भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा यदार्यमस्यामभिलाषि मे मनः । सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः ।। १।२२

फिर भी सही-सही पता लगाते हैं । दुष्यन्त विवेकहीन कामी पुरुषों के समान अन्धे नहीं बनते, अवसर मिलने पर शकुन्तला की सखियों से पूछ ही बैठते हैं—कुलपति कण्व तो आबाल ब्रह्मचारी हैं, आप लोगों की यह सखी उनकी कन्या कैसे ? जब उन्हें शकुन्तला विषयक सारा रहस्य ज्ञात हो जाता है । अर्थात् यह शकुन्तला अविवाहित है, इसके विवाह का किसी के साथ निश्चय नहीं हुआ है, यह क्षत्रिय की कन्या होने के कारण विवाह के योग्य है, और यह भी मुझे चाहती है। इत्यादि निश्चय हो जाने के अनन्तर ही वे शकुन्तला से गान्धर्व विवाह करते हैं । तपोवन से हस्तिनापुर लौटते समय शीघ्र ही बुलाने का वचन देकर अभिज्ञान के रूप में प्रेम से उसे अपनी अंगूठी दे देते हैं, पर दुर्भाग्यवश दुर्वासा के शाप के प्रभाव से उसकी स्मृति धूमिल हो गई उसे कुछ स्मरण ही नहीं रहा। वे परस्त्री समझकर दरबार में उपस्थित शकुन्तला को ठुकरा देते हैं, फिर भी पाठक उन्हें दोषी नहीं समझते। अंगूठी की प्राप्ति के पश्चात् जब सारी बातें स्मृतिपटल पर आ जाती हैं तब वे पश्चात्ताप की तीव्रता से व्यग्र हो उठते हैं। अतिशय दुःख का अनुभव करते हुए सामयिक उत्सवों से विरत होकर समय बिताते हैं। अन्त में इन्द्रपुरी से लौटते समय महर्षि कश्यप के आश्रम पर शकुन्तला का साक्षात्कार कर उसके पैरों पर गिर कर क्षमा माँगते हुए कहते हैं—

सुतनु हृदयात् प्रत्यादेशव्यलीकमपैतु ते । किमपि मनसः संमोहो मे तदा बलवानभूत् ।। ७।२४

राजा दुष्यन्त समदर्शी आदर्श पति हैं । अनेक स्त्रियों से सम्बन्ध रहने पर भी इन्हें नैतिकताका सदा ध्यान बना रहता है । नई स्त्री से प्रेम हो जाने पर भी ये पहली स्त्रियों को भूल नहीं जाते । ये अपनी रानियों की भावनाओं को पूरा-पूरा सम्मान करते हैं। पञ्चम अङ्क के आरम्भ में रानी हंसपदिका के उपालम्भ पूर्ण गीत को सुनकर वे उसे सान्त्वना देने के निमित्त माढव्य को भेजते हैं—गच्छ नागरिकवृत्त्या संज्ञापयैनाम् । षष्ठ अंक में प्रमद वन में चित्र पट पर शकुन्तला की छवि देखने में मग्न राजा दुष्यन्त चतुरिका चेटीमें महारानी वासुमती के आने का समाचार सुनकर मानगर्विता महारानी अप्रसन्न होगी, यह सोचकर शकुन्तला के चित्रपट को विदूषक से अन्यत्र भेज देते हैं—वयस्य ! उपस्थिता देवी बहुमानगर्विता च । भवानिमा प्रतिकृतिं रक्षतु । वह वसुमती के सम्मान एवं आदर में कमी नहीं आने देना चाहते हैं । इस प्रकार समदर्शी नायक दुष्यन्त के चरित्र को देखकर सानुमती अप्सरा उसकी प्रशंसा करती है ।

दुष्यन्त एक धर्मपरायण राजा हैं। आदि से अन्त तक उन्होंने धर्मनिष्ठा का पालन किया है। ऋषियों की प्रार्थना पर ही महर्षि कण्व के आश्रम में यज्ञ की रक्षा में संलग्न हैं । उन्हें हस्तिनापुर से आदरणीय मां का सन्देश मिलता है—आगामी चौथे दिन मेरे उपवास की पारणा है उस अवसर पर आपका उपस्थित होना आवश्यक है । माता का यह सन्देश सुनकर वे द्विविधा में पड़ जाते हैं । एक ओर तपस्वियों के यज्ञ का रक्षाकार्य जिसके लिए पहले ही वचन दे चुके हैं दूसरी ओर पूज्या माता का आदेश, क्या हो, कैसे हो । वे बड़ी बुद्धिमानी से दोनों कार्यों को सम्पन्न करने का मार्ग निकालते हैं, विदूषक को मां की सेवा में भेज देते हैं क्योंकि माता ने उसे भी तो पुत्र की भांति ही माना है । दुष्यन्त