भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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द्वितीय अङ्क में दुष्यन्त शकुन्तला के रूप सौन्दर्य पर रीझकर विदूषक से कहता है कि ब्रह्मा ने सर्वप्रथम इसकी मूर्त्ति का चित्त में रूपायित किया होगा, बिना मन के सक्रिय सहयोग से इस प्रकार का अद्वितीय स्त्रीरत्न उत्पन्न ही नहीं हो सकता है—

चित्ते निवेश्य परिकल्पितसत्त्वयोगात् रूपोच्चयेन विधिना मनसा कृता नु। स्त्रीरत्नसृष्टिरपरा प्रतिभाति सा मे धातुर्विभुत्वमनुचिन्त्य वपुश्च तस्याः॥ २।६

प्रथम अंक में शकुन्तला की रूपलक्ष्मी से चमत्कृत होकर दुष्यन्त कहता है कि मानवी स्त्रियों में भला ऐसा रूप कहाँ से उत्पन्न हो सकता है। चञ्चल चमक वाली बिजली पृथ्वीतल से थोड़े ही निकल सकती है ?

मानुषीषु कथं वा स्यादस्य रूपस्य संभवः। न प्रभा तरलं ज्योतिरुदेति वसुधातलात्॥ १।२५

तपोवन में रहते-रहते शकुन्तला का प्रकृति से घनिष्ठतम सम्बन्ध हो गया है। वह आश्रम के वृक्ष, लता, एवं पशु-पक्षियों को भी अपने सगे सम्बन्धी समझती है और स्पष्ट कहती है—न केवलं तातनियोग एव, अस्ति मे एतेषु सोदरस्नेहः। उसके हृदय में तपोवन के जड़-चेतन सभी पदार्थों के लिए सहानुभूति है। वह पहले आश्रम के पौधों को जल से सींच लेती है तब स्वयं जल पीती है। यद्यपि उसे मण्डन अतिप्रिय है तथापि वह वृक्षों को कष्ट होने के भय से उनके पल्लव-पुष्प आदि नहीं तोड़ती—

पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या। नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्॥ ४।८

यदि चरते समय आश्रम के मृगों के मुख कुश से कट जाते थे तो उन्हें इंगुदी का तेल लगाकर उनके घावों को अच्छा करती थीं। चतुर्थ अङ्क में आश्रम से विदा होने के समय वह सखियों के समान आश्रमस्थ लता, वृक्ष और मृगों से भी मिलती है। प्रकृति प्रेम की उपासिका शकुन्तला की विदाई के अवसर पर वृक्ष एवं वनदेवताओं ने विविध प्रकार के वस्त्र और आभूषण दिये थे, वृक्षों ने पक्षियों के द्वारा स्वागत गान किये और लताओं ने अपने पुष्पों को बिखेरते हुए अभिनन्दन किया। अनन्तर शकुन्तला के जाते समय सारा तपोवन स्तब्ध-सा हो गया।

शकुन्तला में शालीनता कूट-कूट कर भरी है। वह सुशील तथा लज्जाशील नायिका है। प्रथम अङ्क में राजा दुष्यन्त को देखकर उसके मन में काम-विकार उत्पन्न होता है, परन्तु वह अपनी कामवेदना किसी से नहीं कहती, अपनी सखियों से भी छिपाती है उसके कामजनित हाव-भाव बड़े ही मर्यादित ढङ्ग से होते हैं। जब उसकी कामपीडा अति उग्र हो गई, तब सखियाँ व्यग्र हुईं। उन्होंने बार-बार उस वेदना का कारण जानकर प्रतिकार करने का आग्रह किया। तब कहीं शकुन्तला ने अपनी जबान खोली—सखि ! यतः प्रभृति तपोवनरक्षिता स राजर्षिः मम दर्शनपथमागतः। तपोवन के रक्षक वे राजर्षि जब से मेरी दृष्टि के विषय बने—बस इतना कहकर लज्जा के मारे चुप हो जाती है। प्रथम अंक में जब राजा उसके रूप की सराहना करते हैं तब वह लज्जा से शिर झुका लेती है। आगे जब प्रियम्वदा उसके विवाह की चर्चा चलाती है तब वह वहाँ से हट जाना चाहती है।

5 ५ शा० भू०