भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 540 में से

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तृतीय अङ्क में मालिनी नदी के पास एकान्त स्थान लता मण्डप में जब राजा उसका अंचल पकड़ना चाहता है तब वह कहती है—पौरव ! चंचलता न कीजिए, अपने विनय की रक्षा कीजिए। कामपीडित होने पर भी मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। पौरव ! रक्ष, रक्ष विनयम्। कामपीडिताऽपि न खल्वात्मनः प्रभवामि।

राजा दुष्यन्त के साथ शकुन्तला का गान्धर्व विवाह हो जाने के अनन्तर वह गर्भवती हो जाती है। राजा हस्तिनापुर जा चुके हैं, कुलपति कण्व सोमतीर्थ से वापस आ गये हैं, उनसे कैसे कहा जाय यह शकुन्तला के सामने एक समस्या उपस्थित थी, किन्तु अग्निशाला में आकाशवाणी ने इस समस्या का समाधान शकुन्तला के सामने प्रस्तुत कर दिया।

शकुन्तला का हृदय मनुष्यों से ही नहीं आश्रमस्थ लता, पादप और पशुपक्षियों से भी प्रेमसूत्र में निबद्ध है। वह सचमुच प्रकृति कन्या तथा निःसर्ग सुन्दरी है। ऐसी द्रवणशील हृदयवाली नारी, कठिनाई से मिलती है। वन की लताओं, वृक्षों, कुसुमों, पशुओं और पक्षियों सभी से उसकी आत्मीयता है। वह उनकी भाषा समझती है और वे भी उसकी भाषा समझते हैं। वह उनकी परिचर्या करती है और वे उसकी मंगल कमना करते हैं। उसकी विदाई के अवसर पर हरिणों ने मुख में चलती हुई कुशा के कौर उगल दिये। मोरों ने नाचना बन्द कर दिया। लताओं ने अपने पीले पत्तों के रूप में आँसू गिराना आरम्भ कर दिया। शकुन्तला सबसे मिलती है और सबसे विदा लेती है। अपनी बहन वनज्योत्स्ना की भुजाओं से लिपटती है, पुत्र के समान पालित मृग को जो मार्ग रोककर खड़ा हो जाता है समझा बुझाकर लौटाती है गर्भ मन्थरा मृगवधू के लिए पिताजी से यह निवेदन करती है जब इसे बच्चा हो जाय तब यह प्रिय सन्देश मेरे पास भेजवा दीजियेगा।

शकुन्तला पतिव्रता पत्नी है अपने पति को अत्यन्त प्रेम करती है। गान्धर्व विधि से विवाह हो जाने पर राजा दुष्यन्त के प्रति उसका प्रेम और बढ़ जाता है। राजा के हस्तिनापुर चले जाने पर उसका मन उन्हीं में निरन्तर लगा रहता है। उनकी तन्मयता में वह अपनी सुधबुध खो बैठती है। सुलभकोप महर्षि दुर्वासा के आने और भिक्षा न पाकर क्रोध से शाप देकर चले जाने का उसको कुछ भी पता नहीं है। वत्सल पिता महर्षि कण्व के आदेश से हस्तिनापुर जाते समय उसके मन में एक प्रकार का उत्साह दिखाई पड़ता है। वहाँ जब राजा शापवस न पहचानने के कारण उसका परित्याग कर देते हैं तब कुछ क्षणों के लिए क्रुद्ध हो जाती है, किन्तु उसका क्रोध अधिक काल तक नहीं रहता। वह दुष्यन्त को दोष न देकर अपने भाग्य को ही कोसती है—नूनं मे सुचरितप्रतिबन्धकं पुराकृतं तेषु दिवसेषु परिणाममुखमासीत्। महर्षि कश्यप के आश्रम में वह विरहिणी के वेश में रहती है। पतिदेव को हृदय में रखकर अपने चरित्र की रक्षा करते हुए वह समय बिताती है—

वसने परिधूसरे वसाना नियमक्षाममुखी धृतैकवेणिः।
अतिनिष्करुणस्य शुद्धशीला मम दीर्घं विरहव्रतं बिभर्ति ॥ ७।२१

इस नाटक के सप्तम अङ्क का उत्तरार्ध शकुन्तला के सुचरित से भरा हुआ है। उसकी तपस्या का ही परिणाम है कि उसका पति उससे मिलता है, पैरों पड़ता है, क्षमा माँगता है और अनुपम सुख भोग के निमित्त पुत्र सहित उसे सादर अपनी राजधानी हस्तिनापुर में ले आता है।

शकुन्तला का स्वभाव बड़ा ही सरल है। जब उसकी सखियाँ उसका मजाक उड़ाती हैं