भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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शार्ङ्गरव-शारद्वत

शार्ङ्गरव तथा शारद्वत ये दोनों महर्षि कण्व के व्यवहारज्ञ एवं आज्ञाकारी शिष्य हैं। महर्षि इनका विश्वास करते हैं और इनके नाम के आगे सम्मान सूचक मिश्र शब्द का प्रयोग करते हैं। क्व नु ते शार्ङ्गरव-शारद्वतमिश्राः । इससे इनकी विद्या, अवस्था और व्यवहार-कुशलता सिद्ध होती है। ये दोनों करीब २५ वर्ष के प्रौढ युवक हैं। इन दोनों में शारद्वत की अपेक्षा शार्ङ्गरव बड़ा प्रतीत होता है, और दल का नेता है क्योंकि कुलपति कण्व दुष्यन्त के लिए उसी से सन्देश भेजते हैं—शार्ङ्गरव ! त्वया मद्द्वचनात् स राजा शकु-न्तलां पुरस्कृत्य वक्तव्यः । दोनों परस्पर एक दूसरे का आदर करते हैं और दोनों के मन में गुरुभक्ति है। वे दोनों केवल तपस्वी ही नहीं हैं, व्यवहारज्ञ भी हैं। शकुन्तला की विदाई के समय आश्रम से कुछ दूर जाकर दोनों महर्षि से कहते हैं कि—भगवन् ! हमने सुना है कि सरोवर तक ही प्रियजनों को पहुँचाने जाना चाहिए। अतः यह सरोवर का तट है। हमको सन्देश बताकर यहाँ वट वृक्ष के नीचे बैठकर आप वापस जा सकते हैं—भगवन् ! ओदकान्तं स्निग्धो जनोऽनुगत स्निग्धो जनोऽनुगन्तव्य इति श्रूयते ।

महर्षि कण्व के दोनों शिष्य राज दरबार के शिष्टाचार को भलीभाँति जानते हैं। राजा दुष्यन्त के समक्ष जाते ही दोनों हाथ उठाकर उसे आशीर्वाद देते हैं। हस्तिनापुर में दुष्यन्त के द्वारा शकुन्तला का तिरस्कार करने पर जब शार्ङ्गरव राजा दुष्यन्त से उत्तेजना पूर्ण बातें कर रहा था तब शारद्वत उसे शान्त करते हुए कहता है—शार्ङ्गरव ! उत्तर प्रत्युत्तर से क्या लाभ है ? हमने गुरुजी का सन्देश कह दिया गया है, अब हम लोग लौट चलें—शार्ङ्गरव ! किमुत्तरेण, अनुष्ठितो गुरोः सन्देशः प्रतिनिवर्त्तामहे वयम् । दोनों मिल-जुलकर परस्पर परामर्श से काम करते हैं। दोनों को तपोवन से प्रेम तथा नगर से नफरत है। राजमहल में पहुँचकर दोनों एक दूसरे से अपना-अपना अनुभव बताते हैं।

दोनों के चरित्रों में अन्तर भी है। शार्ङ्गरव भावना की धारा में बहता है, वह वन मे रहने का अभ्यस्त है, उसे एकान्त प्रिय लगता है। उसको राजमहल ऐसे लग रहा है जैसे उसमें से आग की लपट निकल रही हो—जनाकीर्णं मन्ये हुतवहपरीतं गृहमिव । इसके विपरीत शारद्वत के विचार दार्शनिक हैं; उसमें दूसरों के प्रति सहानुभूति है। शार्ङ्गरव दुर्वासा के सदृश अपने तप एवं ब्रह्मतेज के सामने किसी को नहीं समझता। राजा दुष्यन्त जिस समय आश्रम में पधारे थे उस समय गुरुपुत्री शकुन्तला की सहमति के कारण शार्ङ्गरव शान्त ही बना रहा किन्तु आज कुलपिता ने चोरी करने वाले राजा दुष्यन्त को जब वही सम्पत्ति समर्पित कर दी और वह लेने से इनकार कर रहा है, आज उसे पहचान भी नहीं रहा है, गुरुपुत्री बिलख रही है, सब समझ रहे हैं, अभिमानी राजा मान ही नहीं रहा है। ऐसी परिस्थिति में शार्ङ्गरव ने जो कुछ कहा वह मानवोचित एवं समयोचित कर्तव्य है।

शारद्वत मितभाषी अक्रोधी, सहिष्णु तथा शान्त प्रकृति का व्यक्ति है, किन्तु शार्ङ्गरव बहुत बोलता है और क्रोधी भी है। शार्ङ्गरव और राजा के विवाद के उग्र रूप धारण करने पर शारद्वत उसे शान्त करता हुआ कहता है—शार्ङ्गरव ! विरम त्वमिदानीम् । शकुन्तला से कहता है कि अब तुम राजा को विश्वास दिलाओ—शकुन्तले ! दीयतामस्यै प्रत्यय-प्रतिवचनम् । अन्त में वह राजा से कहता है शकुन्तला आपकी पत्नी है, आप इसे रखें या छोड़ें, इस पर आपका अधिकार है। अब हम लोग जाते हैं—तदेषा भवतः पत्नी त्यज वैनां ग्रहण वा । इस प्रकार कालिदास ने शारद्वत की अपेक्षा शार्ङ्गरव का चरित्र अधिक