अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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कहते हैं कि तपस्या के प्रभाव से कण्व को शकुन्तला के दुष्यन्त से पुनर्मिलन का वृत्तान्त अवगत हो गया है—तपः प्रभावात् प्रत्यक्षं सर्वमेव तत्र भवतः कण्वस्य।
चतुर्थ अङ्क में महर्षि कण्व के तपोबल का प्रभाव अद्भुत एवं आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। शकुन्तला की विदाई के समय वृक्षों ने माङ्गलिक वस्त्र एवं चरण-रञ्जन के लिए महावर दिये। वनदेवियों ने आभूषण दिये तथा प्यारी सखियों ने उसे पहनाकर चित्र के समान शकुन्तला को अलङ्कृत किया।
मुनित्रय
शाकुन्तल में तीन ऋषि अङ्कित हैं और तीनों का स्वभाव भिन्न-भिन्न है। एक तो महर्षि दुर्वासा हैं जिनको थोड़े में ही क्रोध आ जाता है और दारुण शाप दे बैठते हैं। इन्हीं के शाप के परिणाम-स्वरूप शकुन्तला को कुछ दिनों तक दुःख भोगना पड़ा था। दूसरे महर्षि हैं कुलपति कण्व। ये दुर्वासा की तरह ही तपोनिष्ठ, महाप्रभावशाली और अन्तर्यामी हैं किन्तु कण्व और दुर्वासा में अत्यन्तवैषम्य है। दुर्वासा जी अत्यन्त क्रोधी हैं तो कुलपति कण्व अतिशान्त। वे निष्ठुर हैं तो ये कोमलहृदय और अत्यन्त दयालु। उन्हें शकुन्तला अकस्मात् वन में माता-पिता से परित्यक्त मिली तो उन्होंने दया से अपनी पुत्री के समान पालन-पोषण किया, विविध प्रकार से शिक्षित किया उसके प्रतिकूलदैव को शान्त करने के लिए सोमतीर्थ की यात्रा की। शकुन्तला मानो कुलपति का प्राण है—सा कुलपतेरुच्छ्वसितमिव। उनकी अनुपस्थिति में उसने राजा दुष्यन्त के साथ अपना गान्धर्व-विवाह कर लिया। इससे वे नाराज नहीं हुए, प्रत्युत उन्होंने उसका समर्थन करके उसको तत्काल पतिगृह भेज दिया। और उन्होंने अपना आशय इस प्रकार व्यक्त किया—दृष्ट्या धूमाकुलितदृष्टेरपि यजमानस्य पावके एवाहुतिः पतिता। तीसरे ऋषि हैं—मरीचिनन्दन कश्यप। उनके आश्रम में सब स्वर्गीय सुखसाधन हैं परन्तु उसमें आसक्त न होकर वे तपस्या करते रहते हैं। वे इन्द्र आदि देवताओं के पिता हैं, भगवान् विष्णु वामनावतार में उनके पुत्र हुए थे। वे आप्तकाम हैं, फिर भी लोककल्याण के निमित्त तपश्चर्या में लग्न रहते हैं। इनके पुनीत आश्रम में दुष्यन्त द्वारा परित्यक्ता शकुन्तला को आश्रय मिला। इनके पातिव्रतधर्म के उपदेश से उसे मानसिक शान्ति मिली। जब उसे पुत्र पैदा हुआ तब उन्होंने उस बालक के जातकमीदि संस्कार किये। इन्हीं के आश्रम पर पुत्र सहित शकुन्तला पुनः पति से मिलकर सुखी हुई। ऐसे ज्ञाननिष्ठ, लोकहितैषी एवं सर्वसम्मान्य महात्मा के आशीर्वाद के द्वारा इस नाटक की समाप्ति करने में कवि ने अत्यन्त औचित्य प्रदर्शित किया है।
तपस्वी होते हुए भी महर्षि कण्व बड़े व्यावहारिक हैं। उनका हृदय सहानुभूतिपूर्ण है। जब उन्हें आकाशवाणी द्वारा राजा दुष्यन्त के साथ शकुन्तला के सम्बन्ध का पता चलता है तब वे धर्मतः विचार कर अपनी अनुमति दे देते हैं। उनके मत में क्षत्रियों के लिए गान्धर्व-विवाह उत्तम प्रकार का विवाह है। वे शकुन्तला को विदा करते समय राजा दुष्यन्त को जो सन्देश भेजते हैं, वे सरल, स्वाभाविक सारगर्भित एवं ध्यान देने योग्य हैं। वे अपनी कन्या शकुन्तला के लिए राजा की अन्य पत्नियों के समान पद चाहते हैं, उनके अनुसार अन्य सब पदार्थ तो भाग्य के आधीन होते हैं। शकुन्तला के लिए दिया गया उपदेश तो स्वर्णाक्षरों में अङ्कित करने लायक है। उसका मूल्य निर्धन महिला से लेकर महारानी तक के लिए समान है। उस आदर्श उपदेश में भारतीयता भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। वे