अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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यह सुखद समाचार तत्काल तापसियों ने शकुन्तला के पास पहुँचाया, जो पति-प्राप्ति के लिए नियमव्रत में थी, वह उसी वेग में वहाँ आती है, दोनों का मिलन होता है और राजा उसके चरणों पर गिरकर क्षमा माँगते हैं। इतने में मातलि आकर पुत्र और पत्नी के मिलन के सौभाग्य पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए राजा को धन्यवाद देता है और कहता है कि राजन् आपको दर्शन देने के लिए देवमाता के सहित महर्षि कश्यप प्रतीक्षा कर रहें हैं। तब पुत्र, पत्नी और मातलि के साथ राजा ऋषि के पास उपस्थित होकर साष्टाङ्गप्रणाम कर उनकी आज्ञा से सामने बैठ जाते हैं। बाद महर्षि स्नेहभरी दृष्टि से शुभाशीर्वाद देते हुए दोनों से कहते हैं कि आयुष्मन् ! मैंने अपने योगबल से जाना है कि तुमने दुर्वासा के शाप से मोहित होकर इस तपस्विनी का परित्याग कर दिया था। वत्से शकुन्तले ! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो गया, अब तुम दुष्यन्त के प्रति क्रोध नहीं करना। बेटी ! यह तेरा पति इन्द्र के समान, यशस्वी और तुम्हारा यह पुत्र सर्वदमन जयन्त के समान बलवान् तथा तुम इन्द्राणी के समान चिर सौभाग्यवती होओ। तुम तीनों श्रद्धा, धन और विधि के प्रतीक हो, तुम तीनों का यह योग विश्व के कल्याण के लिए हो। इस प्रकार प्रत्यादेश विषय में दोनों को समझा बुझाकर निर्मल हृदय कर देते हैं और अन्त में उन्हें हस्तिनापुर जाने के लिए विदा कर देते हैं।
प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण
राजा दुष्यन्त
राजा दुष्यन्त अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के नायक हैं। जाति से ये चन्द्रवंशी क्षत्रिय हैं और इनमें धीरोदात्त नायक के सभी गुण वर्तमान हैं। इनकी चाल ढाल व्यवहार आदि आकर्षक हैं। इनका शरीर लम्बा चौड़ा तथा सुडौल है। इनके सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों पर इनके व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ता है। ये शूरवीर धार्मिक राजा हैं। शिकार खेलने में इनका मन खूब लगता है। इनकी वीरता की इतनी ख्याति है कि देवराज इन्द्र भी अपनी सहायता के निमित्त इन्हें बुलाते हैं। ये बड़े मधुरभाषी हैं, प्रियंवदा इनके मधुर भाषण की प्रशंसा करती है। ये अपने कुल की प्रतिष्ठा का हमेशा ध्यान रखते हैं तथा अपने पूर्वज महाराज पुरु के पावन आचरण से सदा प्रेरणा लेते रहते हैं। ये कोई ऐसा कार्य नहीं कर बैठते हैं जिससे इनके कुल की मर्यादा पर धब्बा लगे। इस प्रकार दुष्यन्त सर्वश्रेष्ठ गुणों के प्रतीक एवं आदर्श राजा हैं।
जिस समय राजा दुष्यन्त तपोवन में प्रवेश करते हैं उस समय उनके दक्षिण बाहु फड़कने से शुभ शकुन होता है। जैसे ही वे आगे बढ़ते हैं वैसे ही कलश लेकर वृक्षों में पानी डालने के लिए आती हुई तीन तापस कन्याओं को देखते हैं। उनमें वल्कल पहने हुए शकुन्तला को देखकर वे मन में सोचते हैं कि इस कृशाङ्गी का सुन्दर शरीर वल्कल के योग्य नहीं, फिर भी वल्कल से इसकी शोभा बढ़ गई है। सहज सुन्दरों को क्या अच्छा नहीं लगता ? क्योंकि सेवार से आवृत रहता हुआ भी कमल सुन्दर मालूम पड़ता है और चन्द्रमा में पड़ा कलंक भी उसकी शोभा बढ़ाता है—
सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति । इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी किमिह मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ।। १।२०
राजा दुष्यन्त को नैतिक चरित्र के विषय में बड़ा आत्मविश्वास था। जब राजा की दृष्टि शकुन्तला के अङ्गों पर पड़ती है। इसके लाल-लाल ओठ अभिनव किसलयों की दीप्ति से स्पर्धा कर रहे हैं। दोनों भुजाएँ कोमल शाखाओं जैसी मनोहर प्रतीत हो रही हैं और नया यौवन लुभावने कुसुम के समान उसके अङ्गों में व्याप्त हो गया है इस रूपसौन्दर्य से राजा का मन चंचल हो जाता है।
महर्षि कण्व के आश्रम में प्रवेश के समय अनुपम सौन्दर्य से मण्डित शकुन्तला को देखकर उसके लावण्य-कान्ति पर मुग्ध होकर प्रशंसा करते हैं और उसे पाने के लिए लालायित हो जाते हैं, फिर भी उनका विवेक ब्राह्मण कन्या के प्रति आकृष्ट होने से रोकता है। उनके मन से विचार उठता है कि क्या यह सम्भव है कि यह महर्षि कण्व की ब्राह्मणेतर भार्या में उत्पन्न हुई हो ! शीघ्र ही निर्णय कर लेते हैं कि अथवा सन्देह करना व्यर्थ है, निश्चय ही यह क्षत्रियों के ग्रहण योग्य है, क्योंकि मेरा पवित्र मन इसे चाहता है। सन्देहास्पद विषयों में सदाचारियों के अन्तःकरण के विचार ही प्रमाण हुआ करते हैं। इस प्रकार दुष्यन्त का आत्मसंयम पर पूर्ण विश्वास था—
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असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा यदार्यमस्यामभिलाषि मे मनः । सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः ।। १।२२
फिर भी सही-सही पता लगाते हैं । दुष्यन्त विवेकहीन कामी पुरुषों के समान अन्धे नहीं बनते, अवसर मिलने पर शकुन्तला की सखियों से पूछ ही बैठते हैं—कुलपति कण्व तो आबाल ब्रह्मचारी हैं, आप लोगों की यह सखी उनकी कन्या कैसे ? जब उन्हें शकुन्तला विषयक सारा रहस्य ज्ञात हो जाता है । अर्थात् यह शकुन्तला अविवाहित है, इसके विवाह का किसी के साथ निश्चय नहीं हुआ है, यह क्षत्रिय की कन्या होने के कारण विवाह के योग्य है, और यह भी मुझे चाहती है। इत्यादि निश्चय हो जाने के अनन्तर ही वे शकुन्तला से गान्धर्व विवाह करते हैं । तपोवन से हस्तिनापुर लौटते समय शीघ्र ही बुलाने का वचन देकर अभिज्ञान के रूप में प्रेम से उसे अपनी अंगूठी दे देते हैं, पर दुर्भाग्यवश दुर्वासा के शाप के प्रभाव से उसकी स्मृति धूमिल हो गई उसे कुछ स्मरण ही नहीं रहा। वे परस्त्री समझकर दरबार में उपस्थित शकुन्तला को ठुकरा देते हैं, फिर भी पाठक उन्हें दोषी नहीं समझते। अंगूठी की प्राप्ति के पश्चात् जब सारी बातें स्मृतिपटल पर आ जाती हैं तब वे पश्चात्ताप की तीव्रता से व्यग्र हो उठते हैं। अतिशय दुःख का अनुभव करते हुए सामयिक उत्सवों से विरत होकर समय बिताते हैं। अन्त में इन्द्रपुरी से लौटते समय महर्षि कश्यप के आश्रम पर शकुन्तला का साक्षात्कार कर उसके पैरों पर गिर कर क्षमा माँगते हुए कहते हैं—
सुतनु हृदयात् प्रत्यादेशव्यलीकमपैतु ते । किमपि मनसः संमोहो मे तदा बलवानभूत् ।। ७।२४
राजा दुष्यन्त समदर्शी आदर्श पति हैं । अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध रहने पर भी इन्हें नैतिकताका सदा ध्यान बना रहता है । नई स्त्री से प्रेम हो जाने पर भी ये पहली स्त्रियों को भूल नहीं जाते । ये अपनी रानियों की भावनाओं को पूरा-पूरा सम्मान करते हैं। पञ्चम अङ्क के आरम्भ में रानी हंसपदिका के उपालम्भ पूर्ण गीत को सुनकर वे उसे सान्त्वना देने के निमित्त माढव्य को भेजते हैं—गच्छ नागरिकवृत्त्या संज्ञापयैनाम् । षष्ठ अंक में प्रमद वन में चित्र पट पर शकुन्तला की छवि देखने में मग्न राजा दुष्यन्त चतुरिका चेटीमें महारानी वासुमती के आने का समाचार सुनकर मानगर्विता महारानी अप्रसन्न होगी, यह सोचकर शकुन्तला के चित्रपट को विदूषक से अन्यत्र भेज देते हैं—वयस्य ! उपस्थिता देवी बहुमानगर्विता च । भवानिमा प्रतिकृतिं रक्षतु । वह वसुमती के सम्मान एवं आदर में कमी नहीं आने देना चाहते हैं । इस प्रकार समदर्शी नायक दुष्यन्त के चरित्र को देखकर सानुमती अप्सरा उसकी प्रशंसा करती है ।
दुष्यन्त एक धर्मपरायण राजा हैं। आदि से अन्त तक उन्होंने धर्मनिष्ठा का पालन किया है। ऋषियों की प्रार्थना पर ही महर्षि कण्व के आश्रम में यज्ञ की रक्षा में संलग्न हैं । उन्हें हस्तिनापुर से आदरणीय मां का सन्देश मिलता है—आगामी चौथे दिन मेरे उपवास की पारणा है उस अवसर पर आपका उपस्थित होना आवश्यक है । माता का यह सन्देश सुनकर वे द्विविधा में पड़ जाते हैं । एक ओर तपस्वियों के यज्ञ का रक्षाकार्य जिसके लिए पहले ही वचन दे चुके हैं दूसरी ओर पूज्या माता का आदेश, क्या हो, कैसे हो । वे बड़ी बुद्धिमानी से दोनों कार्यों को सम्पन्न करने का मार्ग निकालते हैं, विदूषक को मां की सेवा में भेज देते हैं क्योंकि माता ने उसे भी तो पुत्र की भांति ही माना है । दुष्यन्त
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के हृदय में ऋषियों के प्रति अपार आदरभाव है, वे उनकी रक्षा तथा सेवा से प्राप्त पुण्य को अमूल्य निधि समझते हैं वे विदूषक से स्पष्ट कहते हैं—
यदुत्तिष्ठति वर्णेभ्यो नृपाणां क्षयि तत्फलम्।
तपः षड्भागमक्षय्यं ददत्यारण्यका हि नः॥ २।१३
अतः वे ऋषियों के आदेश पालन में अपने को कृतकृत्य समझते हैं। मृगया के शिकारी होते हुए भी वैखानसों के कहने से वे मृग को छोड़ देते हैं उस पर बाण नहीं चलाते। तपोवन की मर्यादा अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए वे विनीतभाव से आश्रम में प्रवेश करते हैं और अपने सैनिकों को आश्रम की मर्यादा का बोध कराते हैं। जब सेना का हाथी तपोवन में गड़बड़ मचाता है तब वे अपने मन में सोचते हैं कि क्या मैं तपस्वियों की दृष्टि में अपराधी ठहराया गया हूँ—कथमपराध्दः तपस्विनामस्मि। द्वितीय अंक में जब तपस्वियों की तरफ से तपोवन की रक्षा के निमित्त निवेदन आता है तब वे कहते हैं कि तपस्वियों की क्या आज्ञा है? किमाज्ञापयन्ति? पञ्चम अंक में जब शकुन्तला के निराकरण से शार्ङ्गरव बड़ी बातें कहता है तब वे क्रुद्ध नहीं होते केवल इतना ही कहकर चुप हो जाते हैं कि विशेषेणाधिक्षिप्तोऽस्मि। सप्तम अंक में मारीच (मरीचिनन्दन कश्यप) ऋषि के आश्रम में ऋषियों के प्रति उनका व्यवहार अपार श्रद्धा को व्यक्त करता है।
