रामलीला एवं कृष्णलीला के सम्बद्ध कर भारत में नाटक खेलने की प्रथा चलाई गई।

( २ ) डा० हिलवैण्ड और स्टेन कानो का कहना है कि पूर्व भारत में पहले लोकप्रिय स्वांग अधिक प्रचलित थे, उन्हीं से नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ। इन स्वांगों में रामायण महाभारत और पुरुषों के आख्यान-उपाख्यानों को मिलाकर ही नाटकों की कथावस्तु का चयन किया गया होगा।

( ३ ) डा० कीथ ने ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ होने वाले उत्सवों तथा नृत्यगानों से नाटकों की उत्पत्ति माना है। उनका विचार है कि पाश्चात्य जगत् में मई मास अत्यन्त आनन्दप्रद होता है। इसी समय से वहाँ अधिक उत्सव मनाये जाते हैं। एक लम्बा बांस गाड़कर उसके नीचे इकट्ठे होकर स्त्री-पुरुष मिलकर नाचते हैं, गाते हैं, और आनन्द मनाते हैं। भारतवर्ष में भी वर्षाकालीन इन्द्रध्वज रथयात्रा महोत्सव भी इसी ढंग का


१. जग्राह नाट्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतमेव च।
यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥ भ. ना. ७।

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होता है। इससे सिद्ध होता है कि नाटकों की उत्पत्ति विभिन्न ऋतुओं में मनाये जाने वाले त्यौहारों के आधार पर हुई होगी।

( ४ ) जर्मनी के लोकप्रिय विद्वान पिशेल साहब ने नाटकों की उत्पत्ति कठपुतली के नाच से मान ली है। कठपुतली के नाच में उसका व्यवस्थापक नचाने वाला डोरी ( सूत्र ) पकड़कर पुतलियों को नचाता है। अतः इसे सूत्रधार कहते हैं। इस आधार पर सूत्रधार शब्द नाटकों में ज्यों का त्यों ले लिया गया है। अतः नाटकों की उत्पत्ति कठपुतली के नाच से हुई मानना सर्वथा संगत है।

( ५ ) इनके अतिरिक्त कुछ विद्वानों ने नाटकों की उत्पत्ति का स्रोत यूनानी नाट्य कला को माना है। इसके लिए वे प्रमाण में यवन शब्द से उत्पन्न यवनिका शब्द उपस्थित करते हैं। इस सम्बन्ध में इतना ही कहना पर्याप्त है कि संस्कृत नाटकों में जवनिका शब्द का व्यवहार होता है जिसका अर्थ है ढकने वाला पर्दा। अमरसिंह अपने अमरकोश में स्पष्ट लिखते हैं कि—जवनिका पटमण्डपम् ।

प्रोफेसर मैक्समूलर की खोज है कि संस्कृत नाटकों की उत्पत्ति का बीज ऋग्वेद के सम्पाद सूक्तों में मिलते हैं। इसके अनन्तर अनेक पाश्चात्य और पौर्वात्य विद्वान् भी ऋग्वेद के संवादों में नाटकोत्पत्ति की मूल सामग्री खोजने की चेष्टा किया करते हैं।

जर्मनी विद्वान् श्रोडर साहब भी मानते हैं कि पहले संवाद सूक्त गायन तथा नर्तन के साथ अभिनीत किये जाते थे। यज्ञ के कुछ विशिष्ट अवसरों पर नृत्य गीत आदि के साथ याज्ञिकों द्वारा इनका अभिनय किया जाता है। वस्तुतः संवाद सूक्तों को गायन में एक से अधिक व्यक्ति सम्मिलित होते थे, क्योंकि संवाद का कार्य एक व्यक्ति से संभव नहीं है। अतः संवाद सूक्तों में नाटकों के बीज निहित हैं। इस प्रकार नाट्य के बीज वेद ही में जो अङ्कुरित, पल्लवित तथा पुष्पित होकर हमारे सामने प्रतिफलित हैं। यह बात दूसरी है कि नाट्य को पूर्णता प्रदान करने में अन्य कई बातों ने भी सहयोग प्रदान किया होगा।

नाटकों के विकास का समय—

नाट्यशास्त्र के काल के विषय ने विद्वानों ने विभिन्न मत व्यक्त किये हैं। महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने नाटकों का समय दूसरी शताब्दी माना है। डा० कीथ का विचार है कि इसका समय तीसरी से पूर्व नहीं हो सकता है। डी० डी० सरकारने नाट्यशास्त्र का समय दूसरो के बाद माना है। मनमोहन घोष ने नाट्यशास्त्र का समय १००० और २००० के मध्य में निर्धारित किया है। वी० पी० काणे ने नाट्यशास्त्र का समय तीसरी शताब्दी के बाद संभव नहीं माना है।

शेक्सपीयर और कालिदास

कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल की तुलना प्रायः शेक्सपीयर के सुखान्त नाटक टेम्पेस्ट ( तूफान ) से की जाती है तथा शकुन्तला की समता उसकी नायिका मिराण्डा से की जाती है। दोनों नाटक उत्कृष्टकोटि की रचनाएँ हैं। किन्तु दोनों की कल्पना में मौलिक अन्तर है।

वस्तुतः शाकुन्तल के साथ प्रतिस्पर्धा करने वाला शेक्सपीयर का कोई नाटक नहीं है। शाकुन्तल का शिल्पसौन्दर्य अनिन्द्य है। इसकी ख्याति में इसके कलात्मक सौष्ठव का यथेष्ट योगदान है। जिस प्रकार पुष्प से किसी छोटी से छोटी पंखुड़ी को अलग कर देने

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से उसका सौन्दर्य क्षतिग्रस्त हो जाता है उसी प्रकार शाकुन्तल में से किसी पंक्ति या किसी शब्द को हटा देना उसके सौन्दर्य शरीर को आघात पहुँचाने के अतिरिक्त कुछ नहीं है। कवि ने एक-एक शब्द एवं एक-एक वाक्य बड़ी सावधानी से सजाया है। फिर भी शाकुन्तला की विश्वव्यापी ख्याति का मूल कारण उसका जीवन दर्शन है। उसमें संशय-संघर्ष का तूफान नहीं है, प्रत्युत परमशान्ति का प्रकाश है। शकुन्तला तथा दुष्यन्त दोनों ने प्रमाद किया है तथा परिणामतः पश्चात्ताप तथा तपस्या अग्नि में तपकर निर्मल हो गये हैं। प्रेम एवं नैतिक दायित्व का ह्रास नहीं है और दोनों परस्पर मिल कर समरस बन गये हैं विषाद एवं निराशा के बाद दोनों जिस मङ्गलमय परिपक्व जीवन में प्रवेश कर गये हैं वहाँ आध्यात्मिक शान्ति है जो संस्कृत नाटकों की विशेषता है।

वस्तुतः कालिदास की काव्यात्मक प्रतिभा जितनी पटभूमि को आच्छन्न करती है उतनी शेक्सपीयर की प्रतिभा की पहुँच के बाहर है। कालिदास ने महाकाव्य तथा नाटकों का प्रणयन किया है जब कि शेक्सपीयर की प्रतिभा केवल नाट्य कला के सजाने में ही सीमित है। कालिदास के काव्यों में भारतीय संस्कृति के चिन्तन आदर्श अनवद्य रूप में ध्वनित हुए हैं और वे सच्चे अर्थों में भारतवर्ष के राष्ट्रीय कवि हैं।

जहाँ तक नाटकीय उपलब्धियों का प्रश्न है शेक्सपीयर सफल हैं। जीवन की विपन्नता एवं विशदता को चित्रित करने में तथा इतिहास के अतीत को सजीवता के साथ नाटकीय अभिव्यक्ति देने में शेक्सपीयर अद्वितीय हैं। किन्तु अन्य दिशाओं में कालिदास शेक्सपीयर से आगे बढ़ गये हैं। प्रकृति का चित्रण तथा मानव जीवन के सामरस्य का निदर्शन जैसा कालिदास की कृतियों में दृष्टिगोचर होता है वैसा शेक्सपीयर की रचनाओं में खोजने पर भी नहीं मिलेगा। इसी प्रकार जीवन के जो आध्यात्मिक तत्त्व कालिदास कृतियों में हैं वह शेक्सपीयर की कृतियों में नहीं हैं। कालिदास सच्चाई एवं सहानुभूति के दरवाजे से विश्व के हृदय में प्रवेश करते हैं। मानव मन की शाश्वत अभिलाषाओं का चित्रण सटीक तथा सर्वाङ्गपूर्ण कालिदास की कृतियों में उद्वेलित है तथा सभी के हृदयों को आवर्जित करती रहती है।

कालिदास की शैली

कालिदास वैदर्भीरीति के कुशल कवि हैं। उनकी रचनाओं में व्यञ्जनाशक्ति की चारुता, प्रसादगुण की प्रचुरता पाठकों के हृदय को चमत्कृत कर देती है। जिस प्रकार स्वच्छ जल में पड़ी हुई वस्तु स्पष्ट दिखाई पड़ती है उसी प्रकार उनके ग्रन्थों में अर्थ निर्मल एवं स्पष्ट प्रतीत होते हैं। इनकी कृतियों में प्रसादगुण के साथ-साथ सरसता के दर्शन होते हैं। यमक अलंकार के प्रति रघुवंश के नवम सर्ग में उनकी रुचि दिखलाई पड़ती है और द्रुतविलम्बित छन्द का अन्तिम चरण यमकमय किया गया है, पर वह भी सीमित स्थान में। उससे प्रसादगुण की कोई क्षति नहीं पहुँचती। उत्प्रेक्षा, अर्थान्तरन्यास आदि अलंकारों का प्रयोग भी उन्होंने बड़ी सफलता के साथ किया है, पर इन सबसे बढ़कर उनकी प्रसिद्धि उपमाओं के लिए है। अनुरूपता तथा कमनीयता उनमें कूट-कूट कर भरी पड़ी है। कवि की सबसे सुन्दर उपमा कुमारसंभव के पञ्चम सर्ग के अन्त में आई है। भगवान शङ्कर अपने निमित्त तप कर रही उमा को अपनी ही निन्दा करके उसे क्रुद्ध कर देते हैं। उन्हें न पहचान कर जब वह अन्यत्र जाने लगती है तब वे अपने वास्तविकरूप में प्रगट होकर उसे चौंका देते हैं। वह स्तब्ध रह जाती है, शरीर कांपने लगता है, आगे

