अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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दानव, ऋषि-महर्षि, ज्ञानवान् मानव और पशु-पक्षी कीट पतङ्ग आदि को भी व्यग्र बना देती है।
कण्व ऋषि
महर्षि कण्व आश्रम के कुलपति हैं। कुलपति उसे कहते हैं जो प्रतिदिन दश हजार विद्यार्थियों को अपने आश्रम में रखकर पढ़ाता है और उनके भरण पोषण एवं रहने का प्रबन्ध करता है।
मुनीनां दशसाहस्रं योऽन्नदानादिपोषणात् ।
अध्यापयति विप्रर्षिरसौ कुलपतिः स्मृतः ॥
उनका दूसरा नाम काश्यप भी है। क्योंकि वे महर्षि मरीचिनन्दन कश्यप के पुत्र हैं। वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं। उनका पुनीत आश्रम मालिनी नदी के तट पर तथा यज्ञशाला से अलंकृत है। वे श्रौतविधि से प्रतिदिन अग्निहोत्र करने वाले ब्रह्मर्षि हैं उन्हें शकुन्तला को राजा दुष्यन्त द्वारा गान्धर्व विवाह के बाद गर्भवती होने का समाचार सर्वप्रथम अग्निशाला में आकाशवाणी बतलाती है वे अपने अनुपम तपोबल से त्रिकाल का रहस्य हस्तामलकवत् जान लेते हैं। वे स्नान, सन्ध्या कर्मानुष्ठान में निरत धार्मिक भावना से ओतप्रोत उदार हृदय वाले एवं तेजस्वी ब्राह्मण हैं उनके तपोबल का प्रभाव चतुर्थ अङ्क में शकुन्तला के विदाई के समय देखते बनता है, जिससे प्रभावित होकर वृक्ष एवं वन देवताओं ने विविध प्रकार के दिव्य वस्त्र आभूषण आदि प्रस्तुत किये हैं।
शकुन्तला महर्षि कण्व की पोष्यपुत्री है। वे जननी-जनक विहीन शकुन्तला का अपनी औरस पुत्री के समान लालन-पालन करते हैं। शकुन्तला के प्रतिकूल दैव को शान्त करने के निमित्त वे सोमतीर्थ की यात्रा करते हैं। वे शकुन्तला की शालीनता से अत्यन्त सन्तुष्ट हैं। अपनी अनुपस्थिति में वे अतिथिसत्कार का भार व्यवहारकुशल शकुन्तला को सौंपते हैं। शकुन्तला के पतिगृहगमन के समय उनकी सारी ममता उमड़ पड़ती है। सगे पिता के समान शोक उन्हें व्याकुल कर देता है आंखों में आंसू आ जाते हैं उनका गला रुँधने लगता है, दृष्टि जड़ हो जाती है, हृदय धबड़ाने लगता है, तपस्वी होने पर भी वे अपने दुःख के वेग को रोक नहीं पाते। वे अपने मन में विचार करते हैं जब मेरे सदृश अरण्य-वासी मनुष्य की कन्या के प्रेम से ऐसी दशा हो जाती है तो सांसारिक जनों की क्या दशा होती होगी। ‘वत्से ! मामेव जड़ीकरोषि।’ ‘अपयास्यति मे शोकः कथं नु वत्से।’ ‘वत्से ! किमेवं कातरासि।’ ‘वत्से ! एहि परिष्वजस्व मां सखीजनं च।’ ‘वत्से ! त्वमिदानीमनुशासनीयासि।’ ‘वत्से ! अलं रुदितेन’ ‘स्थिरा भव वत्से !’ ‘नेदं विस्मरिष्यामि।’ ‘अनसूये ! प्रियंवदे ! गता वां सहचरी।’ इत्यादि महर्षि कण्व की उक्तियाँ वात्सल्य से भरी हुई हैं। वस्तुतः शकुन्तला के प्रति उनका वात्सल्य निःस्वार्थ, आदर्श तथा अनुकरणीय तथा स्पृहणीय है।
कण्व का तपोबल अपार है जिससे प्रभावित होकर राजा दुष्यन्त तृतीय अङ्क में कहते हैं—‘जाने तपसो वीर्यम्।’ महर्षि कण्व की उपस्थिति में राक्षस उनके तपोवन के पास नहीं पहुँच पाते, उनकी अनुपस्थिति में ही वे उपद्रव मचाते रहते हैं। तपोबल के प्रभाव से उन्हें त्रिकाल की बातें ज्ञात हो जाती हैं। सप्तम अंक में जब दुष्यन्त से शकुन्तला के मिलन का समाचार शिष्य द्वारा सुना देने के लिए अदिति महर्षि कश्यप से कहती हैं तब वे