उनके आशीर्वाद को अपने भविष्य का मूल-मन्त्र समझते हैं। (देखिए सप्तम अंक का अन्तिम अंश।) दुष्यन्त एक उच्चकोटि के शासक हैं। उनमें तीन गुण प्रमुख हैं (१) कर्तव्य-परायणता (२) प्रजा-प्रेम और (३) लोभ का अभाव। प्रथम अङ्क में जब राजा दुष्यन्त गज के उपद्रव को सुनते हैं तो तत्काल संभ्रान्त होकर कुटी में जाने के लिए उद्यत ऋषि-कुमारियों को सान्त्वना देकर रक्षा के लिए चल देते हैं। द्वितीय अंक में जब दो ब्रह्मचारी तपोवन की रक्षा के निमित्त बुलाने आते हैं तब वे कहते हैं कि आप दोनों आगे-आगे चलें, मैं भी पीछे-पीछे आ ही गया—गच्छतां पुरो भवन्तौ। अहमप्यनुपदासमागत एव। पञ्चम अंक में कञ्चुकी के वाक्य से प्रतीत होता है कि वे प्रतिदिन दरबार में बैठते हैं एवं प्रजाओं के मुकदमों को सुनते हैं। उन्हें शासन तथा राज्य व्यवस्था से फुरसत नहीं मिलती। वे प्रतिदिन मन्त्रियों के कार्यों का स्वयं निरीक्षण किये बिना कोई भी आदेश प्रसारित नहीं होने देते, वे बड़े ही प्रजावत्सल हैं। अपनी प्रजाओं को स्वजनों के समान समझते हैं। षष्ठ अङ्क में वे एक प्रजारञ्जक राजा के समान प्रतिहारी से कहते हैं कि मेरे राज्य में यह घोषणा करा दो कि जिसका जो सम्बन्धी मर गया हो वह राजा दुष्यन्त को अपना वह सम्बन्धी समझे। अर्थात् यदि किसी स्त्री का पति मर गया हो तो मैं उसका पति तो नहीं हो सकता किन्तु यदि किसी का पुत्र, पिता या भाई आदि मर जाय तो मुझे ही उस जगह पर समझे।
येन येन वियुज्यन्ते प्रजाः स्निग्धेन बन्धुना।
स स पापाद्दृते तासां दुष्यन्त इति घुष्यताम् ॥ ६।२३
दुष्यन्त बड़े ही आदर्शमय निर्लोभी राजा हैं। वे अनुचित मार्ग से अपना कोष बढ़ाना नहीं चाहते। जब वे निःसन्तान समुद्रव्यापारी धनमित्र नाम के बनिये के नौका दुर्घटना से मरने का समाचार सुनते हैं तो वे उसके धन को अपने कोष में नहीं मिला लेते, वे इस बात की खोज करते हैं कि उसकी स्त्रियों में से कोई गर्भवती है या नहीं जब उन्हें यह
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पता लगता है कि मृत बनिये की एक स्त्री—अयोध्या के सेठ की कन्या—गर्भवती है तब वे कहते हैं कि वह गर्भस्थ बालक अपने पिता के धन का मालिक है। प्राचीन भारतीय परम्परा के अनुसार राजा दुष्यन्त संगीत और चित्रकला के अनुपम उपासक हैं। पञ्चम अंक के आरम्भ में वे रानी हंसपदिका के मधुर स्वर-संयोग को सुनकर विदूषक से भूरि-भूरि उसकी प्रशंसा करते हैं। उनकी चित्र निर्माण कला का निदर्शन षष्ठ अङ्क में है। उन्होंने शकुन्तला का चित्र स्वयं बनाया था, जिसकी चित्रकारी पर विदूषक तथा सानुमती अप्सरा दोनों मुग्ध हैं—
अहो, एषा राजर्षेर्निपुणता। जाने सख्यग्रतो मे वर्तते।
राजा दुष्यन्त अपने मुँह अपनी तारीफ नहीं करते। जब वे दुर्जयदानवों को पराजित कर तथा इन्द्र से सत्कृत हो लौटते समय मातलि मार्ग में उनकी तारीफ करता है तब वे कहते हैं कि जो कुछ मैंने किया उसका श्रेय मुझको मत दीजिए, वह सब देवराज इन्द्र के प्रभाव का फल है।
दुष्यन्त लम्पट नायक नहीं हैं। यदि वे लम्पट होते तो पञ्चम अङ्क में आत्मसमर्पण करने के निमित्त स्वयं उपस्थित शकुन्तला को राजमहल में दाखिल कर लेते, किन्तु उनकी मनोवृत्ति यह है कि परस्त्री को ध्यान से देखना उचित नहीं है—'अनिर्वर्णनीयं परकलत्रम्।' 'अनार्यः परदारव्यवहारः।' इस अवसर पर उनकी दृढता उनके नैतिक चरित्र को बहुत ऊँचा उठा देती है।
जब गौतमी राजा को याद दिलाने के लिए शकुन्तला का अवगुण्ठन हटाती है तब उसका सौन्दर्य देखकर राजा चकित हो जाता है। तो भी अधर्म के भय से वह उसे स्वीकार करने के लिए उद्यत नहीं होता।
इनकी दृष्टि बड़ी सूक्ष्म है जब ये शिकार खेलते हुए कुलपति कण्व के तपोवन के पास पहुंचते हैं तो झट समझ जाते हैं कि यह तपोवन का भूभाग है। भय से भगाते हुए मृग-का वर्णन, तथा तपोवन के आभोग का वर्णन आदि इनकी सूक्ष्म दृष्टि के परिचायक हैं।
इस प्रकार दुष्यन्त प्रजा संरक्षण में सदा सन्नद्ध रहने वाला अपने समय का एक अप्रतिम धनुर्धर, धार्मिक, तेजस्वी एवं महाप्रतापी राजा हैं—
का कथा बाणसन्धाने ज्याशब्देनैव दूरतः।
हुङ्कारेणेव धनुषः स हि विघ्नानपोहति ॥ ३।१
वस्तुतः कविताकामिनी के विलास कविवर कालिदास ने अपने इस धीरोदात्त नायक राजा दुष्यन्त को बहुत सोच विचार कर प्रस्तुत किया है, इनको सफल शासक के सभी गुणों से अलङ्कृत किया है। ये कर्तव्यनिष्ठ, प्रजावत्सल, निर्लोभी, निर्भय, सहृदय, पराक्रमी, विनीत एवं आत्मप्रशंसा से रहित परमोत्साही व्यक्ति के रूप में अङ्कित किये गये हैं। इनकी जितनी महिमा गाई जाय थोड़ी है।
शकुन्तला
निसर्गसुन्दरी शकुन्तला अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक की मुग्धा नायिका है और कुलपति कण्व की पालिता पुत्री है। इसकी माता मेनका अप्सरा है तथा पिता राजर्षि विश्वा-मित्र हैं इसका प्रसंग इस प्रकार है। एक बार विश्वामित्र मुनि तप में रम रहे थे। उनके उग्रतप से इन्द्र घबड़ा उठे। उन्होंने उनकी तपस्या को भंग करने के लिए देवसुन्दरी
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मेनका अप्सरा को भेजा। एक तो मेनका का त्रिलोकविलक्षण सौन्दर्य पर्याप्त था ही, दूसरी ओर बसन्त का आविर्भाव और मादक बन गया। मेनका के अनुपम हाव-भाव, नृत्य-गीत, चाल ढाल आदि से सम्बलित बसन्त के झोंके से विश्वामित्र जी अपने को बचा न सके। उसे देखते ही वे मुग्ध हो गये उनका मन विचलित हो उठा, तप की गाढ़ी कमाई धूल में मिल गई। परिणामतः मेनका के मिलन से शकुन्तला का जन्म हुआ। मेनका उसे वही छोड़ कर स्वर्ग चली गई और विश्वामित्र आँख मूँद कर पुनः तपस्या में लीन हो गये किन्तु दयालु शकुन्त (पक्षियों) ने उस नवजात शिशु का पालन-पोषण करना प्रारम्भ किया। मालिनी नदी में स्नान करने के लिए जाते हुए महर्षि कण्व की उस पर दृष्टि पड़ी। उसे वे आश्रम में लाये और लालन पालन करने लगे। इस प्रकार शकुन्तला विश्वामित्र-मेनका की कन्या तथा महर्षि कण्व की पोष्य पुत्री है।
शकुन्तला कुलपति कण्व के पावन आश्रम में पलती और बढ़ती है। आश्रम का वातावरण शान्त है अवस्था के साथ-साथ शकुन्तला का शारीरिक सौन्दर्य भी निखर जाता है। वह शैशव, एवं किशोरावस्था को पार कर प्रौढ़ा हो गयी है उसका अनुपम सौन्दर्य बनावटी नहीं स्वाभाविक है। एक दिन हस्तिनापुर का चक्रवर्ती राजा दुष्यन्त शिकार खेलते-खेलते कण्व के तपोवन में जा पहुँचते हैं जहाँ वह अनुपम सुन्दरी एवं सुकुमारी शकुन्तला को देखकर मुग्ध हो जाते हैं समान रूप और अवस्था वाली दो सखियों के साथ छोटे बड़े से वृक्षों को सींचते हुए देखकर राजा अपने मन में सोचते हैं—आश्रम के कार्यों में इसे लगाना ऋषि की विवेकहीनता है।
इदं किलाव्याजमनोहरं वपुः तपःक्षमं साधयितुं य इच्छति।
ध्रुवं स नीलोत्पलपत्रधारया समीलतां छेत्तुमृषिर्व्यवस्यति ॥ १।१६
वस्तुतः शकुन्तला का शरीर सुकुमारलता की भाँति कोमल है, उसका अधर किसलय के समान लाल है, उसकी बाहें लता शाखा के तुल्य मृदु हैं और उसके शरीर पर लुभावना यौवन प्रस्फुटित हो गया है, जिसका संकेत हँसाती हुई प्रियम्वदा उस समय करती है—जब शकुन्तला अनसूया से कहती है कि सखि ! प्रियम्वदा के द्वारा कसकर बाँधी हुई मेरी चोली को जरा ढोली कर दो। तब प्रियम्वदा उपालम्भपूर्वक कहती है—
इसके लिए तुम अपने स्तनों को विशाल बना देने वाली युवावस्था को उलाहना दो मुझे क्यों दोषी बना रही हो—अत्र पयोधरविस्तारयितृ आत्मनो यौवनमुपालभस्व, मां किमुपालभसे ? इससे प्रतीत होता है कि उसके अवयव व्यक्त हो गये हैं। संभवतः वह श्याम वर्ण की है। तृतीय अङ्क में राजा कहता है—हे सुन्दरी ! तुम्हारे श्याम वर्ण के सुन्दर हाथ में सौन्दर्य पाने के लिए चन्द्रमा मृणाल रूप से विद्यमान प्रतीत होता है—अयं स ते श्यामलतामनोहरम् । वह स्त्री रूप से विधाता की विलक्षण सृष्टि है—स्त्रीरत्न-सृष्टिरपरा प्रतिभाति सा मे । उसका रूप न सूँघा गया प्रसून है, नखक्षतविहीन कोमल किसलय है, न विंधा हुआ रत्न है, अनास्वादित अभिनव मधु है और अखण्डित पुण्यों का फल है। इसीसे दुष्यन्त जैसा चक्रवर्ती राजा कण्वाश्रम की ललामभूता शकुन्तला का दर्शन नेत्र का फल मानता है, उसे ही भूमण्डल की दर्शनीय वस्तु समझता है और विदूषक से स्पष्ट कहता है—माधव्य ! अनवाप्तचक्षः फलोऽसि, येन त्वया दर्शनीयं न दृष्टम् । शकुन्तला का पालन-पोषण तपस्वियों के बीच में हुआ है। अतः उसका जीवन तापसकन्या जैसा हो गया है। वह वल्कल पहनती है और शृङ्गार चेष्टाओं से अनभिज्ञ है।
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द्वितीय अङ्क में दुष्यन्त शकुन्तला के रूप सौन्दर्य पर रीझकर विदूषक से कहता है कि ब्रह्मा ने सर्वप्रथम इसकी मूर्त्ति का चित्त में रूपायित किया होगा, बिना मन के सक्रिय सहयोग से इस प्रकार का अद्वितीय स्त्रीरत्न उत्पन्न ही नहीं हो सकता है—
चित्ते निवेश्य परिकल्पितसत्त्वयोगात् रूपोच्चयेन विधिना मनसा कृता नु। स्त्रीरत्नसृष्टिरपरा प्रतिभाति सा मे धातुर्विभुत्वमनुचिन्त्य वपुश्च तस्याः॥ २।६
प्रथम अंक में शकुन्तला की रूपलक्ष्मी से चमत्कृत होकर दुष्यन्त कहता है कि मानवी स्त्रियों में भला ऐसा रूप कहाँ से उत्पन्न हो सकता है। चञ्चल चमक वाली बिजली पृथ्वीतल से थोड़े ही निकल सकती है ?