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बढ़ा हुआ पैर उधर में ही रह जाता है। उस समय वह उस नदी की तरह न तो आगे बढ़ पाती है और न ही रुक पाती है जो अपने सम्मुख उपस्थित पर्वत की बाधा पाकर न बढ़ पाती है और न रुक पाती है—

तं वीक्ष्य वेपथुमती सरसाङ्गयष्टिः निक्षेपणाय पदमुद्धृतमुद्वहन्ती।
मार्गाचलव्यतिकराऽऽकुलितेव सिन्धुः शैलाधिराजतनया न ययौ न तस्थौ ॥

छन्दों के प्रयोग में कालिदास की दक्षता है। वे इन्द्रवज्रा, उपजाति, वंशस्थ, और अनुष्टुप् छन्दों के प्रयोग में सिद्धहस्त हैं। जहाँ मेघदूत में उन्होंने केवल मन्दाक्रान्ता छन्द से ही कमाल दिखा दिया है वहाँ रघुवंश में छन्दों की विविधता की निपुणता दिखाई पड़ती है।

संस्कृत साहित्य में नाटकों की सजीव तथा मूर्त परम्परा का अनुवर्तन महाकवि भास से होता है। नाटकों की निर्माणपरम्परा में भास के बाद महाकवि कालिदास का क्रम आता है। संस्कृत साहित्य के उपवन में कालिदास का समागम एक वसन्तदूत के रूप में माना गया है जिसके कारण उस उपवन का कोना-कोना पुष्पित हो उठता है। उन्होंने संस्कृत भाषा को वाणी दी, नये साज सजाए, नये भाव, नयी दिशाएँ, नये विचार और नयी-नयी पद्धतियाँ दीं। इसी प्रकार कविवर कालिदास सबसे बड़े नाटककार और सबसे बड़े महाकवि हैं। कालिदास के सम्बन्ध में विश्वकवि गोटे ने कहा है कि स्वर्ग एवं मर्त्य का जो मिलन है उसे कालिदास ने सहज ही सम्पादित कर दिया है तथा उन्होंने फूल को सहज भाव से फल के रूप से परिणत कर दिया है। मर्त्य की सीमा को उन्होंने इस प्रकार स्वर्ग से मिला दिया है कि बीच का व्यवहार किसी को दृष्टिगोचर नहीं होता।

नाटकों के क्षेत्र में महाकवि ने 'मालविकाग्निमित्र', 'विक्रमोर्वशीय' और 'अभिज्ञान-शाकुन्तल' इन कृतियों का प्रणयन किया है। नाटकीय नियमों की दृष्टि से कथानिर्वाह, घटनाक्रम, पात्र-योजना आदि सभी में उनके असाधारण कौशल की छाप है। शाकुन्तल उनकी अन्तिम कृति है, किन्तु उसकी गणना आज विश्व-साहित्य की पहली कृतियों में की जाती है। प्रेम और सौन्दर्य का ऐसा सरस, हृदयग्राही एवं मर्मस्पर्शी चित्रण अन्यत्र देखने को नहीं मिलता है। उनमें ओज के साथ मनोज्ञता और लघुत्व के साथ ही भावप्राञ्जलता का अद्भुत समन्वय विद्यमान है।

जन्माष्टमी, सं० २०३७ वि०
भारतीय साहित्य शोध संस्थान
वाराणसी

विनीत
डा० श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी

संस्कृते कथासारसंग्रहः

प्रथमेऽङ्के कथासारांशः

अथ नाटकस्यादौ पूर्वरङ्गाङ्गभूतामाशीरूपां 'या सृष्टिः स्रष्टुराद्या' इत्यात्मिकामष्टपदीं नान्दीं विघ्नव्यूह निरासाय पठति सूत्रधारः। ततः सूत्रधारो नटीं ब्रूते आर्ये ! कालिदास-ग्रथितवस्तुनोऽभिनयेनाभिज्ञानशाकुन्तलनामकेन नाटकेनोपस्थातव्यमिति तदनु चिरप्रवृत्त-मुपभोगक्षमं ग्रीष्मकालमधिकृत्य नटी गायति। मनोहारिणा तेन गीतेन मृगेण राजा दुष्यन्त इवाहमपि हठात् मनोहारिणा गीतेन हृतोऽस्मीति प्रस्तौति प्रस्तावनायां सूत्रधारः—

तवास्मि गीतरागेण हारिणा प्रसभं हृतः।
एष राजेव दुष्यन्तः सारङ्गेणातिरंहसा ॥ ५ ॥

तदनन्तरं मृगवधाय यावदसौ राजा धनुषि शरं संधत्ते तावदेव द्वौ वैखानसौ 'आश्रममृगोऽयं न हन्तव्यो न हन्तव्य' इति निषेधयन्तौ दुष्यन्तं निवारयतः।

सोऽपि तदादेशानुसारं सद्यः सायकं प्रतिसंगृहीतवान्। ततः ताभ्यां स्वात्मानुगुणं चक्रवर्तिनं तनयं प्राप्नूहीति शुभाशिषं प्रदाय कण्वाश्रमे प्रवेशस्यानुरोधं कृत्वा समिदाहरणाय प्रस्थितौ। ततो राजा तपोवनोपरोधो मा भूदिति रथादिकं बहिः संस्थाप्य दक्षिणबाहुस्पन्दन-पूर्वकं विनीतवेषेणाश्रमं प्रविश्य तत्र सखीभ्यां समेतामाम्रान् सिञ्चन्तीं शकुन्तलामालोक्य। आत्मगतं चिन्तयति—

इदं किल व्याज मनोहरं वपुस्तपः क्षमं साधयितुं य इच्छति।
ध्रुवं स नोलोत्पल पत्रधारया शमीलतां छेत्तुमृषिर्व्यवस्यति ॥ १८ ॥
सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं
मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति।
इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी
किमिव मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ॥ २० ॥

अत्रान्तरे भ्रमरपीडिता शकुन्तला आत्मानं परित्रातुं सख्यौ प्रार्थितवती। ततस्तयोः सपरिहासं भणति—के आवां परित्रातुं। राजरक्षितव्यानि तपोवनानि। अतो दुष्यन्तमाक्रन्द। स एवागत्य त्वां परित्रास्यति। अवसरं ज्ञात्वा दुष्यन्तस्य स्वात्मप्रकाशनम्, ससंभ्रमां शकुन्तलां वीक्ष्यानसूयाप्रियंवदयोः—राज्ञ आतिथ्यसामग्रीसञ्चयार्थं शकुन्तलायै आदेश-दानम्। ततो राजा—भवतीनां सूनृतया गिरा एव कृतमातिथ्यम्। ततः सखीसकाशात् तन्नामजन्माद्यवगम्य तदीयरूपलावण्याकृष्टो राजा ब्रवीति—

मानुषीषु कथं वा स्यादस्य रूपस्य संभवः।
न प्रभातरलं ज्योतिरुदेति वसुधातलात् ॥ २४ ॥

इदं श्रुत्वा शकुन्तलाऽधोमुखी तिष्ठति।

ततो नेपथ्ये—भो भोः तपस्विनः मृगयाविहारी राजा दुष्यन्तः प्रत्यासन्नो वरीवर्ति। अतः तपोवनसत्वरक्षायै सज्जीभवन्तु भवन्त इति श्रवणम्। किमस्मदन्वेषिणः पौराः तपोवनमुप-रुन्धन्ति। अतः आश्रमपीडा यथा न भवेत्तथा प्रयतिष्यामहे। दुष्यन्तरथदर्शनसंभ्रान्तस्य कस्यचिद्वन्यगजस्य तपोवनप्रवेशं श्रुत्वा संभ्रान्ता मुनिकुमार्यः उत्तस्थुः कथयामासुतश्च

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ततो मुनिभिरनुज्ञातो दुष्यन्तः दूरीकरणाय श्रमक्लममनोविनोदाय च क्व गच्छामि ? अथ शशाङ्कमदनानुद्दिश्य कामव्यथां वर्णयन् सखीपरिवृता शकुन्तला मालिनी नदीतटे इमामुग्रां वेलामतिवाहयतीति तामन्विष्यन् मालिनीतीरमाययौ तत्र लतामण्डपे कुसुमास्तरणं शिलापट्टमधिशयानां सखीभ्यां नलिनीदलादिभिरुपचार्यमाणां शकुन्तलामक्षिलक्ष्यी चकार । बलवदस्वस्थशरीरायाः शकुन्तलायाः सखीभ्यां सह विश्रम्भालापांश्च संश्रोतुकामो नृपः शाखान्तरितो भूत्वाऽतिष्ठत् । ततः सखीभ्यां तदवस्थां ज्ञातुं पृष्टा सा ब्रवीति—सख्यौ तपोवनेऽस्मिन् राजर्षेः दुष्यन्तस्यागमनादेवाहमिमां दशां गतास्मि । स एव मम शरणमिति निशम्य प्रियम्वदा मदनलेखात्मकं प्रयोगं रुचिरं विचार्य देवताप्रसादोपदेशेन राजानं प्रति तत्प्रापणकार्यं स्वयं स्वीकरोति । ततो मदनलेखं विरच्य शकुन्तलया वाच्यमानं निशम्य सन्तुष्टान्तरात्मा दुष्यन्तः तमेवावसरं प्रकटयितुं मत्वा सहसोपसृत्य स्वीयां चानिर्वर्णनीयां दशां ताः प्रख्यापयति । ततः सख्यौ आहतुः-महाभाग ! एषा नौ प्रियसखी शकुन्तलां भवन्तमेवोद्दिश्य मदनेनेदं दशान्तरं नीता । तदर्हस्यभ्युपपत्या जीवितमस्या अवलम्बितुं । यथा नेयं बन्धुजनशोच्या भवति तथा करोतु महाराज-इत्युक्त्वा मृगपोतकं तन्मात्रा सह मेलयितुं व्याजीकृत्य लतामण्डपाद् बहिर्निर्यग्मतुः । अथ सख्योरनुसरणपरा शकुन्तला राज्ञा बलान्निर्वारिता । ततः किञ्चित्कालं चिरप्रार्थितवाञ्छासाफल्येन सुखितयोः परमानन्दमनुभवतोः तयोः स्वस्थोपलम्भनार्थं शान्त्युदकहस्ता गौतमी शकुन्तलामाह्वयन्ती तमेव प्रदेशमनुसृत्य । प्रोक्तवती वत्से ! अनेन दर्भोदकेन ते शरीरं निर्बाधं भविष्यति । ततो जाते ! परिणतो दिवसः सायंकालः संजातः, उटजं गच्छामः इति सर्वाः प्रस्थिताः । अथ दुःखेन तामनुसरन्ती ।

