भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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यह सुखद समाचार तत्काल तापसियों ने शकुन्तला के पास पहुँचाया, जो पति-प्राप्ति के लिए नियमव्रत में थी, वह उसी वेग में वहाँ आती है, दोनों का मिलन होता है और राजा उसके चरणों पर गिरकर क्षमा माँगते हैं। इतने में मातलि आकर पुत्र और पत्नी के मिलन के सौभाग्य पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए राजा को धन्यवाद देता है और कहता है कि राजन् आपको दर्शन देने के लिए देवमाता के सहित महर्षि कश्यप प्रतीक्षा कर रहें हैं। तब पुत्र, पत्नी और मातलि के साथ राजा ऋषि के पास उपस्थित होकर साष्टाङ्गप्रणाम कर उनकी आज्ञा से सामने बैठ जाते हैं। बाद महर्षि स्नेहभरी दृष्टि से शुभाशीर्वाद देते हुए दोनों से कहते हैं कि आयुष्मन् ! मैंने अपने योगबल से जाना है कि तुमने दुर्वासा के शाप से मोहित होकर इस तपस्विनी का परित्याग कर दिया था। वत्से शकुन्तले ! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो गया, अब तुम दुष्यन्त के प्रति क्रोध नहीं करना। बेटी ! यह तेरा पति इन्द्र के समान, यशस्वी और तुम्हारा यह पुत्र सर्वदमन जयन्त के समान बलवान् तथा तुम इन्द्राणी के समान चिर सौभाग्यवती होओ। तुम तीनों श्रद्धा, धन और विधि के प्रतीक हो, तुम तीनों का यह योग विश्व के कल्याण के लिए हो। इस प्रकार प्रत्यादेश विषय में दोनों को समझा बुझाकर निर्मल हृदय कर देते हैं और अन्त में उन्हें हस्तिनापुर जाने के लिए विदा कर देते हैं।