मानुषीषु कथं वा स्यादस्य रूपस्य संभवः। न प्रभा तरलं ज्योतिरुदेति वसुधातलात्॥ १।२५
तपोवन में रहते-रहते शकुन्तला का प्रकृति से घनिष्ठतम सम्बन्ध हो गया है। वह आश्रम के वृक्ष, लता, एवं पशु-पक्षियों को भी अपने सगे सम्बन्धी समझती है और स्पष्ट कहती है—न केवलं तातनियोग एव, अस्ति मे एतेषु सोदरस्नेहः। उसके हृदय में तपोवन के जड़-चेतन सभी पदार्थों के लिए सहानुभूति है। वह पहले आश्रम के पौधों को जल से सींच लेती है तब स्वयं जल पीती है। यद्यपि उसे मण्डन अतिप्रिय है तथापि वह वृक्षों को कष्ट होने के भय से उनके पल्लव-पुष्प आदि नहीं तोड़ती—
पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या। नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्॥ ४।८
यदि चरते समय आश्रम के मृगों के मुख कुश से कट जाते थे तो उन्हें इंगुदी का तेल लगाकर उनके घावों को अच्छा करती थीं। चतुर्थ अङ्क में आश्रम से विदा होने के समय वह सखियों के समान आश्रमस्थ लता, वृक्ष और मृगों से भी मिलती है। प्रकृति प्रेम की उपासिका शकुन्तला की विदाई के अवसर पर वृक्ष एवं वनदेवताओं ने विविध प्रकार के वस्त्र और आभूषण दिये थे, वृक्षों ने पक्षियों के द्वारा स्वागत गान किये और लताओं ने अपने पुष्पों को बिखेरते हुए अभिनन्दन किया। अनन्तर शकुन्तला के जाते समय सारा तपोवन स्तब्ध-सा हो गया।
शकुन्तला में शालीनता कूट-कूट कर भरी है। वह सुशील तथा लज्जाशील नायिका है। प्रथम अङ्क में राजा दुष्यन्त को देखकर उसके मन में काम-विकार उत्पन्न होता है, परन्तु वह अपनी कामवेदना किसी से नहीं कहती, अपनी सखियों से भी छिपाती है उसके कामजनित हाव-भाव बड़े ही मर्यादित ढङ्ग से होते हैं। जब उसकी कामपीडा अति उग्र हो गई, तब सखियाँ व्यग्र हुईं। उन्होंने बार-बार उस वेदना का कारण जानकर प्रतिकार करने का आग्रह किया। तब कहीं शकुन्तला ने अपनी जबान खोली—सखि ! यतः प्रभृति तपोवनरक्षिता स राजर्षिः मम दर्शनपथमागतः। तपोवन के रक्षक वे राजर्षि जब से मेरी दृष्टि के विषय बने—बस इतना कहकर लज्जा के मारे चुप हो जाती है। प्रथम अंक में जब राजा उसके रूप की सराहना करते हैं तब वह लज्जा से शिर झुका लेती है। आगे जब प्रियम्वदा उसके विवाह की चर्चा चलाती है तब वह वहाँ से हट जाना चाहती है।
5 ५ शा० भू०
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तृतीय अङ्क में मालिनी नदी के पास एकान्त स्थान लता मण्डप में जब राजा उसका अंचल पकड़ना चाहता है तब वह कहती है—पौरव ! चंचलता न कीजिए, अपने विनय की रक्षा कीजिए। कामपीडित होने पर भी मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। पौरव ! रक्ष, रक्ष विनयम्। कामपीडिताऽपि न खल्वात्मनः प्रभवामि।
राजा दुष्यन्त के साथ शकुन्तला का गान्धर्व विवाह हो जाने के अनन्तर वह गर्भवती हो जाती है। राजा हस्तिनापुर जा चुके हैं, कुलपति कण्व सोमतीर्थ से वापस आ गये हैं, उनसे कैसे कहा जाय यह शकुन्तला के सामने एक समस्या उपस्थित थी, किन्तु अग्निशाला में आकाशवाणी ने इस समस्या का समाधान शकुन्तला के सामने प्रस्तुत कर दिया।
शकुन्तला का हृदय मनुष्यों से ही नहीं आश्रमस्थ लता, पादप और पशुपक्षियों से भी प्रेमसूत्र में निबद्ध है। वह सचमुच प्रकृति कन्या तथा निःसर्ग सुन्दरी है। ऐसी द्रवणशील हृदयवाली नारी, कठिनाई से मिलती है। वन की लताओं, वृक्षों, कुसुमों, पशुओं और पक्षियों सभी से उसकी आत्मीयता है। वह उनकी भाषा समझती है और वे भी उसकी भाषा समझते हैं। वह उनकी परिचर्या करती है और वे उसकी मंगल कमना करते हैं। उसकी विदाई के अवसर पर हरिणों ने मुख में चलती हुई कुशा के कौर उगल दिये। मोरों ने नाचना बन्द कर दिया। लताओं ने अपने पीले पत्तों के रूप में आँसू गिराना आरम्भ कर दिया। शकुन्तला सबसे मिलती है और सबसे विदा लेती है। अपनी बहन वनज्योत्स्ना की भुजाओं से लिपटती है, पुत्र के समान पालित मृग को जो मार्ग रोककर खड़ा हो जाता है समझा बुझाकर लौटाती है गर्भ मन्थरा मृगवधू के लिए पिताजी से यह निवेदन करती है जब इसे बच्चा हो जाय तब यह प्रिय सन्देश मेरे पास भेजवा दीजियेगा।
शकुन्तला पतिव्रता पत्नी है अपने पति को अत्यन्त प्रेम करती है। गान्धर्व विधि से विवाह हो जाने पर राजा दुष्यन्त के प्रति उसका प्रेम और बढ़ जाता है। राजा के हस्तिनापुर चले जाने पर उसका मन उन्हीं में निरन्तर लगा रहता है। उनकी तन्मयता में वह अपनी सुधबुध खो बैठती है। सुलभकोप महर्षि दुर्वासा के आने और भिक्षा न पाकर क्रोध से शाप देकर चले जाने का उसको कुछ भी पता नहीं है। वत्सल पिता महर्षि कण्व के आदेश से हस्तिनापुर जाते समय उसके मन में एक प्रकार का उत्साह दिखाई पड़ता है। वहाँ जब राजा शापवस न पहचानने के कारण उसका परित्याग कर देते हैं तब कुछ क्षणों के लिए क्रुद्ध हो जाती है, किन्तु उसका क्रोध अधिक काल तक नहीं रहता। वह दुष्यन्त को दोष न देकर अपने भाग्य को ही कोसती है—नूनं मे सुचरितप्रतिबन्धकं पुराकृतं तेषु दिवसेषु परिणाममुखमासीत्। महर्षि कश्यप के आश्रम में वह विरहिणी के वेश में रहती है। पतिदेव को हृदय में रखकर अपने चरित्र की रक्षा करते हुए वह समय बिताती है—
वसने परिधूसरे वसाना नियमक्षाममुखी धृतैकवेणिः।
अतिनिष्करुणस्य शुद्धशीला मम दीर्घं विरहव्रतं बिभर्ति ॥ ७।२१
इस नाटक के सप्तम अङ्क का उत्तरार्ध शकुन्तला के सुचरित से भरा हुआ है। उसकी तपस्या का ही परिणाम है कि उसका पति उससे मिलता है, पैरों पड़ता है, क्षमा माँगता है और अनुपम सुख भोग के निमित्त पुत्र सहित उसे सादर अपनी राजधानी हस्तिनापुर में ले आता है।
शकुन्तला का स्वभाव बड़ा ही सरल है। जब उसकी सखियाँ उसका मजाक उड़ाती हैं
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तब वह केवल इतना ही कह कर चुप हो जाती है कि यह तुम्हारे मन बात है—एष ते आत्मनश्चित्तगतो मनोरथः। उसकी सखियाँ उसे आज्ञा देती हैं, वह अपने को कुलपति की कन्या होने का घमण्ड नहीं करती। जब राजा दुष्यन्त महर्षि कण्व के आश्रम में प्रवेश करते हैं तब प्रियम्वदा कहती है—सखि शकुन्तले ! जाओ, कुटिया से फलयुक्त अर्ध्यपात्र लाओ, और यह घड़े का जल पैर धोने के लिए काम में आयेगा—हला, शकुन्तले ! गच्छो-टज फलमिश्रमर्घ्यभाजनमुपहर, इदमपि पादोदकं भविष्यति। चतुर्थ अंक में विदाई के समय उसकी सखियाँ उससे कहती हैं यदि राजा तुम्हें न पहचाने तो उसको अंगूठी दिखा देना।—सखि ! यदि नाम स राजर्षिः प्रत्यभिज्ञानमन्थरो भवेत्तदा अस्येदमात्मनो नामधेयाङ्कितमङ्गुलीयकं दर्शयिष्यसि। यह सुनकर शकुन्तला का हृदय काँप उठता है। उस समय सखियाँ कहती है—सखि ! मा बिभेहि स्नेहः पापम-शङ्कते। सखियों का इतना कहना ही उसकी घबराहट से दूर करने के लिए पर्याप्त है। उसने उस पर पुनः कोई प्रश्न नहीं किया। शकुन्तला काव्यकला में भी निपुण है। प्रणय पत्रिका में लिखने के निमित्त वह स्वयं पद्य बनाती है।
शकुन्तला के मन में पूजनीय गुरुजनों के प्रति अत्यन्त श्रद्धा है। वह जानती है कि स्वतन्त्रता पूर्वक कोई काम करने पर गुरुजनों का अनादर होता है। तृतीय अंक में लता-मण्डप के अन्दर जब राजा उससे कहता है कि बताओ, इस समय तुम्हारी क्या सेवा करूँ—नलिनीदल से पंखा करूँ या पैर दबाऊँ ? इस पर शकुन्तला कहती है—मै आप जैसे माननीय पुरुष के निकट अपने को अपराधिनी नहीं बनाऊँगी—न माननीयेषु जनेषु आत्मानमपराध्यिष्यामि। अपने धर्मपिता महर्षि कण्व के प्रतिविशेष आदर एवं प्रेम करती है। चतुर्थ अङ्क में तपोवन से हस्तिनापुर को प्रस्थान करते समय वह कण्व के चरणों पर गिर पड़ती है। उसे उन्हें छोड़कर आगे जाते नहीं बनता पर—जाओ, तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो—यह कह कर कण्व जी उसे भेजते हैं। जब शार्ङ्गरव आदि उसे दुष्यन्त के दरबार में छोड़कर जाने लगते हैं तब वह भी उनके पीछे-पीछे जाने लग जाती है, पर शार्ङ्गरव घूमकर डांटते हुए उसे कहता है कि अयि दोपकारिणि ! यह क्या तू स्वतन्त्रता का अवलम्बन करना चाहती है—आ पुरोभागे ! किमिदं स्वातन्त्र्यमवलम्बसे। इसपर वह डर के मारे कापने लगती है, आगे नहीं बढ़ती। सप्तम अङ्क में दुष्यन्त से पुनः मिलने पर वह उनके साथ महर्षि कश्यप और अदिति के सामने जाने में लजाती है। जब दुष्यन्त कहते हैं कि प्रिये ! बच्चे को संभालो तुम्हें आगेकर मैं देवपिता का दर्शन करना चाहता हूँ, तब शकुन्तला कहती है। आर्यपुत्र के साथ गुरुजन के समीप जाने में मुझे शरम मालूम पड़ती है—लज्जे खलु आर्यपुत्रेण सार्द्धं गुरुजनसमीपं गन्तुम्।
