भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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के हृदय में ऋषियों के प्रति अपार आदरभाव है, वे उनकी रक्षा तथा सेवा से प्राप्त पुण्य को अमूल्य निधि समझते हैं वे विदूषक से स्पष्ट कहते हैं—

यदुत्तिष्ठति वर्णेभ्यो नृपाणां क्षयि तत्फलम्।
तपः षड्भागमक्षय्यं ददत्यारण्यका हि नः॥ २।१३

अतः वे ऋषियों के आदेश पालन में अपने को कृतकृत्य समझते हैं। मृगया के शिकारी होते हुए भी वैखानसों के कहने से वे मृग को छोड़ देते हैं उस पर बाण नहीं चलाते। तपोवन की मर्यादा अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए वे विनीतभाव से आश्रम में प्रवेश करते हैं और अपने सैनिकों को आश्रम की मर्यादा का बोध कराते हैं। जब सेना का हाथी तपोवन में गड़बड़ मचाता है तब वे अपने मन में सोचते हैं कि क्या मैं तपस्वियों की दृष्टि में अपराधी ठहराया गया हूँ—कथमपराध्दः तपस्विनामस्मि। द्वितीय अंक में जब तपस्वियों की तरफ से तपोवन की रक्षा के निमित्त निवेदन आता है तब वे कहते हैं कि तपस्वियों की क्या आज्ञा है? किमाज्ञापयन्ति? पञ्चम अंक में जब शकुन्तला के निराकरण से शार्ङ्गरव बड़ी बातें कहता है तब वे क्रुद्ध नहीं होते केवल इतना ही कहकर चुप हो जाते हैं कि विशेषेणाधिक्षिप्तोऽस्मि। सप्तम अंक में मारीच (मरीचिनन्दन कश्यप) ऋषि के आश्रम में ऋषियों के प्रति उनका व्यवहार अपार श्रद्धा को व्यक्त करता है।

उनके आशीर्वाद को अपने भविष्य का मूल-मन्त्र समझते हैं। (देखिए सप्तम अंक का अन्तिम अंश।) दुष्यन्त एक उच्चकोटि के शासक हैं। उनमें तीन गुण प्रमुख हैं (१) कर्तव्य-परायणता (२) प्रजा-प्रेम और (३) लोभ का अभाव। प्रथम अङ्क में जब राजा दुष्यन्त गज के उपद्रव को सुनते हैं तो तत्काल संभ्रान्त होकर कुटी में जाने के लिए उद्यत ऋषि-कुमारियों को सान्त्वना देकर रक्षा के लिए चल देते हैं। द्वितीय अंक में जब दो ब्रह्मचारी तपोवन की रक्षा के निमित्त बुलाने आते हैं तब वे कहते हैं कि आप दोनों आगे-आगे चलें, मैं भी पीछे-पीछे आ ही गया—गच्छतां पुरो भवन्तौ। अहमप्यनुपदासमागत एव। पञ्चम अंक में कञ्चुकी के वाक्य से प्रतीत होता है कि वे प्रतिदिन दरबार में बैठते हैं एवं प्रजाओं के मुकदमों को सुनते हैं। उन्हें शासन तथा राज्य व्यवस्था से फुरसत नहीं मिलती। वे प्रतिदिन मन्त्रियों के कार्यों का स्वयं निरीक्षण किये बिना कोई भी आदेश प्रसारित नहीं होने देते, वे बड़े ही प्रजावत्सल हैं। अपनी प्रजाओं को स्वजनों के समान समझते हैं। षष्ठ अङ्क में वे एक प्रजारञ्जक राजा के समान प्रतिहारी से कहते हैं कि मेरे राज्य में यह घोषणा करा दो कि जिसका जो सम्बन्धी मर गया हो वह राजा दुष्यन्त को अपना वह सम्बन्धी समझे। अर्थात् यदि किसी स्त्री का पति मर गया हो तो मैं उसका पति तो नहीं हो सकता किन्तु यदि किसी का पुत्र, पिता या भाई आदि मर जाय तो मुझे ही उस जगह पर समझे।

येन येन वियुज्यन्ते प्रजाः स्निग्धेन बन्धुना।
स स पापाद्दृते तासां दुष्यन्त इति घुष्यताम् ॥ ६।२३

दुष्यन्त बड़े ही आदर्शमय निर्लोभी राजा हैं। वे अनुचित मार्ग से अपना कोष बढ़ाना नहीं चाहते। जब वे निःसन्तान समुद्रव्यापारी धनमित्र नाम के बनिये के नौका दुर्घटना से मरने का समाचार सुनते हैं तो वे उसके धन को अपने कोष में नहीं मिला लेते, वे इस बात की खोज करते हैं कि उसकी स्त्रियों में से कोई गर्भवती है या नहीं जब उन्हें यह