सा लतावलयव्याजेन राजानमवोचत्-लतावलय ! सन्तापहारक ! आमन्त्रये त्वां पुनः परिभोगाय । एवं सापदेशं राजानमुक्त्वा निर्ययौ । तेनातिखिन्नमना राजा तत्रैव प्रेयसी-विहृतस्थलादि स्मारं स्मारं कथंचिदतिवाह्य प्रियापरिभुक्तमुक्ते लतामण्डपे मुहूर्ते स्थित्वा विषण्णः सन् सवनकर्मव्यापृतानामृषीणां निशाचरभयवारणायागात् —

सायन्तने सवनकर्मणि संप्रवृत्ते वेदीं हुताशनवतीं परितः प्रयस्ताः । छायाश्चरन्ति बहुधा भयमादधानाः सन्ध्यापयोदकपिशाः पिशिताशनानाम् ॥ २४ ॥

सत्यवसरे दुष्यन्तो गान्धर्वविवाहविधिना शकुन्तलामुद्वाह्य तया साकं किञ्चित्कालमतिवाह्य ऋषिभिरनुज्ञातः स्वां राजधानीं जिगमिषन् तस्यै स्वनामाङ्कितमङ्गुलीयकं प्रदाय प्रावोचत् प्रिये ! अत्र प्रत्यहमेकमेकं मदीयं नामाक्षरं गणनीयं यावदन्तं गच्छति तावद् ममान्तःपुरप्रापकः कश्चन विश्वस्तो जनः तव समीपमुपैष्यतीत्येवमाश्वास्य हस्तिनापुरं चचाल ।

चतुर्थेऽङ्के कथासारांशः

अस्मिन् चतुर्थेऽङ्के कुसुमवचयव्यग्रयोः प्रियम्वदाऽनसूययोः सख्योः मिथः संवादेन ज्ञायते यत्तपोवने समारब्धस्य यज्ञस्य निर्विघ्नं समाप्तौ मुनिभिर्विसर्जितः राजा दुष्यन्तः स्वां राजधानीं प्रतिष्ठाय स्वान्तःपुरजनेन गान्धर्वविधिना परिणीतां सखीं शकुन्तलां संस्मरिष्यन् वेति । तमेव राजानं ध्यायन्ती शकुन्तला खिन्नमना उटजेऽवतस्थे सन्निधावेव वर्तते ।

एतस्मिन्नेवावसरे—आः अतिथिपरिभाविनि । यं स्वं प्रियमनन्यमनस्कतया विचिन्तयन्ती-

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आतिथ्येन द्वारदेशे समुपस्थितं मां तपोधनं न वेत्सीत्यतो बोधितोऽपि स ते प्रियः विवाहवृत्तं न स्मरिष्यतीति शप्त्वा सुलभकोपो महर्षिः दुर्वासा प्रतिनिवृत्तः।

विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा तपोधनं वेत्सि न मामुपस्थितम्। स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन् कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव ॥ १ ॥

इमं व्यतिकरं निशम्य अनसूया सपदि मुनिप्रसादनाय प्रियम्वदां प्राहिणोत्। तया च मुनिचरणयोः प्रणिपत्य भूयो भूयोऽनुनीतो महर्षिरवादीत्-मम शापोऽन्यथा न भावी, किन्त्वभिज्ञानाभरणदर्शनेन स शापो निवर्तिष्यते इत्यभिधायान्तर्हितो जातः। सख्यौ च नगरगमनसमये राज्ञा शकुन्तलायै प्रदत्ताङ्गुलीयकं स्मृत्वा शकुन्तलाचित्तोद्वेगभिया तच्छापवृत्तं तस्यै न निवेदितवत्यौ।

अथ सोमतीर्थयात्रतः प्रतिनिवृत्तेन महर्षिणा कण्वेनाग्निगृहे प्रवेशे कृतेऽशरीरिण्या व्योमवाचा शकुन्तलाया दुष्यन्तेन साकं संवृत्तं वृत्तमवोचि। ततो महर्षिः व्रीडावनम्रां शकुन्तलामाश्लिष्य तत्कर्माभिनन्द। पतिगृहं प्रेषयितुकामः तदोय प्रस्थानमङ्गलविधिमादिदेश च। गौतम्यादिभिः जरतीभिः तापसीभिराशीर्वचनपूर्वकं निर्वर्तितप्रस्थानकौतुका, सखीकृतमङ्गलसमारम्भे च शकुन्तला मालिन्यां स्नानादिकृत्यं कृत्वाऽऽगतं तातकण्वं प्रणनाम। स च प्रेमगद्गदया वाचा—जाते! शकुन्तले! आत्मसदृशेन भर्त्रा त्वं संगतेति प्रसीदतिंतमां मे चेतः। पतिगृहं समुपस्थाय मर्यादापालनपूर्वकं पति-सपत्नी-श्वसुर-श्वश्रू-परिजनादीनां सन्तोषकरकार्यं कार्यमित्यादिश्य, ययातेः शर्मिष्ठेव भर्तुः बहुमता भवेत्याशिषमदात्। ततः शकुन्तला तातानुरोधेन हुताग्नीन प्रदक्षिणीकृत्य वनदेवताश्च प्रणम्य विभिन्नैर्वृक्षादिभिर्दत्तानि दिव्यानि आभरणवस्त्रादीनि परिधाय स्नेहविक्कलबेन कण्वेन, वयस्याभ्यां चानुगम्यमाना पदे पदे स्खलन्ती प्रतस्थे। उदकान्तं प्रियजनोऽनुगन्तव्य इति शास्त्रनियमेनोदकान्तं गत्वा महर्षिः कण्वो दुष्यन्ताय समुचितं सन्दिष्य शकुन्तलामपि प्रसङ्गोचितमुपदिदाव। सख्यावपि प्रियम्वदानसूये—प्रियसखि! शकुन्तले! यदि स राजा प्रत्यभिज्ञानमन्थरो भवेत्तदा नगरगमनसमये तुभ्यमर्पितं तदङ्गुलीयकं तस्मै दर्शयितव्यमिति संदिदिशतुः।

ततो गौतमी-शाङ्गंरवशारद्वतैः सह शकुन्तला हस्तिनापुरं प्रतस्थे, कण्वश्च प्रियम्वदानुसूयाभ्यां साकं शकुन्तलाशून्यं स्वाश्रमं प्रति परावृत्तः स्नेहप्रवाहाविमर्शपूर्वकं प्रावोचत्—

अर्थो हि कन्या परकीय एव तामद्य संप्रेष्य परिग्रहीतुः। जातो ममायं विशदः प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा ॥ २१ ॥

पञ्चमेऽङ्के कथासारांशः

अथास्मिन्नङ्के वयस्येन माधव्येन सह राजधान्यां नागरिकवृत्या लयतालवद्धं हंसपदिकागीतं निशम्य तदर्थे स्मारं स्मारं कामप्यन्तर्व्यथामनुभवति राजा दुष्यन्तः। अत्रैवान्तरे कुलपतेः कण्वस्यादेशमादाय तपोवनात् सस्त्रीकाः तपस्विनः समायाता इति कञ्चुकी निवेदयति। ते श्रौतेन विधिना सत्कृत्य यज्ञशालायां प्रवेशयितव्या इत्यादिश्य राजापि तान प्रतिपालयितुं तत्रोपतिष्ठते। ततः सोमरातः पुरोहितो राजाज्ञया श्रौतेन विधिना तान् सत्कृत्य यज्ञशालामुपस्थापयत्। तत्र प्रविष्टास्ते आशीर्वचनपूर्वकं राज्ञे अवगुण्ठनवती शकुन्तलामधिकृत्य कण्वस्य सन्देशं न्यवेदयन्—

४ शा० भू०

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सतीमपि ज्ञातिकुलैकसंश्रयां जनोऽन्यथा भर्तृमतीं विशङ्कते । अतः समीपे परिणेतुरिष्यते प्रियाप्रिया वा प्रमदा स्वबन्धुभिः ॥ १७ ॥

परं महर्षेः दुर्वाससः शापप्रभावेण स शकुन्तलायाः परिणयविधिं विसस्मार अकथयच्च- भो भोः तपस्विनः ! निपुणं विचारयन्नपि न स्मरामि अस्या देव्या पाणिग्रहणम् । तत्कथ- मिमामभिव्यक्तसत्त्वलक्षणां प्रति आत्मानं क्षेत्रिणं मन्यमानः प्रतिपत्स्ये । तत्कण्वस्यान्तेवा- सिभ्यां साक्षेपेषूक्तेष्वपि शकुन्तलाया अवगुण्ठनापनयनानन्तरं प्रत्यक्षीकृत्यापि यदा नाङ्गी चकार तदाऽभिज्ञानेन तस्य शङ्कामपनेतुं शकुन्तला प्रवृत्ते, परमङ्गुलीयकशून्यामङ्गुलीं दृष्ट्वा परं विषण्णा सती तस्मै दीर्घापाङ्गमृगशावक जलपानप्रत्ययवचनं दत्तवती । तथापि वैफल्ये सति राजाऽवोचत्—आत्मकृत्यं निर्वर्तनीनाममृतवाङ्माधुरीभिः विषयिण आकृष्यन्ते । उड्डयनशक्तेः पूर्वं परभृतः स्वानि अपत्यानि काकैः परिपोषयन्ति । अशिक्षिता- स्वपि स्त्रीषु परवञ्चनकौशलं प्रसिद्धमेव । अतो वनवासवर्धितापीयं शकुन्तला स्त्रीभाव- सुलभं वञ्चनकौशलं जानात्येव । यदि स्त्रीजातौ समुत्पन्नासु शिक्षणं विनैव नैसर्गिकं वञ्चन- पटुत्वं दृश्यते । तर्हि वाग्व्यवहारकुशलासु मानुषीषु किं वक्तव्यम् ?