कालिदास ने उपेक्षिता कलंकिता शकुन्तला को कण्व के आश्रम में न भेजकर गहरी काव्यात्मक सहृदयता का परिचय दिया है। वह अब पहले जैसी नहीं थी विश्व के साथ उसका सम्बन्ध बदल गया था। इस प्रकार शकुन्तला का चरित्र न केवल संस्कृत जगत् में ही आदर्श माना जाता है अपितु विश्वसाहित्य में आदर्श के रूप में देखा जाता है जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा पाश्चात्य विद्वानों ने भी मुक्तकण्ठ से की है। मधुरभाषिणी, कोकिलकण्ठी शकुन्तला ने यदि अभिनव यौवन की उमंग में राजा दुष्यन्त के साथ गान्धर्वविधि से विवाह न किया होता तो कोई भी विचारवान व्यक्ति उनके चारित्रिक दुर्बलता पर अंगुली नहीं उठा सकता था। धन्य है वह दुर्जय मदनलीला, जो देव-
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दानव, ऋषि-महर्षि, ज्ञानवान् मानव और पशु-पक्षी कीट पतङ्ग आदि को भी व्यग्र बना देती है।
कण्व ऋषि
महर्षि कण्व आश्रम के कुलपति हैं। कुलपति उसे कहते हैं जो प्रतिदिन दश हजार विद्यार्थियों को अपने आश्रम में रखकर पढ़ाता है और उनके भरण पोषण एवं रहने का प्रबन्ध करता है।
मुनीनां दशसाहस्रं योऽन्नदानादिपोषणात् ।
अध्यापयति विप्रर्षिरसौ कुलपतिः स्मृतः ॥
उनका दूसरा नाम काश्यप भी है। क्योंकि वे महर्षि मरीचिनन्दन कश्यप के पुत्र हैं। वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं। उनका पुनीत आश्रम मालिनी नदी के तट पर तथा यज्ञशाला से अलंकृत है। वे श्रौतविधि से प्रतिदिन अग्निहोत्र करने वाले ब्रह्मर्षि हैं उन्हें शकुन्तला को राजा दुष्यन्त द्वारा गान्धर्व विवाह के बाद गर्भवती होने का समाचार सर्वप्रथम अग्निशाला में आकाशवाणी बतलाती है वे अपने अनुपम तपोबल से त्रिकाल का रहस्य हस्तामलकवत् जान लेते हैं। वे स्नान, सन्ध्या कर्मानुष्ठान में निरत धार्मिक भावना से ओतप्रोत उदार हृदय वाले एवं तेजस्वी ब्राह्मण हैं उनके तपोबल का प्रभाव चतुर्थ अङ्क में शकुन्तला के विदाई के समय देखते बनता है, जिससे प्रभावित होकर वृक्ष एवं वन देवताओं ने विविध प्रकार के दिव्य वस्त्र आभूषण आदि प्रस्तुत किये हैं।
शकुन्तला महर्षि कण्व की पोष्यपुत्री है। वे जननी-जनक विहीन शकुन्तला का अपनी औरस पुत्री के समान लालन-पालन करते हैं। शकुन्तला के प्रतिकूल दैव को शान्त करने के निमित्त वे सोमतीर्थ की यात्रा करते हैं। वे शकुन्तला की शालीनता से अत्यन्त सन्तुष्ट हैं। अपनी अनुपस्थिति में वे अतिथिसत्कार का भार व्यवहारकुशल शकुन्तला को सौंपते हैं। शकुन्तला के पतिगृहगमन के समय उनकी सारी ममता उमड़ पड़ती है। सगे पिता के समान शोक उन्हें व्याकुल कर देता है आंखों में आंसू आ जाते हैं उनका गला रुँधने लगता है, दृष्टि जड़ हो जाती है, हृदय धबड़ाने लगता है, तपस्वी होने पर भी वे अपने दुःख के वेग को रोक नहीं पाते। वे अपने मन में विचार करते हैं जब मेरे सदृश अरण्य-वासी मनुष्य की कन्या के प्रेम से ऐसी दशा हो जाती है तो सांसारिक जनों की क्या दशा होती होगी। ‘वत्से ! मामेव जड़ीकरोषि।’ ‘अपयास्यति मे शोकः कथं नु वत्से।’ ‘वत्से ! किमेवं कातरासि।’ ‘वत्से ! एहि परिष्वजस्व मां सखीजनं च।’ ‘वत्से ! त्वमिदानीमनुशासनीयासि।’ ‘वत्से ! अलं रुदितेन’ ‘स्थिरा भव वत्से !’ ‘नेदं विस्मरिष्यामि।’ ‘अनसूये ! प्रियंवदे ! गता वां सहचरी।’ इत्यादि महर्षि कण्व की उक्तियाँ वात्सल्य से भरी हुई हैं। वस्तुतः शकुन्तला के प्रति उनका वात्सल्य निःस्वार्थ, आदर्श तथा अनुकरणीय तथा स्पृहणीय है।
कण्व का तपोबल अपार है जिससे प्रभावित होकर राजा दुष्यन्त तृतीय अङ्क में कहते हैं—‘जाने तपसो वीर्यम्।’ महर्षि कण्व की उपस्थिति में राक्षस उनके तपोवन के पास नहीं पहुँच पाते, उनकी अनुपस्थिति में ही वे उपद्रव मचाते रहते हैं। तपोबल के प्रभाव से उन्हें त्रिकाल की बातें ज्ञात हो जाती हैं। सप्तम अंक में जब दुष्यन्त से शकुन्तला के मिलन का समाचार शिष्य द्वारा सुना देने के लिए अदिति महर्षि कश्यप से कहती हैं तब वे
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कहते हैं कि तपस्या के प्रभाव से कण्व को शकुन्तला के दुष्यन्त से पुनर्मिलन का वृत्तान्त अवगत हो गया है—तपः प्रभावात् प्रत्यक्षं सर्वमेव तत्र भवतः कण्वस्य।
चतुर्थ अङ्क में महर्षि कण्व के तपोबल का प्रभाव अद्भुत एवं आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। शकुन्तला की विदाई के समय वृक्षों ने माङ्गलिक वस्त्र एवं चरण-रञ्जन के लिए महावर दिये। वनदेवियों ने आभूषण दिये तथा प्यारी सखियों ने उसे पहनाकर चित्र के समान शकुन्तला को अलङ्कृत किया।
मुनित्रय
शाकुन्तल में तीन ऋषि अङ्कित हैं और तीनों का स्वभाव भिन्न-भिन्न है। एक तो महर्षि दुर्वासा हैं जिनको थोड़े में ही क्रोध आ जाता है और दारुण शाप दे बैठते हैं। इन्हीं के शाप के परिणाम-स्वरूप शकुन्तला को कुछ दिनों तक दुःख भोगना पड़ा था। दूसरे महर्षि हैं कुलपति कण्व। ये दुर्वासा की तरह ही तपोनिष्ठ, महाप्रभावशाली और अन्तर्यामी हैं किन्तु कण्व और दुर्वासा में अत्यन्तवैषम्य है। दुर्वासा जी अत्यन्त क्रोधी हैं तो कुलपति कण्व अतिशान्त। वे निष्ठुर हैं तो ये कोमलहृदय और अत्यन्त दयालु। उन्हें शकुन्तला अकस्मात् वन में माता-पिता से परित्यक्त मिली तो उन्होंने दया से अपनी पुत्री के समान पालन-पोषण किया, विविध प्रकार से शिक्षित किया उसके प्रतिकूलदैव को शान्त करने के लिए सोमतीर्थ की यात्रा की। शकुन्तला मानो कुलपति का प्राण है—सा कुलपतेरुच्छ्वसितमिव। उनकी अनुपस्थिति में उसने राजा दुष्यन्त के साथ अपना गान्धर्व-विवाह कर लिया। इससे वे नाराज नहीं हुए, प्रत्युत उन्होंने उसका समर्थन करके उसको तत्काल पतिगृह भेज दिया। और उन्होंने अपना आशय इस प्रकार व्यक्त किया—दृष्ट्या धूमाकुलितदृष्टेरपि यजमानस्य पावके एवाहुतिः पतिता। तीसरे ऋषि हैं—मरीचिनन्दन कश्यप। उनके आश्रम में सब स्वर्गीय सुखसाधन हैं परन्तु उसमें आसक्त न होकर वे तपस्या करते रहते हैं। वे इन्द्र आदि देवताओं के पिता हैं, भगवान् विष्णु वामनावतार में उनके पुत्र हुए थे। वे आप्तकाम हैं, फिर भी लोककल्याण के निमित्त तपश्चर्या में लग्न रहते हैं। इनके पुनीत आश्रम में दुष्यन्त द्वारा परित्यक्ता शकुन्तला को आश्रय मिला। इनके पातिव्रतधर्म के उपदेश से उसे मानसिक शान्ति मिली। जब उसे पुत्र पैदा हुआ तब उन्होंने उस बालक के जातकमीदि संस्कार किये। इन्हीं के आश्रम पर पुत्र सहित शकुन्तला पुनः पति से मिलकर सुखी हुई। ऐसे ज्ञाननिष्ठ, लोकहितैषी एवं सर्वसम्मान्य महात्मा के आशीर्वाद के द्वारा इस नाटक की समाप्ति करने में कवि ने अत्यन्त औचित्य प्रदर्शित किया है।
तपस्वी होते हुए भी महर्षि कण्व बड़े व्यावहारिक हैं। उनका हृदय सहानुभूतिपूर्ण है। जब उन्हें आकाशवाणी द्वारा राजा दुष्यन्त के साथ शकुन्तला के सम्बन्ध का पता चलता है तब वे धर्मतः विचार कर अपनी अनुमति दे देते हैं। उनके मत में क्षत्रियों के लिए गान्धर्व-विवाह उत्तम प्रकार का विवाह है। वे शकुन्तला को विदा करते समय राजा दुष्यन्त को जो सन्देश भेजते हैं, वे सरल, स्वाभाविक सारगर्भित एवं ध्यान देने योग्य हैं। वे अपनी कन्या शकुन्तला के लिए राजा की अन्य पत्नियों के समान पद चाहते हैं, उनके अनुसार अन्य सब पदार्थ तो भाग्य के आधीन होते हैं। शकुन्तला के लिए दिया गया उपदेश तो स्वर्णाक्षरों में अङ्कित करने लायक है। उसका मूल्य निर्धन महिला से लेकर महारानी तक के लिए समान है। उस आदर्श उपदेश में भारतीयता भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। वे
