अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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तब वह केवल इतना ही कह कर चुप हो जाती है कि यह तुम्हारे मन बात है—एष ते आत्मनश्चित्तगतो मनोरथः। उसकी सखियाँ उसे आज्ञा देती हैं, वह अपने को कुलपति की कन्या होने का घमण्ड नहीं करती। जब राजा दुष्यन्त महर्षि कण्व के आश्रम में प्रवेश करते हैं तब प्रियम्वदा कहती है—सखि शकुन्तले ! जाओ, कुटिया से फलयुक्त अर्ध्यपात्र लाओ, और यह घड़े का जल पैर धोने के लिए काम में आयेगा—हला, शकुन्तले ! गच्छो-टज फलमिश्रमर्घ्यभाजनमुपहर, इदमपि पादोदकं भविष्यति। चतुर्थ अंक में विदाई के समय उसकी सखियाँ उससे कहती हैं यदि राजा तुम्हें न पहचाने तो उसको अंगूठी दिखा देना।—सखि ! यदि नाम स राजर्षिः प्रत्यभिज्ञानमन्थरो भवेत्तदा अस्येदमात्मनो नामधेयाङ्कितमङ्गुलीयकं दर्शयिष्यसि। यह सुनकर शकुन्तला का हृदय काँप उठता है। उस समय सखियाँ कहती है—सखि ! मा बिभेहि स्नेहः पापम-शङ्कते। सखियों का इतना कहना ही उसकी घबराहट से दूर करने के लिए पर्याप्त है। उसने उस पर पुनः कोई प्रश्न नहीं किया। शकुन्तला काव्यकला में भी निपुण है। प्रणय पत्रिका में लिखने के निमित्त वह स्वयं पद्य बनाती है।
शकुन्तला के मन में पूजनीय गुरुजनों के प्रति अत्यन्त श्रद्धा है। वह जानती है कि स्वतन्त्रता पूर्वक कोई काम करने पर गुरुजनों का अनादर होता है। तृतीय अंक में लता-मण्डप के अन्दर जब राजा उससे कहता है कि बताओ, इस समय तुम्हारी क्या सेवा करूँ—नलिनीदल से पंखा करूँ या पैर दबाऊँ ? इस पर शकुन्तला कहती है—मै आप जैसे माननीय पुरुष के निकट अपने को अपराधिनी नहीं बनाऊँगी—न माननीयेषु जनेषु आत्मानमपराध्यिष्यामि। अपने धर्मपिता महर्षि कण्व के प्रतिविशेष आदर एवं प्रेम करती है। चतुर्थ अङ्क में तपोवन से हस्तिनापुर को प्रस्थान करते समय वह कण्व के चरणों पर गिर पड़ती है। उसे उन्हें छोड़कर आगे जाते नहीं बनता पर—जाओ, तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो—यह कह कर कण्व जी उसे भेजते हैं। जब शार्ङ्गरव आदि उसे दुष्यन्त के दरबार में छोड़कर जाने लगते हैं तब वह भी उनके पीछे-पीछे जाने लग जाती है, पर शार्ङ्गरव घूमकर डांटते हुए उसे कहता है कि अयि दोपकारिणि ! यह क्या तू स्वतन्त्रता का अवलम्बन करना चाहती है—आ पुरोभागे ! किमिदं स्वातन्त्र्यमवलम्बसे। इसपर वह डर के मारे कापने लगती है, आगे नहीं बढ़ती। सप्तम अङ्क में दुष्यन्त से पुनः मिलने पर वह उनके साथ महर्षि कश्यप और अदिति के सामने जाने में लजाती है। जब दुष्यन्त कहते हैं कि प्रिये ! बच्चे को संभालो तुम्हें आगेकर मैं देवपिता का दर्शन करना चाहता हूँ, तब शकुन्तला कहती है। आर्यपुत्र के साथ गुरुजन के समीप जाने में मुझे शरम मालूम पड़ती है—लज्जे खलु आर्यपुत्रेण सार्द्धं गुरुजनसमीपं गन्तुम्।
कालिदास ने उपेक्षिता कलंकिता शकुन्तला को कण्व के आश्रम में न भेजकर गहरी काव्यात्मक सहृदयता का परिचय दिया है। वह अब पहले जैसी नहीं थी विश्व के साथ उसका सम्बन्ध बदल गया था। इस प्रकार शकुन्तला का चरित्र न केवल संस्कृत जगत् में ही आदर्श माना जाता है अपितु विश्वसाहित्य में आदर्श के रूप में देखा जाता है जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा पाश्चात्य विद्वानों ने भी मुक्तकण्ठ से की है। मधुरभाषिणी, कोकिलकण्ठी शकुन्तला ने यदि अभिनव यौवन की उमंग में राजा दुष्यन्त के साथ गान्धर्वविधि से विवाह न किया होता तो कोई भी विचारवान व्यक्ति उनके चारित्रिक दुर्बलता पर अंगुली नहीं उठा सकता था। धन्य है वह दुर्जय मदनलीला, जो देव-