भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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शिकायत करने के लिए आर्या गौतमी के पास जाना चाहती है तब वह यह कह कर उसे रोकती है कि—तुम मेरे दो वृक्षों के सींचने की ऋणी हो, मैने तेरी क्यारी के दो वृक्षों को जल से सींचा है। अतः तेरे ऊपर मेरे दो वृक्ष का ऋण बाकी है। पहले उनसे छुटकारा लो, तब जा—द्वे मे वृक्ष सेचनके धारयसि ताभ्यां तावदात्मानं मोचय ततो गमिष्यसि। प्रियम्बदा दुष्यन्त-शकुन्तला के परस्पर आकर्षण को भांपकर शकुन्तला से विवाह विषयक हँसी करती हुई चुटकी लेती है—सखी शकुन्तले ! यदि यहाँ आज पिता जी होते तो—हला शकुन्तले ! यद्यत्राद्य तातः सन्निहितो भवेत् । इसलिए प्रियम्बदा विनोदी है अनसूया स्वल्पभाषिणी और गम्भीर है। वह किसी बात पर सहसा विश्वास नहीं करती, सभी पहलुओं पर सोचती है। हानि-लाभ का विचार करती है ऊहापोह करने के बाद ही वह निर्णय करती है तृतीय अंक में दुष्यन्त-शकुन्तला के वैवाहिक सम्बन्ध के पूर्व राजा दुष्यन्त से कहती है कि राजाओं की कई पत्नियाँ होती हैं अतः जिस प्रकार मेरी प्रियसखी शकुन्तला शोक का कारण न बने ऐसा उपाय कीजिएगा—बहुवल्लभाः खलु राजानः श्रूयन्ते। तद् यथा इयं नः प्रियसखी बन्धुजनशोच्या न भवति तथा करिष्यसि। प्रियम्बदा का स्वभाव ठीक इससे विपरीत है। वह शीघ्र विश्वास कर लेती है। सभी कार्यों से होने वाली भलाई को सोचती है बुराई की तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता। चतुर्थ अंक में अनसूया दुष्यन्त के हस्तिनापुर चले जाने पर अनसूया चिन्तित है कि निवास में मग्न होकर राजा शकुन्तला का स्मरण करेगा या नहीं। इसपर प्रियम्बदा कहती है कि—अनसूये ! तुम विश्वास रखो क्योंकि दुष्यन्त के समान आकार वाले लोग गुणहीन नहीं होते--तत्र तावद् विश्वस्ता भव, नहि तादृशा आकृतिविशेषा गुणविरहिणो भवन्ति। अनसूया दूरदर्शिनी है, वह भविष्य की चिन्ता करती है। प्रियम्बदा सरल है वह भविष्य के झंझट में नहीं पड़ती, वर्तमान से ही सन्तुष्ट रहती है। अनसूया धीर प्रकृति की है और प्रियम्बदा शीघ्र घबड़ा जाती है। वह दुर्वासा के शाप को सुनकर घबड़ा उठती है और किंकर्तव्यविमूढ हो जाती है, किन्तु अनसूया धीरता रखकर महर्षि को मनाने के लिए उसे भेजती है और जब प्रियम्बदा घबड़ाती है कि तीर्थयात्रा से लौटने पर राजा के साथ शकुन्तला का विवाह सुनकर पिता जी न जाने क्या कहेंगे। तब अनसूया समझाती हुई कहती है कि कन्या को अनुरूप वर के हाथ सौंपना चाहिए यह पहला विचार है। यदि देव यह कार्य स्वयं बना दे तो गुरुजन कृतकृत्य ही होंगे—अनुरूपस्य वरस्य हस्ते कन्यका प्रतिपादनीया अयं तावत् प्रथमः कल्पः। तं यदि दैवं संपादयति ननु कृतार्थो गुरुजनः। अतः पिता जी के अप्रसन्न होने की कोई बात ही नहीं। प्रियम्बदा भावावेश में बहती है, वह कोई काम करते समय तो बिना सोचे विचारे कर देती है। बाद में उसे घबड़ाहट होती है। दुष्यन्त को शकुन्तला से मिलाने के समय तो उसने पिताजी को नहीं सोचा अनन्तर वह उनसे भयभीत हो उठी अनसूया से कहने लगी—कि मुझे तो यह चिन्ता है कि पिताजी तीर्थयात्रा से वापस आकर और राजा दुष्यन्त के साथ शकुन्तला का गन्धर्व विवाह सुनकर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे?—एतावत् पुनश्चिन्तनीयम्। तातस्तीर्थयात्रातः प्रतिनिवृत्तः इमं वृत्तान्तं श्रुत्वा न जाने किं प्रतिपत्स्यते।

इस प्रकार शकुन्तला की दोनों सखियों अनसूया तथा प्रियम्बदा के चारित्रिक समता एवं विषमता पर विचार करने पर प्रतीत होता है कि दोनों भिन्न प्रकृति की आदर्श महिला हैं। इन दोनों के साथ शकुन्तला का घनिष्ठतम सम्बन्ध है। अभी दोनों कुमारी हैं।