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बिलखती हुई शकुन्तला को गृहिणी के कर्त्तव्य का उपदेश देते हैं कि श्वसुरगृह में जो लोग बड़े हों उनकी यथाविधि सेवा करना, सौतों के साथ सहेलियों जैसा व्यवहार करना, कभी किसी कारणवश पति अपमान करे तो उससे झगड़ना मत, सेवकों के साथ उदारता का व्यवहार करना, और सम्पत्ति के समय भोगों में आसक्त होकर अहंकार नहीं करना, इस प्रकार का व्यवहार करने वाली कुल-वधुएँ अनायास ही गृहिणीपद प्राप्त कर लेती हैं तथा प्रतिकूल चलने वाली स्त्रियाँ कुल के दुःख का कारण बनती हैं। शकुन्तला अपने साथ सखियों से चलने का आग्रह करती है पर महर्षि कण्व अनसूया और प्रियंवदा को शकुन्तला के साथ नहीं भेजते, क्योंकि उनका भी विवाह करना है। वे युवती कुमारी कन्याओं को विवाहिता कन्या के साथ उसके ससुराल भेजना उचित नहीं समझते, क्योंकि यह भारतीय परम्परा एवं मर्यादा के प्रतिकूल अव्यावहारिक कार्य है—वत्से ! इमे अपि प्रदेये, न युक्तमनयोस्तत्र गन्तुम्, त्वया सह गौतमी यास्यति। यह कह कर बड़ी बुद्धिमानी से शकुन्तला के आग्रह को टाल देते हैं।
वे कन्या को धरोहर समझते हैं। और उसके भार का सँभालना वे बड़ी सतर्कता तथा योग्यता का काम मानते हैं। कण्व जी शकुन्तला को अपने पति के घर भेजकर अपनी अन्तरात्मा में विशदता का अनुभव करते हैं।
अर्थो हि कन्या परकीय एव तामद्य सम्प्रेष्य परिग्रहीतुः।
जातो ममायं विशदः प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा ॥ ४।२२
पति के घर जाने को उद्यत शकुन्तला जब महर्षि कण्व के गले में लिपट कर कहती है कि पिता जी ! आपकी गोद से बिछुड़ी हुई मैं मलय पर्वत से उखाड़ी गई चन्दनलता की भाँति दूसरे देश में कैसे जीवन को धारण कर सकूँगी ? तब कण्व जी बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से उसकी व्यग्रता को दूर करते हुए समझाते हैं बेटा ! तुम अतिकुलीन पति के प्रशंसनीय गृहिणी पद पर स्थित होकर उसके ऐश्वर्य कार्यों में हमेशा व्यस्त रहोगी और शीघ्र ही जिस प्रकार पूर्व दिशा पावन सूर्य को जन्म देती है उसी प्रकार पवित्र चक्रवर्ती पुत्र को पैदा कर मेरे विरहजन्य शोक को भूल जाओगी। अतः घबड़ाओ मत, स्वस्थ चित्त से पति के घर जाओ। कण्व जी के मतानुसार दुःख का सबसे उत्तम औषध समय-यापन है। कुछ समय बीतने पर दुःख अपने आप कम हो जाता है।
परिवार के किसी व्यक्ति के परदेश चले जाने पर घर के लोगों को अपना घर सूना लगने लगता है। इसका कारण प्रेम होता है। कुछ दिनों के बाद विरह भूल जाता है और मन धीरे-धीरे स्वस्थ हो जाता है। इस रहस्य से कण्व खूब परिचित हैं। शकुन्तला के चले जाने से बाद प्रियम्वदा और अनसूया महर्षि कण्व से कहती हैं—तात ! हमलोग शकुन्तला से शून्य इस तपोवन में कैसे प्रवेश करें—तात ! शकुन्तला विरहितं शून्यमिव तपोवनं कथं प्रविशावः। इस पर महर्षि कण्व कहते हैं—प्रेम के कारण ऐसा अनुभव हो रहा है, चलो कुछ दिनों के बाद सब ठीक हो जायेगा। इस प्रकार महर्षि कण्व का विशुद्ध जीवन गंगा के प्रवाह के समान परम पवित्र है, हिमालय की भांति उज्ज्वल है, समुद्र के समान गम्भीर तथा त्रिवेणी की तरह तरल है। इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय थोड़ी ही है।
कण्व की शिक्षा में भारतीय धर्म की मर्यादा बोल उठी है। कवि की वर्णाश्रम धर्म के प्रति आस्था तथा कौटुम्बिक कर्त्तव्यों के प्रति जागरूकता का सुन्दर प्रतिपादन इस प्रसंग में
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सम्पन्न हुआ है। सम्पूर्ण अङ्क में स्नेह और सौहार्द की जो पवित्र मन्दाकिनी प्रवाहित हुई है उससे वस्तुतः हमारी संस्कृति के सनातन सन्देश प्रतिध्वनित होते हैं।
विदूषक
अभिज्ञानशाकुन्तल के विदूषक का नाम माढव्य है। विदूषक हास्यरस का पात्र है वह वेश, वाणी आदि के द्वारा राजा का मनोविनोद करता है। यह जाति का बकवादी ब्राह्मण है और खूब खब्बू है, क्योंकि बीच-बीच में इसे लड्डू खाने की याद आती रहती है। यह हाथ में हमेशा टेढ़ा ठण्डा लिए रहता है। यह स्वभाव से डरपोक है, राक्षसों के भय से यह शकुन्तला को देखने के लिए नहीं जाता। यह उम्र में राजा से छोटा प्रतीत होता है क्योंकि यह अपने को राजा का अनुज तथा युवराज कहता है। जिस समय राजा दुष्यन्त माताओं के उपवास व्रत का सन्देश सुनकर पुत्रकृत्य सम्पादन के लिए विदूषक को राजधानी भेजते हुए कहते हैं कि मित्र ! मेरी माँ तुझे भी पुत्र की तरह मानती है। अतः तुम जाकर मां के पुत्र के कार्य का सम्पादन करो, मैं तपोवन की रक्षा कार्य में लगा हूँ। उस समय विदूषक कहता है तब तो जिस प्रकार राजा के छोटे भाई को जाना चाहिए उस प्रकार मैं जाऊँगा—यथा राजानुजेन गन्तव्यं तथा गच्छामि। तेन हि युवराजोऽस्मीदानीं संवृत्तः।
विदूषक राजा का अन्तरङ्ग मित्र होता है। अतः राजा उससे रहस्य की गुप्त बातें भी बताते रहते हैं। अतः द्वितीय अङ्क में राजा दुष्यन्त शकुन्तला के साथ चल रहे प्रेम प्रसंग को एकमात्र विदूषक से ही कहते हैं। यह परिवार का विश्वसनीय व्यक्ति है। पञ्चम अङ्क में रानी हंसपदिका को समझाने के लिए राजा इसी को भेजते हैं यद्यपि प्रेम के सभी कार्यों में यह राजा का आन्तर सहायक है फिर भी राजा इसे चपल ही समझते हैं। वे इसे राजधानी भेजते समय मन में विचारते हैं कि यह ब्राह्मण बालक बड़ा चञ्चल है, कहीं शकुन्तला विषयक मेरे अनुराग को अन्तःपुर की स्त्रियों से न कह दे। अतः अब मैं इस प्रकार कहता हूँ। (विदूषक का हाथ पकड़कर) मित्र ! ऋषियों के गौरव के कारण में आश्रम में जा रहा हूँ। वस्तुतः तापसकन्या शकुन्तला पर मेरी आसक्ति नहीं है—वयस्य ! ऋषिगौरवादाश्रमं गच्छामि। न खलु सत्यमेव तापसकन्यकायां ममाभिलाषः।
क्व वयं क्व परोक्षमन्मथो मृगशावैः सममेधितो जनः।
परिहासविजल्पितं सखे ! परमार्थेन न गृह्यतां वचः॥ २।१८
मित्र ! देखो, भोगविलास में आसक्त कहाँ हम लोग तथा कहाँ मृग के बच्चों के साथ पली हुई कामवासना से विरत मुनिकन्या शकुन्तला। इसलिए हँसी में कही गई इस बात को तुम सही मत समझना। राजा की कही हुई इस बात को माधव्य सच्चा समझकर अपने मुख में ताला लगा लेता है। विदूषक राजा का मुंहलगा व्यक्ति है।
यह समय समय पर उससे खूब हँसी करता है। कभी कभी राजा की कमजोरी का लाभ उठाकर यह उसे बेवकूफ भी बनाता है जैसे षष्ठ अंक में चित्रपट पर अङ्कित शकुन्तला के चित्र को देखते समय यह भौंरे की बात इस प्रकार उठाता है कि राजा उसे सच्चा भौंरा समझ कर बहुत कुछ कह जाते हैं। अन्त यह उसे याद दिलाता है कि यह तो चित्र का भौंरा है—भो चित्रं खलु एतत्।
राजा के साथ माधव्य की मैत्री का अन्यलोग भी लाभ उठा लेते हैं, वे जानते हैं कि राजा के सामने भेद नहीं खोलेगा। द्वितीय अङ्क में राजा के साथ मृगया सम्बन्धी बातें करने
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के पूर्व सेनापति इसे अपनी तरफ मिला लेता है। वह समझता है कि राजा इसका कहना नहीं टालेगा। वस्तुतः हुआ भी वही, विदूषक ने अपने विकृत अंग-भंग का प्रदर्शन कर मृगया से विश्राम ले ही लिया। विदूषक को बोलने की पूर्ण स्वतन्त्रता है। वह जिसे जो चाहे कह सकता है। हँसी में कही हुई इसकी बातों को कोई बुरा नहीं मानता। यह सेनापति को कहता है—त्वं तावत् दास्याः पुत्रः जीर्णऋक्षस्य मुखे निपतितो भविष्यसि। तू दासी का बेटा एक वन से दूसरे वन में घूमता हुआ मनुष्य के नाक के लालची किसी बूढ़े भालू के मुँह में पड़ जायेगा—यह राजा को भी एकवचन से ही सम्बोधित करता है। यह ऊपर से तो बेवकूफ मालूम पड़ता है, किन्तु अन्दर से अत्यन्त चतुर है। जब द्वितीय अङ्क में इससे एकान्त में बातें करने के अभिप्राय से राजा रैवतक आदि सेवकों को अपने कार्यों पर भेज देते हैं तब यह उनका आशय ताड़ जाता है और कहता है—आपने तो इस समय इस स्थान को मक्षिका से शून्य कर दिया—कृतं भवता साम्प्रतं निर्मक्षिकम्।
