भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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के पूर्व सेनापति इसे अपनी तरफ मिला लेता है। वह समझता है कि राजा इसका कहना नहीं टालेगा। वस्तुतः हुआ भी वही, विदूषक ने अपने विकृत अंग-भंग का प्रदर्शन कर मृगया से विश्राम ले ही लिया। विदूषक को बोलने की पूर्ण स्वतन्त्रता है। वह जिसे जो चाहे कह सकता है। हँसी में कही हुई इसकी बातों को कोई बुरा नहीं मानता। यह सेनापति को कहता है—त्वं तावत् दास्याः पुत्रः जीर्णऋक्षस्य मुखे निपतितो भविष्यसि। तू दासी का बेटा एक वन से दूसरे वन में घूमता हुआ मनुष्य के नाक के लालची किसी बूढ़े भालू के मुँह में पड़ जायेगा—यह राजा को भी एकवचन से ही सम्बोधित करता है। यह ऊपर से तो बेवकूफ मालूम पड़ता है, किन्तु अन्दर से अत्यन्त चतुर है। जब द्वितीय अङ्क में इससे एकान्त में बातें करने के अभिप्राय से राजा रैवतक आदि सेवकों को अपने कार्यों पर भेज देते हैं तब यह उनका आशय ताड़ जाता है और कहता है—आपने तो इस समय इस स्थान को मक्षिका से शून्य कर दिया—कृतं भवता साम्प्रतं निर्मक्षिकम्।

यह अपने वचनों के द्वारा राजा का मनोविनोद करता रहता है। द्वितीय अंक में जब शकुन्तला को लक्ष्य कर राजा कहता है कि मित्र ! तू नेत्र-फल से वंचित है, क्योंकि तूने देखने योग्य वस्तु नहीं देखी—अनवाप्तचक्षुः फलोऽसि। येन त्वया दर्शनीयं न दृष्टम्। इस पर वह कहता है, अजी आप तो मेरे सामने हैं ही—ननु भवानग्रतो मे वर्तते। पुनः आगे राजा शकुन्तला की चर्चा करता है तब वह हँस कर कहता है कि जैसे पिण्डखजूर से ऊबे हुए व्यक्ति की इमली खाने की इच्छा होती है वैसे ही स्त्रीरत्नों का उपभोग करने वाले यह वनचरी शकुन्तला विषयक आपकी इच्छा है। यथा कस्यापि पिण्डखर्जूरैरुद्वेजितस्य तिन्तिण्यामभिलाषो भवेत् तथा स्त्रीरत्नपरिभोगिणो भवत इयमभ्यर्थना। फिर भी राजा कहता है वयस्य ! अभी तुमने उसे देखा नहीं जिससे ऐसा कह रहे हो। मित्र ! अधिक क्या कहूँ मुझे तो वह ब्रह्मा की विलक्षणा सृष्टि प्रतीत हो रही है। इस पर वह पुनः कहता है कि यदि वह ऐसी स्त्रीरत्न है तो आप इसे शीघ्र बचाइए, कहीं इंगुदी के तेल से चिकने शिरवाले दढ़ियाले किसी तपस्वी के हाथ न पड़ जाय—तेन हि लघु परित्रायतामेनां भवान्। मा कस्यापि तपस्विन इङ्गुदीतैलचिक्कण शीर्षस्य हस्ते पतिष्यति। पुनः विदूषक राजा से पूछता है कि वयस्य आपके प्रति उसका अनुराग कैसा है ? तब राजा कहता है—मेरे सामने पड़ने पर उसने अपनी आंखें हटा लीं, दूसरे बातचीत के प्रसंग में हँस दिया। शील के कारण काम भाव न तो प्रकट किया, न छिपाया ही। इस पर विदूषक कहता है तो क्या देखते ही वह आकर आपकी गोद में बैठ जाती है ?—न खलु दृष्टमात्रस्य तवाङ्कं समारोहति। राजा पुनः कहता है—मित्र ! सखियों के साथ जाने के समय शकुन्तला ने शालीनता के साथ मेरे प्रति प्रेम-भाव प्रगट किया। वह कुछ कदम जाकर कुश के अंकुर से मेरे पैर बींध गये हैं ऐसा कहकर रुक गई और वृक्षों की टहनियों में न फँसे हुए भी वस्त्र को छुपाती हुई मेरी तरफ मुख कर खड़ी हो गई। यह सुनकर अन्त में विदूषक कहता है कि तब तो आपने इस तपोवन को क्रीडावन ही बना लिया है—तेन हि कृतं त्वयोपवनमिति पश्यामि।

इस प्रकार विदूषक केलि-कलह प्रिय, हास्यकारी राजा का सहचर माना गया है और वह अपने वेश-अङ्ग और वचनों के द्वारा हास्य करता रहता है—विकृताङ्गवचोवेशैर्हास्य- कारो विदूषकः।