अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४ )
इसी समय मेघप्रच्छन्न प्रासाद के ऊपर इन्द्र का सारथी मातलि विदूषक को पकड़कर तङ्ग करना शुरू कर देता है। शोर करके अपनी रक्षा के लिए राजा को बुलाने पर वह धनुष-बाण लेकर उस ब्राह्मण मित्र को बचाने के लिए दौड़ पड़ता है। शरसन्धान करने पर मातलि विदूषक को छोड़कर प्रगट हो जाता है और बताता है कि राजन् ! कालनेमि की सन्तान दुर्जय नामक राक्षसगण इन्द्र के लिए अजेय हैं। अतः इन्द्र ने अपने शत्रु राक्षसों को मारने के लिए आपको आमन्त्रित किया है। ये बाण आप उन्हीं पर छोड़िए, मुझ पर नहीं। विदूषक को पकड़ने का कारण पूछने पर मातलि ने जवाब दिया कि किसी कार्य से आपको दुःखी देखकर वीरोचित कार्य के निमित्त उत्तेजित करने के लिए मैंने आपके मित्र विदूषक को इस प्रकार तङ्ग कर रखा था ।) अनन्तर राजा मन्त्री को राज्य-भार सँभालने का सन्देश विदूषक द्वारा भेजकर इन्द्र के रथ पर सवार होकर स्वर्ग को प्रस्थान कर देता है।
सप्तम अङ्क
राजा दुष्यन्त स्वर्ग जाकर उन कालनेमि प्रसूत दुर्जय राक्षसों को पराजित कर इन्द्र की आज्ञा पूरी करते हैं। बाद उनसे विशेष सत्कृत होकर उन्हीं के रथ से पुनः भारत के लिए लौट पड़ते हैं। रास्ते में किंपुरुषवर्ष का हेमकूट नामक पर्वत दीख पड़ता है, जहाँ देवताओं के पिता ब्रह्माजी के पौत्र, मरीचिनन्दन महर्षि कश्यप अपनी पत्नी दक्षकन्या अदिति के साथ तपस्या में संलग्न हैं। उनके दर्शन की लालसा से राजा रथ से उतर कर एक पेड़ के नीचे रुक जाते हैं और मातलि कश्यप की आज्ञा लेने के लिए चला जाता है, जहाँ कश्यपजी ऋषि पत्नियों के साथ अदिति को पातिव्रत्य धर्म का उपदेश दे रहे थे।
इधर एक बालक शेर के बच्चे के साथ खेलता हुआ दिखाई देता है सिंहशावक को माँ का दूध नहीं पीने देता, जबरदस्ती खींच कर कहता है—मुँह खोलो तुम्हारे दांत गिनूँगा, तथा दो तापसियाँ उसे मना कर रही हैं उस बालक को देखकर राजा का पुत्र-वात्सल्य उमड़ पड़ता है, वे उसे अपनी गोद में खेलाने वाले को धन्य समझते हैं। शेर के बच्चे को छोड़ दूसरे खिलौने के लिए हाथ पसारने वाले उस बालक के हथेली में चक्रवर्ती राजा का चिन्ह देखकर राजा अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। एक तापसी ने यह कहकर कि यह बात से नहीं माननेवाला है उसे खेलने के लिए बनाया गया खिलौना देना ही होगा, यह कहकर मिट्टी के मयूर को लेने के लिए अपनी कुटी में चली जाती है। तब तक दूसरी तापसी इधर-उधर देखकर राजा से निवेदन करती है कि भद्रमुख ! इस बालक ने शेर के बच्चे को जोर से पकड़ रखा है। अतः कृपया इसे छुड़ा दीजिए। तदनुसार राजा शेर के बच्चे से छुड़ाकर उस बालक को अपनी गोद में लेकर स्पर्श सुख का अनुभव करने लगते हैं। दोनों का चेहरा मिलता देखकर वह तापसी आश्चर्यचकित हो जाती है। वह आश्चर्य चरमसीमा पर तब पहुँच जाता है जब वह देखती है कि बालक की कलाई से जमीन में गिरी ताबीज को उठा लेने पर भी उसका कुछ नहीं होता। उस अपराजिता नामक औषधि को कश्यपजी ने बालक के जातकर्म संस्कार के समय बांध दिया था जो माता, पिता और बालक के अतिरिक्त कोई अन्य उठा ले तो वह साँप बनकर उसे डँस देती थी। अब राजा को पूर्ण विश्वास हो गया कि यह मेरा ही औरसपुत्र है। इसके पूर्व तापसियों द्वारा राजा को मालूम हो गया था कि यह पुरुवंश का क्षत्रिय बालक है और एक अप्सरा की पुत्री में उत्पन्न हुआ है, उसके पति ने उसका परित्याग कर रखा है। ये सभी बातें उन्हीं में घटती थीं।
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