यह अपने वचनों के द्वारा राजा का मनोविनोद करता रहता है। द्वितीय अंक में जब शकुन्तला को लक्ष्य कर राजा कहता है कि मित्र ! तू नेत्र-फल से वंचित है, क्योंकि तूने देखने योग्य वस्तु नहीं देखी—अनवाप्तचक्षुः फलोऽसि। येन त्वया दर्शनीयं न दृष्टम्। इस पर वह कहता है, अजी आप तो मेरे सामने हैं ही—ननु भवानग्रतो मे वर्तते। पुनः आगे राजा शकुन्तला की चर्चा करता है तब वह हँस कर कहता है कि जैसे पिण्डखजूर से ऊबे हुए व्यक्ति की इमली खाने की इच्छा होती है वैसे ही स्त्रीरत्नों का उपभोग करने वाले यह वनचरी शकुन्तला विषयक आपकी इच्छा है। यथा कस्यापि पिण्डखर्जूरैरुद्वेजितस्य तिन्तिण्यामभिलाषो भवेत् तथा स्त्रीरत्नपरिभोगिणो भवत इयमभ्यर्थना। फिर भी राजा कहता है वयस्य ! अभी तुमने उसे देखा नहीं जिससे ऐसा कह रहे हो। मित्र ! अधिक क्या कहूँ मुझे तो वह ब्रह्मा की विलक्षणा सृष्टि प्रतीत हो रही है। इस पर वह पुनः कहता है कि यदि वह ऐसी स्त्रीरत्न है तो आप इसे शीघ्र बचाइए, कहीं इंगुदी के तेल से चिकने शिरवाले दढ़ियाले किसी तपस्वी के हाथ न पड़ जाय—तेन हि लघु परित्रायतामेनां भवान्। मा कस्यापि तपस्विन इङ्गुदीतैलचिक्कण शीर्षस्य हस्ते पतिष्यति। पुनः विदूषक राजा से पूछता है कि वयस्य आपके प्रति उसका अनुराग कैसा है ? तब राजा कहता है—मेरे सामने पड़ने पर उसने अपनी आंखें हटा लीं, दूसरे बातचीत के प्रसंग में हँस दिया। शील के कारण काम भाव न तो प्रकट किया, न छिपाया ही। इस पर विदूषक कहता है तो क्या देखते ही वह आकर आपकी गोद में बैठ जाती है ?—न खलु दृष्टमात्रस्य तवाङ्कं समारोहति। राजा पुनः कहता है—मित्र ! सखियों के साथ जाने के समय शकुन्तला ने शालीनता के साथ मेरे प्रति प्रेम-भाव प्रगट किया। वह कुछ कदम जाकर कुश के अंकुर से मेरे पैर बींध गये हैं ऐसा कहकर रुक गई और वृक्षों की टहनियों में न फँसे हुए भी वस्त्र को छुपाती हुई मेरी तरफ मुख कर खड़ी हो गई। यह सुनकर अन्त में विदूषक कहता है कि तब तो आपने इस तपोवन को क्रीडावन ही बना लिया है—तेन हि कृतं त्वयोपवनमिति पश्यामि।
इस प्रकार विदूषक केलि-कलह प्रिय, हास्यकारी राजा का सहचर माना गया है और वह अपने वेश-अङ्ग और वचनों के द्वारा हास्य करता रहता है—विकृताङ्गवचोवेशैर्हास्य- कारो विदूषकः।
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शार्ङ्गरव-शारद्वत
शार्ङ्गरव तथा शारद्वत ये दोनों महर्षि कण्व के व्यवहारज्ञ एवं आज्ञाकारी शिष्य हैं। महर्षि इनका विश्वास करते हैं और इनके नाम के आगे सम्मान सूचक मिश्र शब्द का प्रयोग करते हैं। क्व नु ते शार्ङ्गरव-शारद्वतमिश्राः । इससे इनकी विद्या, अवस्था और व्यवहार-कुशलता सिद्ध होती है। ये दोनों करीब २५ वर्ष के प्रौढ युवक हैं। इन दोनों में शारद्वत की अपेक्षा शार्ङ्गरव बड़ा प्रतीत होता है, और दल का नेता है क्योंकि कुलपति कण्व दुष्यन्त के लिए उसी से सन्देश भेजते हैं—शार्ङ्गरव ! त्वया मद्द्वचनात् स राजा शकु-न्तलां पुरस्कृत्य वक्तव्यः । दोनों परस्पर एक दूसरे का आदर करते हैं और दोनों के मन में गुरुभक्ति है। वे दोनों केवल तपस्वी ही नहीं हैं, व्यवहारज्ञ भी हैं। शकुन्तला की विदाई के समय आश्रम से कुछ दूर जाकर दोनों महर्षि से कहते हैं कि—भगवन् ! हमने सुना है कि सरोवर तक ही प्रियजनों को पहुँचाने जाना चाहिए। अतः यह सरोवर का तट है। हमको सन्देश बताकर यहाँ वट वृक्ष के नीचे बैठकर आप वापस जा सकते हैं—भगवन् ! ओदकान्तं स्निग्धो जनोऽनुगत स्निग्धो जनोऽनुगन्तव्य इति श्रूयते ।
महर्षि कण्व के दोनों शिष्य राज दरबार के शिष्टाचार को भलीभाँति जानते हैं। राजा दुष्यन्त के समक्ष जाते ही दोनों हाथ उठाकर उसे आशीर्वाद देते हैं। हस्तिनापुर में दुष्यन्त के द्वारा शकुन्तला का तिरस्कार करने पर जब शार्ङ्गरव राजा दुष्यन्त से उत्तेजना पूर्ण बातें कर रहा था तब शारद्वत उसे शान्त करते हुए कहता है—शार्ङ्गरव ! उत्तर प्रत्युत्तर से क्या लाभ है ? हमने गुरुजी का सन्देश कह दिया गया है, अब हम लोग लौट चलें—शार्ङ्गरव ! किमुत्तरेण, अनुष्ठितो गुरोः सन्देशः प्रतिनिवर्त्तामहे वयम् । दोनों मिल-जुलकर परस्पर परामर्श से काम करते हैं। दोनों को तपोवन से प्रेम तथा नगर से नफरत है। राजमहल में पहुँचकर दोनों एक दूसरे से अपना-अपना अनुभव बताते हैं।
दोनों के चरित्रों में अन्तर भी है। शार्ङ्गरव भावना की धारा में बहता है, वह वन मे रहने का अभ्यस्त है, उसे एकान्त प्रिय लगता है। उसको राजमहल ऐसे लग रहा है जैसे उसमें से आग की लपट निकल रही हो—जनाकीर्णं मन्ये हुतवहपरीतं गृहमिव । इसके विपरीत शारद्वत के विचार दार्शनिक हैं; उसमें दूसरों के प्रति सहानुभूति है। शार्ङ्गरव दुर्वासा के सदृश अपने तप एवं ब्रह्मतेज के सामने किसी को नहीं समझता। राजा दुष्यन्त जिस समय आश्रम में पधारे थे उस समय गुरुपुत्री शकुन्तला की सहमति के कारण शार्ङ्गरव शान्त ही बना रहा किन्तु आज कुलपिता ने चोरी करने वाले राजा दुष्यन्त को जब वही सम्पत्ति समर्पित कर दी और वह लेने से इनकार कर रहा है, आज उसे पहचान भी नहीं रहा है, गुरुपुत्री बिलख रही है, सब समझ रहे हैं, अभिमानी राजा मान ही नहीं रहा है। ऐसी परिस्थिति में शार्ङ्गरव ने जो कुछ कहा वह मानवोचित एवं समयोचित कर्तव्य है।
शारद्वत मितभाषी अक्रोधी, सहिष्णु तथा शान्त प्रकृति का व्यक्ति है, किन्तु शार्ङ्गरव बहुत बोलता है और क्रोधी भी है। शार्ङ्गरव और राजा के विवाद के उग्र रूप धारण करने पर शारद्वत उसे शान्त करता हुआ कहता है—शार्ङ्गरव ! विरम त्वमिदानीम् । शकुन्तला से कहता है कि अब तुम राजा को विश्वास दिलाओ—शकुन्तले ! दीयतामस्यै प्रत्यय-प्रतिवचनम् । अन्त में वह राजा से कहता है शकुन्तला आपकी पत्नी है, आप इसे रखें या छोड़ें, इस पर आपका अधिकार है। अब हम लोग जाते हैं—तदेषा भवतः पत्नी त्यज वैनां ग्रहण वा । इस प्रकार कालिदास ने शारद्वत की अपेक्षा शार्ङ्गरव का चरित्र अधिक
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विकसित किया है। वह अपने गुरु को सर्वज्ञ एवं सर्वसिद्धिसम्पन्न समझता है—न खलु कश्चिदविषयो नाम धीमताम्। पञ्चम अङ्क में राजा दुष्यन्त से बातें करते समय कहता है कि राजन् ! सिद्ध पुरुषों का मंगल सदैव उनके अधीन रहता है—राजन् ! स्वाधीन-कुशला सिद्धिमन्तः। शार्ङ्गरव तपोवन निवासियों को सत्यभाषी तथा राजनीतिज्ञों को असत्य बोलने वाला एवं दगाबाज समझता है। पञ्चम अंक में वह कहता है कि—आजन्मनः शाठ्यमशिक्षितो यः तस्या प्रमाणं वचनं जनस्य। उसकी इस उक्ति का तात्पर्य है कि राजनीतिज्ञों से सत्य और न्याय की आशा करना भूल है। शार्ङ्गरव स्त्री स्वातन्त्र्य का समर्थक नहीं है। जब वह शकुन्तला को राजा के पास छोड़कर अपने दल से साथ जाने लगता है तो शकुन्तला भी उसके पीछे-पीछे चलने लगती है। जब गौतमी इस तरफ उसका ध्यान दिलाती है तो वह शकुन्तला को डाँट कर कहता—अयि दोषकारिणि ! अब क्या तू स्वतन्त्रता का अवलम्बन करती है !—आ पुरोभागिनि ! किमिदं स्वातन्त्र्यमवलम्बसे ? शार्ङ्गरव चापलूसी नहीं पसन्द करता। पञ्चम अङ्क में जब पुरोहित राजा दुष्यन्त के विनय की तारीफ करता है तब शार्ङ्गरव कहता है यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। सत्पुरुषों को समृद्धि के समय अनुद्धत होना ही चाहिए।
भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमै नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः । अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् ॥ २।१२