स्त्रीणामशिक्षितपटुत्वममानुषीषु संदृश्यते किमुत या प्रतिबोधवत्यः । प्रागन्तरिक्षगमनात् स्वमपत्यजातमन्यैर्द्विजैः परभृतः खलु पोषयन्ति ॥ २२ ॥

त्वं जनयित्वा जह्नके उत्सृष्टा कोकिलेवपरैः भृतासि । अतः कामं गच्छ, तिष्ठ वा यदेच्छं कुरु । एवं स्वजनन्युपमर्देन सन्ताप्ता शकुन्तला दुष्यन्तं प्रति—अनार्य ! आत्मनोऽनुमानेन सर्वान् प्रेक्षसे इति । तृणैराच्छन्नकूपस्य इव धर्मकञ्चकिनः त्वत्तोऽन्य संसारे कः पापबुद्धिः । ततो राजा सुभगे ! प्रथितं दुष्यन्तस्य चरितं । न मे प्रजासु त्वत्समं छलकपटादिकं दृश्यते । ततो गौतमी—जाते ! पुरुवंशप्रत्ययेन मधुरभाषिणो हृदयनिहितविषस्य दुष्यन्तस्य हस्ते त्वमुपगता । ततः शकुन्तला पटान्तरेण मुखमाच्छाद्य रोदिति । ततः शारद्वतोऽब्रवीत् शार्ङ्गरव ! किमुत्तर-प्रत्युत्तरेण । आस्माभिः गुरोर्नियोगोऽनुष्ठितः प्रतिनिवर्तामहे । राजानं प्रति इयं ते पत्नी त्यजैनां गृहाण वा । गौतमि ! गच्छाग्रतः । शकुन्तले ! पतिकुले ते दास्यमपि शुचिव्रतमित्यादिश्य सर्वे प्रस्थिताः ।

राज्ञा समयोचितं कर्तव्यं पृष्टः पुरोधा प्रोक्तवान्—इयं देवी तावत् मम गेहे एवाप्रसवं तिष्ठतु । त्वं प्रथमं चक्रवर्तिनं पुत्रं जनयिष्यसीति सिद्धैरादिष्टम् । तव यदि मुनिदौहित्रः तल्लक्षणोपपन्नः स्यात्तर्हि इमामभिनन्द्यान्तःपुरे प्रवेशयिष्यसि, विपर्ययेऽस्याः पितुः समीपे गमनमुचितम् । राज्ञानुमतोऽसौ यदा स्वगृहं गन्तुं प्रवृत्ते तदैव 'भगवति वसुधे ! देहि मे विवरमित्यभिदधाना स्वानि भाग्यानि च निन्दन्ती क्रन्दमानां च तां शकुन्तलां स्त्रीसदृशमेकं ज्योतिरुत्क्षिप्याप्सरस्तीर्थे जगामेति पुरोहितो निवेदयति । तस्मिन्वदन्ते साश्चर्यः पर्याकुलो राजा शयनागारं प्रविष्टश्चिन्तयति—

कामं प्रत्यादिष्टां स्मरामि न परिग्रहं मुनेस्तनयाम् । बलवत्तु दूयमानं प्रत्याययतीव मे हृदयम् ॥ ३१ ॥

षष्ठेऽङ्के कथासारांशः

अथ गच्छति किञ्चित्काले शक्रावतारतीरवर्ती कश्चिद् धीवरी रत्नजटितं राजनामो- त्कीर्णं बहुमूल्यसेकं स्वर्णमयमङ्गुलीयकं विक्रेतुमापणे गच्छन् राजपुरुषाभ्यां बद्धहस्तो

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नगररक्षकराजश्यालकसमीपमानीतः। अङ्गुलीयकागमनकारणं पृष्टः स ब्रूते—स्वामिन् ! जालादिभिर्मत्स्यबन्धनोपायैः कुटुम्बभरणपोषणं करोमि। एकदा मया जाले एको रोहितो मत्स्य आसादितः। खण्डशः कल्पितस्य तस्य मत्स्यस्योदरे रत्नभास्वरमिदमङ्गुलीयकं मया लब्धा विक्रेतुमापणे आगतः, आभ्यां गृहीतः आनीतश्च। तदाकर्ण्य नगरपालः तदङ्गुलीयकमादाय राजकुलं गत्वा राजशासनं प्रतीक्ष्य प्रत्यागतो रक्षिणावुवाच—मुच्यतामेष जालोपजीवी धीवरः। विदितोऽस्याङ्गुलीयकस्यागमवृत्तान्तः, एपोऽङ्गुलीयकमूल्यसम्मितः प्रसादोऽपि सन्तुष्टेन राज्ञाऽस्मै प्रदत्त, इत्युक्त्वा तस्मै धीवराय स्वर्णकङ्कणं दत्तवान् चकार च तेन साकं कादम्बरो-मैत्रीम्।

अथ मेनकासहचरी सानुमती नामाप्सराः पर्यायनिवर्तनीयमप्सरस्तीर्थसान्निध्यं सम्पाद्य राज्ञो दुष्यन्तस्य प्रमदवने प्रविष्टा तिरस्करिणीं प्रतिच्छन्ना राज्ञः पार्श्ववर्तिनी भूत्वा तस्थौ। अङ्गुलीयकदर्शनेन स्मृतशकुन्तलो राजा क्वापि शान्तिं न लेभे, वसन्तोत्सवं प्रतिषिध्य माधव्याद्वितीयः शकुन्तलावृत्तान्तं भूयो भूयः स्मरन् निन्दंश्चात्मनश्चेष्टितं शकुन्तला-चित्रलेखनादिना तद्विपयकालापैश्च कथं कथमपि निनाय दिवसान्। प्रत्यादेश-विमानितायाः शकुन्तलाया विरहेन दुःखमनुभवन्, रात्रौ जागरणात् न मया धर्मासनमध्यासितुं सम्भावितमतो यत् प्रत्यवेक्षितममात्येन तत् पत्रमारोप्यतामिति पौरकार्यपर्यवेक्षणे नियुक्तममात्यमादिशति।

ततः समुद्रव्यापारव्यवहारी सार्थवाहो धनमित्रो नौव्यसने विपन्नः। अतोऽनपत्यस्य तस्यार्थसंचयो राजगामी भवेदित्यमात्येन लिखितं विचार्यात्मनोऽनपत्यतां स्मरन् मदवसाने पुरुवंशश्रिय एष एव विपाको भवितेति भावयन्, बहुपत्नीकस्य तस्य धनिकस्य काचिद्भार्या आपन्नासत्वा स्यात्तर्हि तद्भार्यागर्भस्थ एव शिशुः पित्र्यं रिक्तमर्हतीत्यादिशति धर्मात्मा राजा दुष्यन्तः। इमं निखिलं वृत्तान्तं मेनकानियुक्ता सा सानुमती प्रत्यक्षीकृत्य स्वसख्यै मेनकायै प्रियमिदं निवेदयितुं कामा ततो दिवं निर्जगाम।

अत्रान्तरे केनापि अलक्षितेन सत्त्वेनाक्रान्तो माधव्योऽब्राह्मण्यमुद्घोषितवान्। ततो भूयः तस्मिन् मेघप्रच्छन्ने प्रासादे आर्तस्वरं निशम्य स्ववयस्यस्य संरक्षणाय स्वधनुषि अमोघं स्वं वाणं सन्दधे। तदा माधव्यमुन्मुच्येन्द्रसारथिर्मातलिराविर्भूय ‘हरिणा असुरास्ते शरण्यं कृताः, तेष्वेवेदं धनुः विकृष्यतां न मयि’ इत्युवाच। तदनु राज्ञाभिनन्दितोऽसौ तस्मै स्वागमनकारणमाख्यत्—राजन् ! कालनेमिप्रसूतो दुर्जयो नाम दानवगणः ते सख्युरीन्द्रस्याजेयो जातः। तस्य त्वं निहन्ता स्थितः। अत आत्तशस्त्रं इममिन्द्ररथमारुह्य विजयाय प्रतिष्ठिताम्। तदाकर्ण्य राजा दुष्यन्तः 'अनुगृहीतोऽस्मि अनया मघोनः संभावनया’ इत्युक्त्वा माधव्यस्याक्रमणकारणं पृष्ट्वा ज्ञाततथ्यः स्वगमनवृत्तान्तममात्याय निवेदयितुमादिश्य तस्मिन् राजभारं च नियोजितवान् प्रहृष्टमना—

त्वन्मतिः केवला तावत् परिपालयतु प्रजाः।
अधिज्यमिदमन्यस्मिन् कर्मणि व्यापृतं धनुः ॥ ३२ ॥

तदनन्तरं स वासवीयं रथमारुह्य दिवं प्रस्थितवान्।

सप्तमेऽङ्के कथासारांशः

अस्मिन्नङ्के कालनेमिप्रसूतं दुर्जयदानवगणं निहत्य देवकार्य-सम्पादनानन्तरं देवराजस्य सत्क्रियया संभावितो राजा दुष्यन्तो व्योमयानेनावतरद् मातलि-परिचायिता देवभूमिरवलोक-

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यन् मध्ये मार्गे हेमकूटं किंपुरुषवर्षपर्वतं दृष्ट्वा तत्र तपश्चरतः सपत्नीकस्य मरीचिनन्दनस्य देवपितुः कश्यपस्य दर्शनलालसया तदाश्रममवतरति। तत्र प्रजापतिः कश्यपः स्वभार्यया दक्षकन्ययाऽऽदित्या पतिधर्ममधिकृत्य पृष्टो महर्षिपत्नीभिः सहितायै तस्यै उपदिशतोति ज्ञात्वाऽशोकवृक्षमूले राजा समुपविशति, मातलिंश्च राजागमनं निवेदयितुमवसरं ज्ञातुं च महर्षिसमीपे प्रस्थितः।

तत्र नरपतिः शुभसूचकचिह्नमनुभवन् तापसीभ्यां निषिध्यमानेनाबालसत्वेन बालेन संक्रीडितुं सिंहशिशुं बलादाकृष्टं जृम्भस्व सिंह ! दन्तांस्ते गणयिष्ये इति वीरोचितैः कृत्यैः औरससुतानुरागेण चाकृष्टो भवति। कस्य कृतिनो बीजमयं बाल इति विमृशन् स सिंहशावकादन्यत् क्रीडनकं ग्रहीतुं प्रसारितकरस्य तस्य बालकस्य हस्ते चक्रवर्तिलक्षणं दृष्ट्वा हृष्टः। ततो वाग्व्यापारेणायं विरमयितुमशक्य इति मत्वा एका तापसी तं प्रलोभयितुं मृत्तिकामयूर-मानेतुं स्वकुटीरे जगाम। ततो द्वितीया इतस्ततोऽवलोक्य राजानमवोचत्—भद्रमुख ! मोच्या-नेन दुर्मोकहस्तेन बाध्यमानं बालमृगेन्द्रम्। ततस्तावत्तद्वचनमनुतिष्ठन् बालस्पर्शसुखमुप-लभ्य कामपि अपूर्वां निर्वृतिमेतः स तां तद्बालकवंशपरिचयादिकं पप्रच्छ। सा च तस्य पुरुवंशप्रभवत्वम् अप्सरसः संभवत्वं चावोचत्।

