अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 540 में से
संदर्भ में पढ़ें( ७१ )
अधिक रूपवती प्रतीत होती है। अन्त में विदूषक भी सौन्दर्य के आधार पर ही शकुन्तला को पहचानता है। तीनों में घनिष्ठतम प्रेम है। वे सभी एक दूसरे को सुखी देखना चाहती हैं।
अनसूया और प्रियम्बदा दोनों शकुन्तला से निःस्वार्थ प्रेम करती हैं तथा उसे सगी बहिन-सी मानती हैं। तृतीय अङ्क में कामव्यथित शकुन्तला को अस्वस्थ देखकर दोनों ही चिन्तित होती हैं। रहस्य ज्ञात हो जाने पर दोनों राजा और शकुन्तला का संगम कराने का प्रयास करती हैं। मालिनी के तट पर लता मण्डप में शकुन्तला और राजा दोनों का मिलन हो जाने पर मृगशावक को माता से मिलाने का व्याज बनाकर वे दोनों वहाँ से निकलकर बाहर खड़ी होकर देखती हैं कि कोई वहाँ जाकर उन्हें देख न ले। जब गौतमी आती है तब वे चक्रवाक वधू को कुछ कहने के बहाने शकुन्तला को सूचित कर देती हैं। दोनों ही शिष्ट, विनीत वाक्पटु एवं मधुरभाषिणी हैं। दोनों कर्मठ और बुद्धिमती हैं। आश्रम के कार्यों में दोनों का समान उत्साह है।
दुर्वासा का शाप सुनकर दोनों चिन्तित होती है उनसे अनुनय-विनय कर शापनिवृत्ति करा लेती हैं। शकुन्तला की विदाई के समय दोनों व्याकुल हो जाती हैं। उसके बिना उन्हें आश्रम सूना-सा प्रतीत होता है उसमें प्रवेश करने से कष्ट होता है, वे महर्षि कण्व से कहती हैं—तात ! शकुन्तला विरहितं शून्यमिव तपोवनं कथं प्रविशावः।
इस प्रकार दोनों के चरित्रों में साम्य होते हुए भी कुछ वैषम्य भी है। जहाँ अनसूया गम्भीर स्वभाव की है उसमें परिपक्व-बुद्धिता अधिक है। वहाँ प्रियम्बदा विनोदशीला एवं चुलबुली है। उसमें परिपक्वता की मात्रा कम है। राजा दुष्यन्त के आश्रम में आने पर अनसूया उनकी अगवानी करती है तथा विश्वामित्र और मेनका से शकुन्तला की उत्पत्ति बतला कर उनकी जिज्ञासा शान्त करती है। उसको किसी के प्रति असूया नहीं होती हमेशा सबको खुशी करने की बात सोचती है। अतः उसका नाम अनसूया सार्थक है—न विद्यते असूया यस्यां सा अनसूया = डाहरहित। प्रियम्बदा मधुरभाषिणी अपने नाम के अनुसार और विनोदप्रिया है। उसका विनोद अपमानजनक न होने से कष्टदायक नहीं होता उसमें एक प्रकार की मिठास रहती है। यही कारण है कि जब वह शकुन्तला से मजाक करती हुई पूछती है कि अनसूये ! जानती हो कि शकुन्तला वनज्योत्स्ना को क्यों प्रेम से देख रही है ! इस पर अनसूया कहती है कि नहीं समझ पा रही हूँ, तुम्हीं बतलाओ। इस पर प्रियम्बदा कहती है—सखि ! यह सोच रही है कि जिस प्रकार वनज्योत्स्ना योग्य वृक्ष से मिल गई वैसे ही मैं भी अपने अनुरूप वर को प्राप्त करूँगी। तब वह गद्गद होकर कहती है—अत एव प्रियम्वदेति भण्यसे। एष ते आत्मनश्चित्तगतो मनोरथः। प्रियम्बदा इधर-उधर की बातों में अधिक भाग लेती है। जब राजा कहता है कि आपकी सखी के विषय में हमें और भी कुछ पूछना है तब प्रियम्बदा झट कह बैठती है कि विचार करने की आवश्यकता नहीं, तपस्वियों से कोई भी बात निःसंकोच पूछी जा सकती है—अलं विचारेण, अनियन्त्रणानुयोगः तपस्विवजनो नाम। जब राजा पूछता है कि आपकी प्रियसखी क्या विवाह-पर्यन्त तपस्विनी बनी रहेगी या विवाह न करके मृगियों के साथ जीवन पर्यन्त निवास करेगी ? तब वह उत्तर देते हुए कहती है कि महानुभाव, धर्माचरण में भी यह शकुन्तला पराधीन है, फिर भी पिता जी का इसे योग्य वर को देने का विचार है। जब शकुन्तला रुष्ट होकर बकवाद करने वाली प्रियम्बदा की