अनसूया और प्रियम्बदा
अनसूया तथा प्रियम्बदा ये दोनों शकुन्तला की प्रिय सखियाँ हैं। ये तीनों ही अति सुन्दरी हैं और इन तीनों की उम्र में विशेष अन्तर नहीं है। प्रथम अङ्क में जब राजा दुष्यन्त इनको देखते हैं तो कहते हैं—कि समान अवस्था तथा समान रूप होने के कारण आप तीनों की मित्रता बड़ी सुन्दर प्रतीत हो रही है—अहो ! समानवयोरूपरमणीयं सौहार्दमत्र-भवतीनाम्। संभवतः इन तीनों में अनसूया सबसे बड़ी है, उससे प्रियम्बदा छोटी है और शकुन्तला इससे भी छोटी है। चतुर्थ अङ्क में शकुन्तला के विदा होते समय जब दोनों सखियाँ रोने लगती हैं तब महर्षि कण्व पहले अनसूया को बाद प्रियम्बदा को सम्बोधन कर कहते हैं—अनसूये ! प्रियंवदे ! रोओ मत, तुम दोनों को चाहिए कि शकुन्तला को ढाढ़स बँधाओ—अनसूये ! प्रियंवदे ! अलं रुदितेन । भवतीभ्यामेव शकुन्तला स्थिरा कर्तव्या। जिस समय राजा दुष्यन्त तपोवन में प्रवेश करते हैं उस समय अनसूया ही आगे बढ़कर उनसे बातें करती है और वही शकुन्तला के जन्म का रहस्य बताती है, बाद प्रियम्बदा शकुन्तला को उटज से फलमिश्र अर्घ्यभाजन लाने के लिये कहती है। इससे प्रतीत होता है कि शकुन्तला प्रियम्बदा से भी छोटी है। सौन्दर्य में प्रायः तीनों समान हैं फिर भी दोनों की अपेक्षा शकुन्तला रूपवती है और उसका लावण्य उत्कृष्ट है। षष्ठ अंक में चित्र देखते समय जब माढव्य राजा दुष्यन्त से पूछता है कि मित्र ! इस चित्र में तो तीन मूर्तियाँ दिखाई पड़ती हैं और वे तीनों सुन्दरी हैं इन तीनों में शकुन्तला कौन सी है ! तब सानुमती अप्सरा अपने मन में कहती है कि इसने मेरी सखी शकुन्तला का रूप नहीं देखा है। अतः इसकी आंखें निष्फल हैं—अनभिज्ञः खल्वेषः सखीरूपस्य मोघचक्षुः। इससे शकुन्तला
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अधिक रूपवती प्रतीत होती है। अन्त में विदूषक भी सौन्दर्य के आधार पर ही शकुन्तला को पहचानता है। तीनों में घनिष्ठतम प्रेम है। वे सभी एक दूसरे को सुखी देखना चाहती हैं।
अनसूया और प्रियम्बदा दोनों शकुन्तला से निःस्वार्थ प्रेम करती हैं तथा उसे सगी बहिन-सी मानती हैं। तृतीय अङ्क में कामव्यथित शकुन्तला को अस्वस्थ देखकर दोनों ही चिन्तित होती हैं। रहस्य ज्ञात हो जाने पर दोनों राजा और शकुन्तला का संगम कराने का प्रयास करती हैं। मालिनी के तट पर लता मण्डप में शकुन्तला और राजा दोनों का मिलन हो जाने पर मृगशावक को माता से मिलाने का व्याज बनाकर वे दोनों वहाँ से निकलकर बाहर खड़ी होकर देखती हैं कि कोई वहाँ जाकर उन्हें देख न ले। जब गौतमी आती है तब वे चक्रवाक वधू को कुछ कहने के बहाने शकुन्तला को सूचित कर देती हैं। दोनों ही शिष्ट, विनीत वाक्पटु एवं मधुरभाषिणी हैं। दोनों कर्मठ और बुद्धिमती हैं। आश्रम के कार्यों में दोनों का समान उत्साह है।
दुर्वासा का शाप सुनकर दोनों चिन्तित होती है उनसे अनुनय-विनय कर शापनिवृत्ति करा लेती हैं। शकुन्तला की विदाई के समय दोनों व्याकुल हो जाती हैं। उसके बिना उन्हें आश्रम सूना-सा प्रतीत होता है उसमें प्रवेश करने से कष्ट होता है, वे महर्षि कण्व से कहती हैं—तात ! शकुन्तला विरहितं शून्यमिव तपोवनं कथं प्रविशावः।
इस प्रकार दोनों के चरित्रों में साम्य होते हुए भी कुछ वैषम्य भी है। जहाँ अनसूया गम्भीर स्वभाव की है उसमें परिपक्व-बुद्धिता अधिक है। वहाँ प्रियम्बदा विनोदशीला एवं चुलबुली है। उसमें परिपक्वता की मात्रा कम है। राजा दुष्यन्त के आश्रम में आने पर अनसूया उनकी अगवानी करती है तथा विश्वामित्र और मेनका से शकुन्तला की उत्पत्ति बतला कर उनकी जिज्ञासा शान्त करती है। उसको किसी के प्रति असूया नहीं होती हमेशा सबको खुशी करने की बात सोचती है। अतः उसका नाम अनसूया सार्थक है—न विद्यते असूया यस्यां सा अनसूया = डाहरहित। प्रियम्बदा मधुरभाषिणी अपने नाम के अनुसार और विनोदप्रिया है। उसका विनोद अपमानजनक न होने से कष्टदायक नहीं होता उसमें एक प्रकार की मिठास रहती है। यही कारण है कि जब वह शकुन्तला से मजाक करती हुई पूछती है कि अनसूये ! जानती हो कि शकुन्तला वनज्योत्स्ना को क्यों प्रेम से देख रही है ! इस पर अनसूया कहती है कि नहीं समझ पा रही हूँ, तुम्हीं बतलाओ। इस पर प्रियम्बदा कहती है—सखि ! यह सोच रही है कि जिस प्रकार वनज्योत्स्ना योग्य वृक्ष से मिल गई वैसे ही मैं भी अपने अनुरूप वर को प्राप्त करूँगी। तब वह गद्गद होकर कहती है—अत एव प्रियम्वदेति भण्यसे। एष ते आत्मनश्चित्तगतो मनोरथः। प्रियम्बदा इधर-उधर की बातों में अधिक भाग लेती है। जब राजा कहता है कि आपकी सखी के विषय में हमें और भी कुछ पूछना है तब प्रियम्बदा झट कह बैठती है कि विचार करने की आवश्यकता नहीं, तपस्वियों से कोई भी बात निःसंकोच पूछी जा सकती है—अलं विचारेण, अनियन्त्रणानुयोगः तपस्विवजनो नाम। जब राजा पूछता है कि आपकी प्रियसखी क्या विवाह-पर्यन्त तपस्विनी बनी रहेगी या विवाह न करके मृगियों के साथ जीवन पर्यन्त निवास करेगी ? तब वह उत्तर देते हुए कहती है कि महानुभाव, धर्माचरण में भी यह शकुन्तला पराधीन है, फिर भी पिता जी का इसे योग्य वर को देने का विचार है। जब शकुन्तला रुष्ट होकर बकवाद करने वाली प्रियम्बदा की
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शिकायत करने के लिए आर्या गौतमी के पास जाना चाहती है तब वह यह कह कर उसे रोकती है कि—तुम मेरे दो वृक्षों के सींचने की ऋणी हो, मैने तेरी क्यारी के दो वृक्षों को जल से सींचा है। अतः तेरे ऊपर मेरे दो वृक्ष का ऋण बाकी है। पहले उनसे छुटकारा लो, तब जा—द्वे मे वृक्ष सेचनके धारयसि ताभ्यां तावदात्मानं मोचय ततो गमिष्यसि। प्रियम्बदा दुष्यन्त-शकुन्तला के परस्पर आकर्षण को भांपकर शकुन्तला से विवाह विषयक हँसी करती हुई चुटकी लेती है—सखी शकुन्तले ! यदि यहाँ आज पिता जी होते तो—हला शकुन्तले ! यद्यत्राद्य तातः सन्निहितो भवेत् । इसलिए प्रियम्बदा विनोदी है अनसूया स्वल्पभाषिणी और गम्भीर है। वह किसी बात पर सहसा विश्वास नहीं करती, सभी पहलुओं पर सोचती है। हानि-लाभ का विचार करती है ऊहापोह करने के बाद ही वह निर्णय करती है तृतीय अंक में दुष्यन्त-शकुन्तला के वैवाहिक सम्बन्ध के पूर्व राजा दुष्यन्त से कहती है कि राजाओं की कई पत्नियाँ होती हैं अतः जिस प्रकार मेरी प्रियसखी शकुन्तला शोक का कारण न बने ऐसा उपाय कीजिएगा—बहुवल्लभाः खलु राजानः श्रूयन्ते। तद् यथा इयं नः प्रियसखी बन्धुजनशोच्या न भवति तथा करिष्यसि। प्रियम्बदा का स्वभाव ठीक इससे विपरीत है। वह शीघ्र विश्वास कर लेती है। सभी कार्यों से होने वाली भलाई को सोचती है बुराई की तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता। चतुर्थ अंक में अनसूया दुष्यन्त के हस्तिनापुर चले जाने पर अनसूया चिन्तित है कि निवास में मग्न होकर राजा शकुन्तला का स्मरण करेगा या नहीं। इसपर प्रियम्बदा कहती है कि—अनसूये ! तुम विश्वास रखो क्योंकि दुष्यन्त के समान आकार वाले लोग गुणहीन नहीं होते--तत्र तावद् विश्वस्ता भव, नहि तादृशा आकृतिविशेषा गुणविरहिणो भवन्ति। अनसूया दूरदर्शिनी है, वह भविष्य की चिन्ता करती है। प्रियम्बदा सरल है वह भविष्य के झंझट में नहीं पड़ती, वर्तमान से ही सन्तुष्ट रहती है। अनसूया धीर प्रकृति की है और प्रियम्बदा शीघ्र घबड़ा जाती है। वह दुर्वासा के शाप को सुनकर घबड़ा उठती है और किंकर्तव्यविमूढ हो जाती है, किन्तु अनसूया धीरता रखकर महर्षि को मनाने के लिए उसे भेजती है और जब प्रियम्बदा घबड़ाती है कि तीर्थयात्रा से लौटने पर राजा के साथ शकुन्तला का विवाह सुनकर पिता जी न जाने क्या कहेंगे। तब अनसूया समझाती हुई कहती है कि कन्या को अनुरूप वर के हाथ सौंपना चाहिए यह पहला विचार है। यदि देव यह कार्य स्वयं बना दे तो गुरुजन कृतकृत्य ही होंगे—अनुरूपस्य वरस्य हस्ते कन्यका प्रतिपादनीया अयं तावत् प्रथमः कल्पः। तं यदि दैवं संपादयति ननु कृतार्थो गुरुजनः। अतः पिता जी के अप्रसन्न होने की कोई बात ही नहीं। प्रियम्बदा भावावेश में बहती है, वह कोई काम करते समय तो बिना सोचे विचारे कर देती है। बाद में उसे घबड़ाहट होती है। दुष्यन्त को शकुन्तला से मिलाने के समय तो उसने पिताजी को नहीं सोचा अनन्तर वह उनसे भयभीत हो उठी अनसूया से कहने लगी—कि मुझे तो यह चिन्ता है कि पिताजी तीर्थयात्रा से वापस आकर और राजा दुष्यन्त के साथ शकुन्तला का गन्धर्व विवाह सुनकर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे?—एतावत् पुनश्चिन्तनीयम्। तातस्तीर्थयात्रातः प्रतिनिवृत्तः इमं वृत्तान्तं श्रुत्वा न जाने किं प्रतिपत्स्यते।