यदा च केसरिकिशोरकविमर्दात्तन्मणिबन्धात् परिभ्रष्टं रक्षाकरण्डकं दुष्यन्तो यावद् गृह्णाति, तावत्तापसी निवेदयते-एषा अपराजिता नामौषधिरस्य शिशोः जातकर्मसमये भगवता कश्यपेन बद्धा। यदि जननी जनकं बालकं वा विहायान्यः कश्चिद्, भूमिपतितामेनां गृह्णाति तदा सर्पो भूत्वा तं दशतीत्यनेकशो दृष्टचरम्। ततः स्वपुत्र एवायमिति जातनिश्चयो बालं प्रेम्णापरिसस्वजे। ततस्तापसीभ्यां तदुदन्तमुपलभ्य तत्रागतां शकुन्तलां समीक्ष्य राजा तामभि-ननन्द। तंतो मातरमालोक्य सर्वदमनः-मातः ! क एषः पुत्र इति कथयित्वा मामालिंगति। ततः सा—आयुष्मन्ः स्वं भाग्यं पृच्छेत्युत्तरयति। ततः प्रणिपातादिना शकुन्तलाया विषादशल्यमुद्धरन्नुवाच राजा—प्रिये ! मया त्वं मोहात्स्वयमुपस्थितापि उपेक्षिता। एवं पश्चात्तापदूनहृदयो नृपोऽङ्गुलीयकोपालम्भात् स्मृतिरूपलब्धेत्युक्तत्वा तस्यै तदङ्गुलीयकं दर्शयति। विषमं कृतमनेन यत्तदाऽऽर्यपुत्रस्य प्रत्ययकाले दुर्लभमासीत्। नास्य विश्वसिमि। आर्यपुत्र एवैतद् धारयतु।

तत्र च तादृशं भूपं वीक्ष्य मातलिंसौभाग्येनायुष्मान् धर्मपत्नीसमागमेन पुत्रमुखदर्शनेन च वर्द्धसे इत्युक्त्वा तं संभावयामास। ततो राजा—मातले ! वृत्तान्तेनानेनाखण्डलोऽवबोद्धव्य इति विचारे मातलिः विहस्याह—किमीश्वराणामविदितं, सर्वं जानाति स सहस्राक्षो देवराजः। एतु आयुष्मान् सपत्नीको मरीचिनन्दनो महर्षिः कश्यपः ते दर्शनं वितरति। अनन्तरं सकलत्रपुत्रो राजा भगवन्तं कश्यपमदिति च द्रष्टुमुपस्थितः। ततो महर्षिः कश्यपोऽपि स्नेहदृष्ट्या शुभाशिषा तावनुगृह्य आयुष्मन् ! दुर्वाससः शापादियं तपस्विनी शकुन्तला त्वया प्रत्यादिष्टा नान्यथा, वत्से ! चरितार्थासि सहधर्मचारिणं दुष्यन्तं प्रति त्वया मन्युर्न कार्य इत्याभाष्य प्रत्यादेशविषये उभावपि निर्वृत्तचित्तौ कृत्वा शुभाशिषा संयोजयति—

आखण्डलसमो भर्ता जयन्तप्रतिमः सुतः। आशीरन्या न ते योग्या पौलोमीसदृशी भव ॥ २८ ॥

मेनकापि तत्र भर्तृपुत्रसहितां दुहितरं दृष्ट्वाऽतिमुमुदे। ततो दुष्यन्तो भगवता मारीचेन विसृष्टः पुत्रकलत्राभ्यां सहिते दिव्यमैन्द्रं रथमारुह्य पौरैरभिनन्द्यमान स्वं नगरं प्रविवेश।

हिन्दी में कथासार

प्रथम अङ्क

नाटक के आरम्भ में मङ्गलाचरण के बाद सूत्रधार अपनी पत्नी नटी से कहता है—आर्ये ! कविवर कालिदास द्वारा रचित अभिनव अभिज्ञानशाकुन्तल नामक नाटक का अभिनय करना है। यह महाराज विक्रमादित्य की सभा है, जिसमें बड़े-बड़े विशिष्ट विद्वान् उपस्थित हैं और ग्रीष्म ऋतु का आरम्भिक समय है। अतः इनके मनोविनोद के निमित्त कोई उत्तम गाना गाओ। यह सुन नटी एक गीत गाती है, जिस पर सूत्रधार कहता है—प्रिये ! तुम्हारे गीत ने मेरे हृदय को इस प्रकार आकृष्ट कर लिया है जैसे शिकारी राजा दुष्यन्त को मृग ने महर्षि कण्व के आश्रम की ओर खींच लिया है। इसके बाद दो वैखानस ब्रह्मचारियों ने आकर राजा को रोकते हुए कहा कि—राजन् ! यह आश्रम का मृग अवध्य है, आप इसे न मारें। इसपर राजा धनुष से बाण उतार लेते हैं। तब ब्रह्मचारियों ने आशीर्वाद दिया कि—महाराज ! आप विजयी बनें और आपको चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति हो। यह सामने कुलपति कण्व का पुनीत आश्रम है। यदि आपके किसी कार्य में बाधा न हो तो आप कृपया यहाँ पधारें। और आतिथ्य सत्कार स्वीकार करें। अतिथि-सत्कार का भार शकुन्तला को सौंप कर वे सोमतीर्थ की यात्रा में गये हुए हैं। हम लोग समिद् और कुश लाने के लिए पास के जंगल में जा रहे हैं। तदनुसार राजा ने विनीत भाव से आश्रम में प्रवेश किया। प्रवेश करते समय शकुन की सूचना पर राजा कहते हैं—यह तो आश्रम का स्थान है, पर मेरी दाहिनी भुजा फड़क रही है। यहाँ इसका फल कैसे संभव होगा, या हो भी सकता है, क्योंकि होनी के द्वार सर्वत्र होते हैं। बाद राजा ने सखियों के साथ वृक्षों में जल देती हुई सुन्दरी शकुन्तला को देखा। बातचीत के प्रसंग में उन्हें सखियों से पता चला कि यह शकुन्तला कुलपति कण्व की पोष्य पुत्री है। उसकी माँ मेनका अप्सरा और पिता राजर्षि विश्वामित्र हैं। अब राजा को आशा हो चली कि शकुन्तला का पाणिग्रहण मेरे साथ हो सकता है क्योंकि यह वस्तुतः क्षत्रिय-कन्या है। इसके पहले ऋषिकुमारी होने के कारण आग के समान समझा था। अनन्तर दोनों एक दूसरे के प्रति आकृष्ट होते हैं। हँसमुखी सखी प्रियम्वदा शकुन्तला को छेड़ती है जिससे वह नाराज होती है। इस बीच एक जङ्गली हाथी के उत्पात से भयभीत होकर वे मुनिकन्याएँ अपने आश्रम में जाने को उद्यत हो जाती हैं और सखियाँ कहती हैं—राजन् आपके स्वागत किये बिना पुनः दर्शन देने को कहने में हमलोग संकुचित होती हैं इस पर राजा कहते हैं कि आप लोगों की मधुरवाणी से ही मैं सत्कृत हो गया। अनन्तर वे अपने निवास पर चली जाती हैं, शकुन्तला घूम-घूमकर राजा को देखती हुई रुकती जाती है तथा राजा दुष्यन्त आश्रम की रक्षा के लिए बढ़ते हैं और शकुन्तला के प्रति आकृष्ट होकर अपनी राजधानी में जाना स्थगित कर देते हैं।

द्वितीय अङ्क

आलसी विदूषक आखेटक से परेशान होकर उससे अपने को बचाना चाहता है और उसके दोषों का उद्घाटन करते हुए कहता है—दोपहर के समय भी कड़ी धूप में वृक्षों की विरल छाया में इस वन से उस वन में यह मृग, यह सूकर, यह शार्दूल कह कर दौड़ना

( ५० )

पड़ता है। मृगयाबिहारी राजा दुष्यन्त के स्नेहवश पहाड़ी झरनों का कसैला और गर्म पानी पीना पड़ता है। असमय पर पका या कच्चा मांस का भोजन घोड़े हाथियों की आवाज से रात में नींद नहीं आती। इतने पर भी दुःख का अन्त नहीं, सुना है कि दुष्यन्त ने दुर्भाग्य से शकुन्तला नामक किसी सुन्दरी तापसकुमारी को देख लिया, उस पर आकृष्ट होकर वे अब नगर जाने की चर्चा ही नहीं करते। यह देखो, प्यारे मित्र हाथ में धनुष लिए जंगली फूलों की माला पहने इधर ही आ रहे हैं, अब अंग भङ्ग करके रहूँगा। इससे शायद छुटकारा मिल जाय। राजा से—हे मित्र ! मेरे हाथ-पैर नहीं चल रहे हैं। अतः केवल वाणी से ही जयजयकार करता हूँ—कहता है। राजा के हँसकर मित्र ! यह अंग जकड़ना कैसे हो गया ? यह पूछने पर विदूषक कहता है मित्र ! खुद आँख दुखाकर आँसू का कारण पूछते हो। अतः अब मुझे आखेट से विश्राम दो। इधर राजा भी शकुन्तला के रूप-लावण्यपर मुग्ध होकर आखेट से बचना ही चाहते थे। अतः वे सेनापति को आदेश देते हैं कि अब आखेट बन्द कर दिया जाय। आश्रम के यज्ञ में राक्षस उपद्रव करते हैं। तपस्वियों की प्रार्थना पर राजा यज्ञ-रक्षा के निमित्त वहाँ रुक जाते हैं। इसलिए प्रवृत्तपारण उपवास व्रत की समाप्ति पर माँ के बुलाने पर भी राजधानी न जाकर पुत्र के समान माने गये अपने मित्र विदूषक को ही सेना के साथ वापस भेज देते हैं। राजा को भय था कि कहीं यह बातूनी विदूषक शकुन्तला विषयक मेरे अनुराग को अन्तःपुर की रानियों से कह न दे। यह सोचकर राजा ने विदूषक से कहा—मित्र ! यहाँ मैंने तुम से पहले जो शकुन्तला की चर्चा की थी वह परिहास में की थी वास्तविक बात नहीं है ‘परिहास विजल्पितं सखे ! परमार्थेन न गृह्यतां वचः’। कहाँ मैं नागरिक वैदग्ध्य प्रिय व्यक्ति और कहाँ मृगों के बच्चों के साथ पली हुई भोली-भाली तपस्वियों की कन्यायें। भला हमारा इनका क्या जोड़ा ? यह तो एक विनोद मात्र (हँसी मजाक) था। इसमें सच्चाई कुछ भी नहीं है। मित्र माढव्य ! मेरे कथनानुसार तुम नगर में जाकर माँ के उपवास व्रत में पुत्र का कार्य सम्पादन करो और मैं भी तपोवन की रक्षा के निमित्त आश्रम जाता हूँ।

