अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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विकसित किया है। वह अपने गुरु को सर्वज्ञ एवं सर्वसिद्धिसम्पन्न समझता है—न खलु कश्चिदविषयो नाम धीमताम्। पञ्चम अङ्क में राजा दुष्यन्त से बातें करते समय कहता है कि राजन् ! सिद्ध पुरुषों का मंगल सदैव उनके अधीन रहता है—राजन् ! स्वाधीन-कुशला सिद्धिमन्तः। शार्ङ्गरव तपोवन निवासियों को सत्यभाषी तथा राजनीतिज्ञों को असत्य बोलने वाला एवं दगाबाज समझता है। पञ्चम अंक में वह कहता है कि—आजन्मनः शाठ्यमशिक्षितो यः तस्या प्रमाणं वचनं जनस्य। उसकी इस उक्ति का तात्पर्य है कि राजनीतिज्ञों से सत्य और न्याय की आशा करना भूल है। शार्ङ्गरव स्त्री स्वातन्त्र्य का समर्थक नहीं है। जब वह शकुन्तला को राजा के पास छोड़कर अपने दल से साथ जाने लगता है तो शकुन्तला भी उसके पीछे-पीछे चलने लगती है। जब गौतमी इस तरफ उसका ध्यान दिलाती है तो वह शकुन्तला को डाँट कर कहता—अयि दोषकारिणि ! अब क्या तू स्वतन्त्रता का अवलम्बन करती है !—आ पुरोभागिनि ! किमिदं स्वातन्त्र्यमवलम्बसे ? शार्ङ्गरव चापलूसी नहीं पसन्द करता। पञ्चम अङ्क में जब पुरोहित राजा दुष्यन्त के विनय की तारीफ करता है तब शार्ङ्गरव कहता है यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। सत्पुरुषों को समृद्धि के समय अनुद्धत होना ही चाहिए।
भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमै नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः । अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् ॥ २।१२
अनसूया और प्रियम्बदा
अनसूया तथा प्रियम्बदा ये दोनों शकुन्तला की प्रिय सखियाँ हैं। ये तीनों ही अति सुन्दरी हैं और इन तीनों की उम्र में विशेष अन्तर नहीं है। प्रथम अङ्क में जब राजा दुष्यन्त इनको देखते हैं तो कहते हैं—कि समान अवस्था तथा समान रूप होने के कारण आप तीनों की मित्रता बड़ी सुन्दर प्रतीत हो रही है—अहो ! समानवयोरूपरमणीयं सौहार्दमत्र-भवतीनाम्। संभवतः इन तीनों में अनसूया सबसे बड़ी है, उससे प्रियम्बदा छोटी है और शकुन्तला इससे भी छोटी है। चतुर्थ अङ्क में शकुन्तला के विदा होते समय जब दोनों सखियाँ रोने लगती हैं तब महर्षि कण्व पहले अनसूया को बाद प्रियम्बदा को सम्बोधन कर कहते हैं—अनसूये ! प्रियंवदे ! रोओ मत, तुम दोनों को चाहिए कि शकुन्तला को ढाढ़स बँधाओ—अनसूये ! प्रियंवदे ! अलं रुदितेन । भवतीभ्यामेव शकुन्तला स्थिरा कर्तव्या। जिस समय राजा दुष्यन्त तपोवन में प्रवेश करते हैं उस समय अनसूया ही आगे बढ़कर उनसे बातें करती है और वही शकुन्तला के जन्म का रहस्य बताती है, बाद प्रियम्बदा शकुन्तला को उटज से फलमिश्र अर्घ्यभाजन लाने के लिये कहती है। इससे प्रतीत होता है कि शकुन्तला प्रियम्बदा से भी छोटी है। सौन्दर्य में प्रायः तीनों समान हैं फिर भी दोनों की अपेक्षा शकुन्तला रूपवती है और उसका लावण्य उत्कृष्ट है। षष्ठ अंक में चित्र देखते समय जब माढव्य राजा दुष्यन्त से पूछता है कि मित्र ! इस चित्र में तो तीन मूर्तियाँ दिखाई पड़ती हैं और वे तीनों सुन्दरी हैं इन तीनों में शकुन्तला कौन सी है ! तब सानुमती अप्सरा अपने मन में कहती है कि इसने मेरी सखी शकुन्तला का रूप नहीं देखा है। अतः इसकी आंखें निष्फल हैं—अनभिज्ञः खल्वेषः सखीरूपस्य मोघचक्षुः। इससे शकुन्तला