इस प्रकार शकुन्तला की दोनों सखियों अनसूया तथा प्रियम्बदा के चारित्रिक समता एवं विषमता पर विचार करने पर प्रतीत होता है कि दोनों भिन्न प्रकृति की आदर्श महिला हैं। इन दोनों के साथ शकुन्तला का घनिष्ठतम सम्बन्ध है। अभी दोनों कुमारी हैं।
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गौतमी
गौतमी महर्षि कण्व की धर्मभगिनी हैं और तपस्या की प्रतिमूर्ति है। वह अत्यन्त सीधी सादी तपस्विनी है। उसके प्रभाव से आश्रम की व्यवस्था ठीक चलती है। सभी आश्रमवासी उसका आदर करते हैं। वह शकुन्तला को बड़ा प्यार करती है। शकुन्तला जब राजा दुष्यन्त के दर्शन से कामपीड़ित होकर मालिनी नदी के तट के समीपवर्ती एक लतामण्डप में शिलाफलक पर विराजमान होकर समय बिताती है तब उस बेचारी तपस्विनी गौतमी को क्या मालूम कि शकुन्तला किस खेल में अलमस्त है। वह शकुन्तला के शारीरिक ताप का समाचार सुनकर स्वस्थता के लिए तत्काल मन्त्रपूत दर्भोदक हाथ में लेकर उसके पास पहुँचती है उससे उसके शरीर पर सींच कर प्यार से पूछती है—बिटिया, तुम्हारे शरीर का सन्ताप क्या कुछ कम हुआ ? शकुन्तला कुछ लाभ होने का उत्तर देती है। उस वृद्धा तापसी के आने के पूर्व ही शकुन्तला की बीमारी की वास्तविक दवा राजा दुष्यन्त तो मिल ही गये हैं, किन्तु उस बेचारी को क्या पता। वह अपने उपचार से आराम का अनुभव करके शकुन्तला को साथ लेकर कुटी पर चली जाती है। उस वृद्धा तपस्विनी गौतमी के सदाचार और सद्व्यवहार का ही परिणाम है कि कुलपति कण्व जैसे महर्षि भी उसका समादर करते हुए शकुन्तला की विदाई के अवसर पर शार्ङ्गरव द्वारा दुष्यन्त को सन्देश देकर पूछते हैं कि इस विषय में गौतमी का क्या मत है?—कथं वा मन्यते गौतमी। इस पर गौतमी कहती है कि वधूजनों के लिए इतना ही उपदेश पर्याप्त है—बेटी ! इस अमृतोपदेश को स्मरण रखना—एतावानेव वधूजनस्योपदेशः। जाते एतद् खलु सर्वमवधारय। शार्ङ्गरव, शारद्वत तथा शकुन्तला के साथ हस्तिनापुर में दुष्यन्त के दरबार में उपस्थित हो राजा के समक्ष गौतमी जिस धैर्य एवं सरलता से अपना कर्तव्य निभाती है उससे पाठकों का हृदय प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। राजा दुष्यन्त शकुन्तला के साथ उसका भी अपमान करते हुए स्त्री समूह की निन्दा करते हैं, उन्हें धूर्त बतलाते हैं—
स्त्रीणामशिक्षितपटुत्वममानुषीषु संदृश्यते किमुत याः प्रतिबोधवत्यः ।
प्रागन्तरिक्षगमनात् स्वमपत्यजातमन्यैर्द्विजैः परभृताः खलु पोषयन्ति ॥ ५।२२
किन्तु तपस्विनी गौतमी शान्त और निर्विकार बनी रहती है। इससे इसकी समुद्र जैसी गम्भीरता पृथ्वी की भाँति सहनशीलता तथा मुनियों जैसी क्षमाशीलता व्यक्त होती है गौतमी के समान विशुद्ध पावनचरित भारतीय महिलाओं के लिए आदर्श का निदर्शन है।
सर्वदमन ( भरत )
अभिज्ञानशाकुन्तल के अनुसार देवताओं की माता अदिति तथा पिता महर्षि कश्यप के आश्रम हेमकूटपर्वत पर शकुन्तला के गर्भ से उसकी माता मेनका अप्सरा के पास सर्वदमन का जन्म हुआ था और वहाँ ही उसके जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न हुए। यह बचपन से ही बड़ा तेजस्वी एवं चञ्चल बालक था। शेर के बच्चों के साथ खेलता और जबरदस्ती उनका मुख दवा कर उनके दांत गिनता था।
जिस समय राजा दुष्यन्त इन्द्र के शत्रु दुर्जय नामक दैत्यगण को युद्ध में परास्त कर इन्द्र के रथ से अपनी राजधानी हस्तिनापुर लौट रहे थे उस समय वे मरीचिनन्दन महर्षि कश्यप के दर्शनार्थ रथ से उतर पड़े तथा इन्द्रसारथी मातलि दर्शन का अवसर जानने
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के निमित्त उनके पास चला जाता है। राजा दुष्यन्त एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लग जाते हैं। वहीं खेलते हुए शेर के बच्चे का दांत गिनते सर्वदमन को देखकर दुष्यन्त अपने मन में सोचते हैं यह किसका बालक है? जिसकी गोद में धूल धूसरित यह बालक खेलता होगा, वह व्यक्ति धन्य है। इतने में एक तापसी दूसरी से कहती है कि यह बालक बड़ा चपल हो गया है, शेर के बच्चे को तंग कर रहा है. कुटी में जाकर शकुन्त (खेलने के लिए बना हुआ मिट्टी का मयूर) ला। इस पर सर्वदमन कहता है कि मेरी माँ शकुन्तला कहाँ है? तब राजा दुष्यन्त तापसी से पूछ बैठते हैं कि यह किसका बालक है? इस पर वह कहती है—यह बालक पुरुवंश के एक राजर्षि का औरस पुत्र है। इस पर वे पुनः पूछते हैं कि उसका क्या नाम है? तब वह कहती है कि अपनी पत्नी का त्याग कर देने वाले का नाम कौन ले? इस पर दुष्यन्त पुनः अपने मन ही मन सोचते हैं कि यह सारी बातें तो मुझ में ही घटती हैं और इस बालक को देखकर मुझे औरस पुत्र के समान स्नेह भी हो रहा है। इतने में दूसरी तापसी मिट्टी का मयूर लेकर आ जाती है। उसे लेने के लिए जब बालक हाथ पसारता है तो उसमें चक्रवर्ती के चिह्न देखकर राजा और प्रसन्न हो जाते हैं। तबतक तापसी बोल बैठती है—हाय, जन्म के समय रक्षार्थ महर्षि द्वारा इसके हाथ में बँधा हुआ रक्षा-सूत्र कहाँ गिर गया? इस पर दुष्यन्त तत्काल जमीन से उठाकर कहते हैं कि यह है। इसपर वे आश्चर्य करने लगती हैं। तब दुष्यन्त पूछते हैं कि आप लोग क्यों आश्चर्य करती हैं? तब वे कहती हैं कि इस बालक के माता-पिता के अतिरिक्त अन्य के उठा लेने पर यह साँप बनकर काट लेता है। इतने में ही शकुन्तला वहाँ आ जाती है जिसे देखकर राजा दुष्यन्त उससे अपनी भूल पर क्षमा माँगने लगते हैं। तब तक मातलि आकर कहता है—राजन् ! कश्यपजी दर्शन देने के लिए तैयार बैठे हैं। कृपया आप अपनी पत्नी और पुत्र के साथ चलकर उनका दर्शन करें। तदनुसार वे सभी जाकर उनका दर्शन कर प्रणाम करते हैं। आशीर्वाद देते हुए महर्षि कहते हैं—दुष्यन्त ! मैंने पहले ही जान लिया था कि दुर्वासा के शापवश आपने कण्व पुत्री का त्याग कर दिया था। यह सर्वदमन जयन्त जैसा प्रतापी है और यह साध्वी शकुन्तला इन्द्राणी के समान सौभाग्यवती है इनके साथ राजधानी में जाकर सुखपूर्वक रहो। इन्द्र तुम्हारे राज्य में प्रचुर वृष्टि करें और तुम प्रजाओं का पालन करो। इसके अनन्तर राजा दुष्यन्त सपत्नीक कश्यपजी को प्रणाम कर अपनी राजधानी में आकर सर्वदमन को युवराज बना देते हैं और उसका नाम भरत रख देते हैं। बाद इसी के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।
इस प्रकार शकुन्तला की मातृस्थानीया वृद्धा गौतमी, शेर के बच्चे को उसकी माता के पास से उसके दांत गिनने वाला निर्भीक शिशु सर्वदमन मालिक की मर्जी देखकर चलने वाला सेनापति, गरीब किन्तु अपनी जाति का स्वाभिमानी शक्रतीर्थ निवासी जालोपजीवी धीवर, सिद्ध साधक बनकर अपराधी पर अत्याचार करने का विचार करने वाले परन्तु उसके पास पुरस्कार के पैसे देखते ही मद्य की आशा से क्षणभर में बदल जाने वाले पुलिस के सिपाही और उनका अफसर राजा का साला, नगर रक्षक इन सबके चित्र भी बड़े मनोरंजक और सटीक उतारे गये हैं। इन सभी पात्रों के चरित्र चित्रण को देखकर कालिदास की मार्मिक सूक्ष्म-निरीक्षण शक्ति पर अत्यन्त आश्चर्य होता है।