तृतीय अङ्क

हाथ में कुश लिए हुए यजमान का एक शिष्य कहता है, वाह, राजा दुष्यन्त के तपोवन में प्रवेश करने मात्र से ही सब यज्ञ कर्म सम्पन्न हो गये, क्योंकि इनके धनुष के टंकार से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं। इधर राजा दुष्यन्त यज्ञ-रक्षा कार्य से निवृत्त होकर मुनियों की अनुमति से मनोविनोदपूर्वक विश्राम करने के लिए मालिनी नदी के किनारे वैतस‌लता-मण्डप की ओर जाते हैं। वह कण्वपुत्री शकुन्तला का भी प्रिय स्थान है, जहाँ वह अपनी दोनों सखियों—प्रियम्बदा तथा अनसूया के साथ पहले से ही उपस्थित थी। राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला दोनों परस्परावलोकनजन्य कामपीड़ा से व्यथित होकर दुर्बल हो गये थे। सखियाँ शकुन्तला को रोगी समझकर नलिनीदल आदि से उपचार करती हुई रोग का कारण पूछती हैं। जब उन्हें मालूम होता है कि राजा दुष्यन्त से प्रेम करने के कारण इसकी यह दशा हुई है तब उन्होंने उसके उस कार्य का अनुमोदन किया और नलनीदल पर प्रेम-पत्र लिखवाती हैं। उस मदनलेख में शकुन्तला अपनी विरहव्यथा का वर्णन करती हुई कहती है कि सुभग ! आपका हाल तो मैं नहीं जानती, पर मैं रातदिन विरह की अग्नि में जलती जा रही हूँ। लताओं की ओट में छिपे हुए राजा दुष्यन्त यह सब सुनकर प्रकट हो जाने का उचित अवसर समझकर प्रकट हो जाते हैं।

( ५१ )

इन्हें देखकर सखियाँ उनका स्वागत करती हुई कहती हैं—राजन् ! हम लोगों की यह प्रियसखी आप को देखकर मदन द्वारा इस अवस्था को पहुँचा दी गई है। अब आपही इसके जीवन के आधार रहे हैं। अतः आप ऐसा करें कि यह बन्धुजनों के लिए शोचनीय न हो। इस प्रकार कह करके एक मृग के बच्चे को उसकी माँ ने मिलाने के बहाने लता मण्डप से बाहर चली जाती हैं। सखियों के साथ बाहर जाने की चेष्टा करती हुई शकुन्तला को रोककर राजा अपने अभिलषित मनोरथ को सफल करते हुए आनन्द का अनुभव करने लगे।

इतने में ही शकुन्तला को पुकारती हुई गौतमी स्वास्थ्य लाभ के लिए दर्भोदक लेकर वहाँ उपस्थित होकर कहती है वत्से ! इस दर्भोदक से तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक हो जायगा। अब साम हो चली कुटी पर चलें। बड़े दुःख से उसके पीछे-पीछे जाती हुई शकुन्तला ने कहा-लतावलय ! सन्तापहारक ! पुनः मिलने के लिए आज से अनुरोध करती हूँ इस प्रकार लतावलय के व्याज से राजा को संकेत कर गौतमी के साथ वहाँ से चली जाती है। इसके बाद राजा प्रिया-परिसुक्त लतामण्डप में बड़ी खिन्नता से कुछ देर बिताकर यज्ञ कर्म में संलग्न ऋषियों के सन्ध्याकालीन निशाचरों के भय को दूर करने के लिए प्रस्थित हो जाते हैं।

चतुर्थ अङ्क

पुष्प तोड़ती हुई प्रियम्वदा और अनसूया की आपसी बातचीत से मालूम पड़ता है कि शकुन्तला के साथ गान्धर्वविवाह और निर्विघ्न यज्ञ रक्षा का कार्य समाप्त हो जाने के कारण ऋषियों से आज्ञा लेकर राजा दुष्यन्त अपनी राजधानी को चला गया। वहाँ जाकर वह शकुन्तला का स्मरण करेगा या नहीं ? इधर शकुन्तला भी उसके विरह में रात-दिन उनका चिन्तन करती हुई कुटी के पास ही रहती है। राजा के बुलाने वाले दूत की प्रतीक्षा कर थक जाती है और सोच में पड़ी रहती है।

एकदिन प्रसिद्ध क्रोधी दुर्वासा मुनि भिक्षा के लिए आश्रम में आये। उस समय वहाँ शकुन्तला के अतिरिक्त कोई नहीं था। वे आवाज देते हैं दुष्यन्त के सोच में डूबी हुई शकुन्तला कुछ नहीं सुन पाती। इससे ऋषि आग-बबूला होकर शाप देते हुए क्रोध में कह कर चल देते हैं कि तू जिस पुरुष की चिन्ता में इस तरह मग्न है कि मेरी बात तक नहीं सुनती, वह पुरुष स्मरण दिलाने पर भी तुझे स्मरण नहीं कर सकेगा। इस हृदयविदारक शाप को सुन अनसूया ने अनुनय-विनय कर उन्हें मनाने के निमित्त प्रियम्वदा को भेजकर उनके आतिथ्यसत्कार के लिए आश्रम में आ जाती है। जब प्रियम्वदा ने चरण पड़कर बड़ा अनुनय-विनय किया तो ऋषि ने कहा—मेरा शाप तो व्यर्थ नहीं होगा, पर कोई आभरण दिखाने पर यह शाप निवृत्त हो जायेगा। ( उस समय सखियों ने इस दुःखद घटना को शकुन्तला से नहीं कहा, केवल अपने ही तक सीमित रखा । )

सखियाँ परेशान थीं कि शकुन्तला ने जो अपने मन से राजा दुष्यन्त के साथ अपना गान्धर्व-विवाह कर लिया है, उससे कुलपति को कैसे अवगत कराया जाय ? सौभाग्य से जब महर्षि कण्व ने सोमतीर्थ की यात्रा से लौटकर यज्ञशाला में प्रवेश किया तब आकाश वाणी ने उनको दुष्यन्त के साथ शकुन्तला के गान्धर्वविवाह की घटना से अवगत करा

( ५२ )

दिया। सत्पात्र के चुनाव पर कण्व जी प्रसन्न हुए और शकुन्तला का अभिनन्दन करते हुए उन्होंने उस योग्य वर की प्राप्ति का अनुमोदन किया। बाद वे शार्ङ्गरव-शारद्वत इन दो शिष्यों तथा वृद्धा तापसी गौतमी के साथ शकुन्तला को दुष्यन्त के पास हस्तिनापुर भेजने का आदेश देते हैं। शकुन्तला की विदाई के अवसर पर वहाँ के वृक्षों ने दिव्य आभूषण तथा वस्त्र दिये। विदाई के समय कण्व के आश्रम में करुणा की अति हो गई। वीतराग तपस्वी कण्व तक रो पड़े। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी आदि से संयुक्त वह सारा तपोवन जीवित प्राणी के समान विकल हो उठा। वृक्षों ने पत्ते गिरने के बहाने अश्रुधारा बहाई मृग मुख में तृण लिए ही रह गये। इस प्रकार समस्त आश्रमवासी स्तब्ध हो गये।

महर्षि कण्व गृहस्थ जीवन को सुखमय बनाने की दृष्टि से शकुन्तला को अनेक समयोचित उपदेश देते हैं और राजा दुष्यन्त को शिष्यों द्वारा उत्तम कर्तव्योचित सन्देश देकर जलाशय के पास से अनसूया और प्रियम्बदा के साथ शकुन्तला से शून्य आश्रम पर आकर कहते हैं कि कन्या के जन्म से पिता को चिन्ता बनी रहती है कि इसे किस योग्य वर को दिया जाय। कन्यारूपी अमानत उसके योग्य अधिकारी को सौंपकर पिताओं का हृदय हलका हो जाता है। आज शकुन्तला को योग्य पति राजा दुष्यन्त के पास भेज कर मेरा भी हृदय निर्मल हो गया।

पञ्चम अङ्क

राजा दुष्यन्त विदूषक से कहता है कि मित्र ! सुनो, गीत का स्वर सुनाई पड़ रहा है मालूम पड़ता है कि सङ्गीतशाला में रानी हंसपदिका गाना सीख रही है जिसे सुनकर मेरा हृदय अन्तर्व्यथा का अनुभव कर रहा है। इतने में ही कञ्चुकी आकर कहता है—महाराज ! हिमालय की तराई के जङ्गल से महर्षि कण्व का सन्देश लेकर स्त्रियों के साथ तपस्वी लोग द्वार पर उपस्थित हैं। यह सुन राजा ने आदेश दिया कि पुरोहित सोमरातजी से कहो कि वे वैदिक रीति से उन तपस्वियों का सत्कार कर यज्ञशाला में लायें। मैं भी वहाँ जाकर उनसे भेंट करूँगा। बाद घूँघट काढ़ी हुई शकुन्तला गौतमी तथा कण्व के शिष्यों के साथ दुष्यन्त के दरबार में पहुँचती है। राजा शाप के कारण शकुन्तला के साथ गान्धर्वविवाह की बात भूल जाता है। सौन्दर्य की छटा देखकर वह शकुन्तला पर आकृष्ट होता है किन्तु धर्मनिष्ठा के कारण पराई स्त्री समझकर अस्वीकार कर देता है। गौतमी शकुन्तला का मुख देखती है। बाद शकुन्तला पहचान के लिए अंगूठी दिखाना चाहती है, पर वह अंगुली में नहीं मिलती, बाद कण्वाश्रम में साथ बिताए दिनों का मधुर प्रसङ्ग सुनाती है, फिर भी राजा को कुछ याद नहीं आता। अंगूठी का प्रसङ्ग उठाकर न दिखा पाने से राजा को और आशंका हो जाती है कि ये लोग मुझे धर्म से गिराना चाहते हैं।

स्त्री जाति परवञ्चना में बड़ी प्रवीण होती है मनुष्यों की कौन कहे पक्षी भो इससे बाज नहीं आते, कोयल उड़ने के पहले अपने बच्चों को कौए से पालन कराती हैं। इसी प्रकार शकुन्तला की माँ मेनका ने इसे जन्म देकर कण्व से पालन पोषण कराया है। जब अशिक्षित पक्षियों की यह हालत है तो शिक्षित मनुष्यों की क्या स्थिति होगी। अतः मैं इस वञ्चना में न फँसूंगा। इसके बाद शकुन्तला और शार्ङ्गरव राजा को भला बुरा भी सुनाते हैं, पर वह नहीं बदलता है। अन्त में शकुन्तला को छोड़ यह कहकर कि 'बिना बड़ों से पूछे जो तूने ऐसा कार्य किया है, उसका फल भोगो। विवाहिता लड़की के लिए पिता

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के घर की अपेक्षा पति के घर में दासता करते रहना भी अच्छा है। यह कहकर चल देते हैं और शकुन्तला रोती रह जाती है। बाद राजा उचित सलाह के लिए पुरोहित से कहता है, वे सुझाव देते हैं कि महाराज ! बच्चा होने तक यह देवी मेरे घर रहे, सिद्ध पुरुषों ने भविष्यवाणी की है कि आप को पहले चक्रवर्ती पुत्र होगा; यदि कण्व का दौहित्र चक्रवर्ती लक्षण से सम्पन्न होगा तो शकुन्तला की बात सत्य समझकर इसे निवास में स्थान दीजियेगा, अन्यथा इन दोनों को कण्व के आश्रम पर पहुँचा दिया जायेगा। राजा यह सुझाव मान लेते हैं। अपना भाग्य कोसती हुई शकुन्तला पुरोहित के पीछे-पीछे रोती हुई जा रही थी कि स्त्री के आकार की एक दिव्य ज्योति आकाश से आकर उसे उठा ले जाती है। जब पुरोहित जी आकर राजा से यह घटना बताते हैं तो वे आश्चर्य से व्याकुल होकर शयनागार में चले जाते हैं।

षष्ठ अङ्क

शक्रावतारतीर्थ का निवासी एक धीवर रत्नजटित एवं राजनामाङ्कित एक सोने की अंगूठी बेचने के लिए बाजार में जाता है, सिपाही उसे पकड़कर नगररक्षक कोतवाल के पास लाते हैं। अंगूठी की प्राप्ति का कारण पूछने पर वह बताता है कि 'स्वामिन् ! मैं जाल से मछलियों को मारकर अपने परिवार का पालन-पोषण करता हूँ। एक दिन शक्रावतारतीर्थ में जाल से फसाई गई रोहू मछली के पेट से यह अंगूठी मिली है। मैं इसे बेचने के लिए बाजार में आया तब इनके द्वारा पकड़कर आपके पास लाया गया हूँ। यह सुन वह नगर-रक्षक उस अंगूठी को लेकर राजा के पास जाता है, उसे देखते ही दुर्वासा के शाप का अन्त हो जाता है और राजा को शकुन्तला की स्मृति हो जाती है। उस अंगूठी के बदले धीवरको अपना स्वर्ण-कंकण पुरस्कार में दे डालता है। बाद राजा शकुन्तला के परित्याग के कारण वियोग से विकल हो जाता है। विदूषक को साथ लेकर अपने दुःख को दूर करने के लिए प्रमदवन में जाता है और वसन्तोत्सव न मनाने का आदेश दे देता है। इधर मेनका की सखी सानुमती नाम की एक अप्सरा शचीतीर्थ में अपनी पारी पूरी कर राजा के प्रमदवन में आकर तिरस्करिणी विद्या के प्रभाव से छिपकर राजा के पास खड़ी हो जाती है। राजा शकुन्तला के चित्र फलक को देखकर दुःखी हो जाता है, और उसमें कुछ परिवर्तन करने का संकेत करता है। बाद राजा नगरकार्य निरीक्षक अपने अमात्य को सन्देश देता है कि मैं रात में देर तक जग जाने के कारण आज धर्मासन पर नहीं जाऊँगा। आपने जो राजकार्य देखा हो उसे पत्र में लिखकर मेरे पास भेज दें। तदनुसार मन्त्री ने लिखा कि समुद्रमार्ग से व्यापार करनेवाला धनमित्र नाम का व्यापारी नौका दुर्घटना से मर गया है। वह सन्तानहीन था। अतः उसकी सम्पत्ति राजखजाने में जमा होनी चाहिए। सन्तानहीन की बात पढ़कर राजा दुःखी हो जाता है और अपने बाद पुरुवंश के विच्छेद हो जाने की आशंका से व्याकुल हो उठता है। अपने पितरों की भावी दशा का स्मरण कर अत्यन्त दुःखी हो जाता है। बाद आदेश देता है कि धनिकों की अनेक स्त्रियां होती हैं। पता लगाया जाय—यदि उसकी कोई स्त्री गर्भवती हो तो वह गर्भस्थ बालक ही इस सम्पत्ति का अधिकारी होगा। इस प्रकार अंगूठी देखने के बाद राजा का शकुन्तला में निश्चल प्रेम राजा को विरह व्यथा, और पुन मिलन की आशा बताने के लिए मेनका द्वारा भेजी हुई वह सानुमती अप्सरा चली जाती है।

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इसी समय मेघप्रच्छन्न प्रासाद के ऊपर इन्द्र का सारथी मातलि विदूषक को पकड़कर तङ्ग करना शुरू कर देता है। शोर करके अपनी रक्षा के लिए राजा को बुलाने पर वह धनुष-बाण लेकर उस ब्राह्मण मित्र को बचाने के लिए दौड़ पड़ता है। शरसन्धान करने पर मातलि विदूषक को छोड़कर प्रगट हो जाता है और बताता है कि राजन् ! कालनेमि की सन्तान दुर्जय नामक राक्षसगण इन्द्र के लिए अजेय हैं। अतः इन्द्र ने अपने शत्रु राक्षसों को मारने के लिए आपको आमन्त्रित किया है। ये बाण आप उन्हीं पर छोड़िए, मुझ पर नहीं। विदूषक को पकड़ने का कारण पूछने पर मातलि ने जवाब दिया कि किसी कार्य से आपको दुःखी देखकर वीरोचित कार्य के निमित्त उत्तेजित करने के लिए मैंने आपके मित्र विदूषक को इस प्रकार तङ्ग कर रखा था ।) अनन्तर राजा मन्त्री को राज्य-भार सँभालने का सन्देश विदूषक द्वारा भेजकर इन्द्र के रथ पर सवार होकर स्वर्ग को प्रस्थान कर देता है।

सप्तम अङ्क

राजा दुष्यन्त स्वर्ग जाकर उन कालनेमि प्रसूत दुर्जय राक्षसों को पराजित कर इन्द्र की आज्ञा पूरी करते हैं। बाद उनसे विशेष सत्कृत होकर उन्हीं के रथ से पुनः भारत के लिए लौट पड़ते हैं। रास्ते में किंपुरुषवर्ष का हेमकूट नामक पर्वत दीख पड़ता है, जहाँ देवताओं के पिता ब्रह्माजी के पौत्र, मरीचिनन्दन महर्षि कश्यप अपनी पत्नी दक्षकन्या अदिति के साथ तपस्या में संलग्न हैं। उनके दर्शन की लालसा से राजा रथ से उतर कर एक पेड़ के नीचे रुक जाते हैं और मातलि कश्यप की आज्ञा लेने के लिए चला जाता है, जहाँ कश्यपजी ऋषि पत्नियों के साथ अदिति को पातिव्रत्य धर्म का उपदेश दे रहे थे।

इधर एक बालक शेर के बच्चे के साथ खेलता हुआ दिखाई देता है सिंहशावक को माँ का दूध नहीं पीने देता, जबरदस्ती खींच कर कहता है—मुँह खोलो तुम्हारे दांत गिनूँगा, तथा दो तापसियाँ उसे मना कर रही हैं उस बालक को देखकर राजा का पुत्र-वात्सल्य उमड़ पड़ता है, वे उसे अपनी गोद में खेलाने वाले को धन्य समझते हैं। शेर के बच्चे को छोड़ दूसरे खिलौने के लिए हाथ पसारने वाले उस बालक के हथेली में चक्रवर्ती राजा का चिन्ह देखकर राजा अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। एक तापसी ने यह कहकर कि यह बात से नहीं माननेवाला है उसे खेलने के लिए बनाया गया खिलौना देना ही होगा, यह कहकर मिट्टी के मयूर को लेने के लिए अपनी कुटी में चली जाती है। तब तक दूसरी तापसी इधर-उधर देखकर राजा से निवेदन करती है कि भद्रमुख ! इस बालक ने शेर के बच्चे को जोर से पकड़ रखा है। अतः कृपया इसे छुड़ा दीजिए। तदनुसार राजा शेर के बच्चे से छुड़ाकर उस बालक को अपनी गोद में लेकर स्पर्श सुख का अनुभव करने लगते हैं। दोनों का चेहरा मिलता देखकर वह तापसी आश्चर्यचकित हो जाती है। वह आश्चर्य चरमसीमा पर तब पहुँच जाता है जब वह देखती है कि बालक की कलाई से जमीन में गिरी ताबीज को उठा लेने पर भी उसका कुछ नहीं होता। उस अपराजिता नामक औषधि को कश्यपजी ने बालक के जातकर्म संस्कार के समय बांध दिया था जो माता, पिता और बालक के अतिरिक्त कोई अन्य उठा ले तो वह साँप बनकर उसे डँस देती थी। अब राजा को पूर्ण विश्वास हो गया कि यह मेरा ही औरसपुत्र है। इसके पूर्व तापसियों द्वारा राजा को मालूम हो गया था कि यह पुरुवंश का क्षत्रिय बालक है और एक अप्सरा की पुत्री में उत्पन्न हुआ है, उसके पति ने उसका परित्याग कर रखा है। ये सभी बातें उन्हीं में घटती थीं।

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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यह सुखद समाचार तत्काल तापसियों ने शकुन्तला के पास पहुँचाया, जो पति-प्राप्ति के लिए नियमव्रत में थी, वह उसी वेग में वहाँ आती है, दोनों का मिलन होता है और राजा उसके चरणों पर गिरकर क्षमा माँगते हैं। इतने में मातलि आकर पुत्र और पत्नी के मिलन के सौभाग्य पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए राजा को धन्यवाद देता है और कहता है कि राजन् आपको दर्शन देने के लिए देवमाता के सहित महर्षि कश्यप प्रतीक्षा कर रहें हैं। तब पुत्र, पत्नी और मातलि के साथ राजा ऋषि के पास उपस्थित होकर साष्टाङ्गप्रणाम कर उनकी आज्ञा से सामने बैठ जाते हैं। बाद महर्षि स्नेहभरी दृष्टि से शुभाशीर्वाद देते हुए दोनों से कहते हैं कि आयुष्मन् ! मैंने अपने योगबल से जाना है कि तुमने दुर्वासा के शाप से मोहित होकर इस तपस्विनी का परित्याग कर दिया था। वत्से शकुन्तले ! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो गया, अब तुम दुष्यन्त के प्रति क्रोध नहीं करना। बेटी ! यह तेरा पति इन्द्र के समान, यशस्वी और तुम्हारा यह पुत्र सर्वदमन जयन्त के समान बलवान् तथा तुम इन्द्राणी के समान चिर सौभाग्यवती होओ। तुम तीनों श्रद्धा, धन और विधि के प्रतीक हो, तुम तीनों का यह योग विश्व के कल्याण के लिए हो। इस प्रकार प्रत्यादेश विषय में दोनों को समझा बुझाकर निर्मल हृदय कर देते हैं और अन्त में उन्हें हस्तिनापुर जाने के लिए विदा कर देते हैं।


प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण

राजा दुष्यन्त

राजा दुष्यन्त अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के नायक हैं। जाति से ये चन्द्रवंशी क्षत्रिय हैं और इनमें धीरोदात्त नायक के सभी गुण वर्तमान हैं। इनकी चाल ढाल व्यवहार आदि आकर्षक हैं। इनका शरीर लम्बा चौड़ा तथा सुडौल है। इनके सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों पर इनके व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ता है। ये शूरवीर धार्मिक राजा हैं। शिकार खेलने में इनका मन खूब लगता है। इनकी वीरता की इतनी ख्याति है कि देवराज इन्द्र भी अपनी सहायता के निमित्त इन्हें बुलाते हैं। ये बड़े मधुरभाषी हैं, प्रियंवदा इनके मधुर भाषण की प्रशंसा करती है। ये अपने कुल की प्रतिष्ठा का हमेशा ध्यान रखते हैं तथा अपने पूर्वज महाराज पुरु के पावन आचरण से सदा प्रेरणा लेते रहते हैं। ये कोई ऐसा कार्य नहीं कर बैठते हैं जिससे इनके कुल की मर्यादा पर धब्बा लगे। इस प्रकार दुष्यन्त सर्वश्रेष्ठ गुणों के प्रतीक एवं आदर्श राजा हैं।

जिस समय राजा दुष्यन्त तपोवन में प्रवेश करते हैं उस समय उनके दक्षिण बाहु फड़कने से शुभ शकुन होता है। जैसे ही वे आगे बढ़ते हैं वैसे ही कलश लेकर वृक्षों में पानी डालने के लिए आती हुई तीन तापस कन्याओं को देखते हैं। उनमें वल्कल पहने हुए शकुन्तला को देखकर वे मन में सोचते हैं कि इस कृशाङ्गी का सुन्दर शरीर वल्कल के योग्य नहीं, फिर भी वल्कल से इसकी शोभा बढ़ गई है। सहज सुन्दरों को क्या अच्छा नहीं लगता ? क्योंकि सेवार से आवृत रहता हुआ भी कमल सुन्दर मालूम पड़ता है और चन्द्रमा में पड़ा कलंक भी उसकी शोभा बढ़ाता है—

सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति । इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी किमिह मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ।। १।२०

राजा दुष्यन्त को नैतिक चरित्र के विषय में बड़ा आत्मविश्वास था। जब राजा की दृष्टि शकुन्तला के अङ्गों पर पड़ती है। इसके लाल-लाल ओठ अभिनव किसलयों की दीप्ति से स्पर्धा कर रहे हैं। दोनों भुजाएँ कोमल शाखाओं जैसी मनोहर प्रतीत हो रही हैं और नया यौवन लुभावने कुसुम के समान उसके अङ्गों में व्याप्त हो गया है इस रूपसौन्दर्य से राजा का मन चंचल हो जाता है।

महर्षि कण्व के आश्रम में प्रवेश के समय अनुपम सौन्दर्य से मण्डित शकुन्तला को देखकर उसके लावण्य-कान्ति पर मुग्ध होकर प्रशंसा करते हैं और उसे पाने के लिए लालायित हो जाते हैं, फिर भी उनका विवेक ब्राह्मण कन्या के प्रति आकृष्ट होने से रोकता है। उनके मन से विचार उठता है कि क्या यह सम्भव है कि यह महर्षि कण्व की ब्राह्मणेतर भार्या में उत्पन्न हुई हो ! शीघ्र ही निर्णय कर लेते हैं कि अथवा सन्देह करना व्यर्थ है, निश्चय ही यह क्षत्रियों के ग्रहण योग्य है, क्योंकि मेरा पवित्र मन इसे चाहता है। सन्देहास्पद विषयों में सदाचारियों के अन्तःकरण के विचार ही प्रमाण हुआ करते हैं। इस प्रकार दुष्यन्त का आत्मसंयम पर पूर्ण विश्वास था—

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असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा यदार्यमस्यामभिलाषि मे मनः । सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः ।। १।२२

फिर भी सही-सही पता लगाते हैं । दुष्यन्त विवेकहीन कामी पुरुषों के समान अन्धे नहीं बनते, अवसर मिलने पर शकुन्तला की सखियों से पूछ ही बैठते हैं—कुलपति कण्व तो आबाल ब्रह्मचारी हैं, आप लोगों की यह सखी उनकी कन्या कैसे ? जब उन्हें शकुन्तला विषयक सारा रहस्य ज्ञात हो जाता है । अर्थात् यह शकुन्तला अविवाहित है, इसके विवाह का किसी के साथ निश्चय नहीं हुआ है, यह क्षत्रिय की कन्या होने के कारण विवाह के योग्य है, और यह भी मुझे चाहती है। इत्यादि निश्चय हो जाने के अनन्तर ही वे शकुन्तला से गान्धर्व विवाह करते हैं । तपोवन से हस्तिनापुर लौटते समय शीघ्र ही बुलाने का वचन देकर अभिज्ञान के रूप में प्रेम से उसे अपनी अंगूठी दे देते हैं, पर दुर्भाग्यवश दुर्वासा के शाप के प्रभाव से उसकी स्मृति धूमिल हो गई उसे कुछ स्मरण ही नहीं रहा। वे परस्त्री समझकर दरबार में उपस्थित शकुन्तला को ठुकरा देते हैं, फिर भी पाठक उन्हें दोषी नहीं समझते। अंगूठी की प्राप्ति के पश्चात् जब सारी बातें स्मृतिपटल पर आ जाती हैं तब वे पश्चात्ताप की तीव्रता से व्यग्र हो उठते हैं। अतिशय दुःख का अनुभव करते हुए सामयिक उत्सवों से विरत होकर समय बिताते हैं। अन्त में इन्द्रपुरी से लौटते समय महर्षि कश्यप के आश्रम पर शकुन्तला का साक्षात्कार कर उसके पैरों पर गिर कर क्षमा माँगते हुए कहते हैं—

सुतनु हृदयात् प्रत्यादेशव्यलीकमपैतु ते । किमपि मनसः संमोहो मे तदा बलवानभूत् ।। ७।२४

राजा दुष्यन्त समदर्शी आदर्श पति हैं । अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध रहने पर भी इन्हें नैतिकताका सदा ध्यान बना रहता है । नई स्त्री से प्रेम हो जाने पर भी ये पहली स्त्रियों को भूल नहीं जाते । ये अपनी रानियों की भावनाओं को पूरा-पूरा सम्मान करते हैं। पञ्चम अङ्क के आरम्भ में रानी हंसपदिका के उपालम्भ पूर्ण गीत को सुनकर वे उसे सान्त्वना देने के निमित्त माढव्य को भेजते हैं—गच्छ नागरिकवृत्त्या संज्ञापयैनाम् । षष्ठ अंक में प्रमद वन में चित्र पट पर शकुन्तला की छवि देखने में मग्न राजा दुष्यन्त चतुरिका चेटीमें महारानी वासुमती के आने का समाचार सुनकर मानगर्विता महारानी अप्रसन्न होगी, यह सोचकर शकुन्तला के चित्रपट को विदूषक से अन्यत्र भेज देते हैं—वयस्य ! उपस्थिता देवी बहुमानगर्विता च । भवानिमा प्रतिकृतिं रक्षतु । वह वसुमती के सम्मान एवं आदर में कमी नहीं आने देना चाहते हैं । इस प्रकार समदर्शी नायक दुष्यन्त के चरित्र को देखकर सानुमती अप्सरा उसकी प्रशंसा करती है ।

दुष्यन्त एक धर्मपरायण राजा हैं। आदि से अन्त तक उन्होंने धर्मनिष्ठा का पालन किया है। ऋषियों की प्रार्थना पर ही महर्षि कण्व के आश्रम में यज्ञ की रक्षा में संलग्न हैं । उन्हें हस्तिनापुर से आदरणीय मां का सन्देश मिलता है—आगामी चौथे दिन मेरे उपवास की पारणा है उस अवसर पर आपका उपस्थित होना आवश्यक है । माता का यह सन्देश सुनकर वे द्विविधा में पड़ जाते हैं । एक ओर तपस्वियों के यज्ञ का रक्षाकार्य जिसके लिए पहले ही वचन दे चुके हैं दूसरी ओर पूज्या माता का आदेश, क्या हो, कैसे हो । वे बड़ी बुद्धिमानी से दोनों कार्यों को सम्पन्न करने का मार्ग निकालते हैं, विदूषक को मां की सेवा में भेज देते हैं क्योंकि माता ने उसे भी तो पुत्र की भांति ही माना है । दुष्यन्त