अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
( ७१ )
अधिक रूपवती प्रतीत होती है। अन्त में विदूषक भी सौन्दर्य के आधार पर ही शकुन्तला को पहचानता है। तीनों में घनिष्ठतम प्रेम है। वे सभी एक दूसरे को सुखी देखना चाहती हैं।
अनसूया और प्रियम्बदा दोनों शकुन्तला से निःस्वार्थ प्रेम करती हैं तथा उसे सगी बहिन-सी मानती हैं। तृतीय अङ्क में कामव्यथित शकुन्तला को अस्वस्थ देखकर दोनों ही चिन्तित होती हैं। रहस्य ज्ञात हो जाने पर दोनों राजा और शकुन्तला का संगम कराने का प्रयास करती हैं। मालिनी के तट पर लता मण्डप में शकुन्तला और राजा दोनों का मिलन हो जाने पर मृगशावक को माता से मिलाने का व्याज बनाकर वे दोनों वहाँ से निकलकर बाहर खड़ी होकर देखती हैं कि कोई वहाँ जाकर उन्हें देख न ले। जब गौतमी आती है तब वे चक्रवाक वधू को कुछ कहने के बहाने शकुन्तला को सूचित कर देती हैं। दोनों ही शिष्ट, विनीत वाक्पटु एवं मधुरभाषिणी हैं। दोनों कर्मठ और बुद्धिमती हैं। आश्रम के कार्यों में दोनों का समान उत्साह है।
दुर्वासा का शाप सुनकर दोनों चिन्तित होती है उनसे अनुनय-विनय कर शापनिवृत्ति करा लेती हैं। शकुन्तला की विदाई के समय दोनों व्याकुल हो जाती हैं। उसके बिना उन्हें आश्रम सूना-सा प्रतीत होता है उसमें प्रवेश करने से कष्ट होता है, वे महर्षि कण्व से कहती हैं—तात ! शकुन्तला विरहितं शून्यमिव तपोवनं कथं प्रविशावः।
इस प्रकार दोनों के चरित्रों में साम्य होते हुए भी कुछ वैषम्य भी है। जहाँ अनसूया गम्भीर स्वभाव की है उसमें परिपक्व-बुद्धिता अधिक है। वहाँ प्रियम्बदा विनोदशीला एवं चुलबुली है। उसमें परिपक्वता की मात्रा कम है। राजा दुष्यन्त के आश्रम में आने पर अनसूया उनकी अगवानी करती है तथा विश्वामित्र और मेनका से शकुन्तला की उत्पत्ति बतला कर उनकी जिज्ञासा शान्त करती है। उसको किसी के प्रति असूया नहीं होती हमेशा सबको खुशी करने की बात सोचती है। अतः उसका नाम अनसूया सार्थक है—न विद्यते असूया यस्यां सा अनसूया = डाहरहित। प्रियम्बदा मधुरभाषिणी अपने नाम के अनुसार और विनोदप्रिया है। उसका विनोद अपमानजनक न होने से कष्टदायक नहीं होता उसमें एक प्रकार की मिठास रहती है। यही कारण है कि जब वह शकुन्तला से मजाक करती हुई पूछती है कि अनसूये ! जानती हो कि शकुन्तला वनज्योत्स्ना को क्यों प्रेम से देख रही है ! इस पर अनसूया कहती है कि नहीं समझ पा रही हूँ, तुम्हीं बतलाओ। इस पर प्रियम्बदा कहती है—सखि ! यह सोच रही है कि जिस प्रकार वनज्योत्स्ना योग्य वृक्ष से मिल गई वैसे ही मैं भी अपने अनुरूप वर को प्राप्त करूँगी। तब वह गद्गद होकर कहती है—अत एव प्रियम्वदेति भण्यसे। एष ते आत्मनश्चित्तगतो मनोरथः। प्रियम्बदा इधर-उधर की बातों में अधिक भाग लेती है। जब राजा कहता है कि आपकी सखी के विषय में हमें और भी कुछ पूछना है तब प्रियम्बदा झट कह बैठती है कि विचार करने की आवश्यकता नहीं, तपस्वियों से कोई भी बात निःसंकोच पूछी जा सकती है—अलं विचारेण, अनियन्त्रणानुयोगः तपस्विवजनो नाम। जब राजा पूछता है कि आपकी प्रियसखी क्या विवाह-पर्यन्त तपस्विनी बनी रहेगी या विवाह न करके मृगियों के साथ जीवन पर्यन्त निवास करेगी ? तब वह उत्तर देते हुए कहती है कि महानुभाव, धर्माचरण में भी यह शकुन्तला पराधीन है, फिर भी पिता जी का इसे योग्य वर को देने का विचार है। जब शकुन्तला रुष्ट होकर बकवाद करने वाली प्रियम्बदा की
( ७२ )
शिकायत करने के लिए आर्या गौतमी के पास जाना चाहती है तब वह यह कह कर उसे रोकती है कि—तुम मेरे दो वृक्षों के सींचने की ऋणी हो, मैने तेरी क्यारी के दो वृक्षों को जल से सींचा है। अतः तेरे ऊपर मेरे दो वृक्ष का ऋण बाकी है। पहले उनसे छुटकारा लो, तब जा—द्वे मे वृक्ष सेचनके धारयसि ताभ्यां तावदात्मानं मोचय ततो गमिष्यसि। प्रियम्बदा दुष्यन्त-शकुन्तला के परस्पर आकर्षण को भांपकर शकुन्तला से विवाह विषयक हँसी करती हुई चुटकी लेती है—सखी शकुन्तले ! यदि यहाँ आज पिता जी होते तो—हला शकुन्तले ! यद्यत्राद्य तातः सन्निहितो भवेत् । इसलिए प्रियम्बदा विनोदी है अनसूया स्वल्पभाषिणी और गम्भीर है। वह किसी बात पर सहसा विश्वास नहीं करती, सभी पहलुओं पर सोचती है। हानि-लाभ का विचार करती है ऊहापोह करने के बाद ही वह निर्णय करती है तृतीय अंक में दुष्यन्त-शकुन्तला के वैवाहिक सम्बन्ध के पूर्व राजा दुष्यन्त से कहती है कि राजाओं की कई पत्नियाँ होती हैं अतः जिस प्रकार मेरी प्रियसखी शकुन्तला शोक का कारण न बने ऐसा उपाय कीजिएगा—बहुवल्लभाः खलु राजानः श्रूयन्ते। तद् यथा इयं नः प्रियसखी बन्धुजनशोच्या न भवति तथा करिष्यसि। प्रियम्बदा का स्वभाव ठीक इससे विपरीत है। वह शीघ्र विश्वास कर लेती है। सभी कार्यों से होने वाली भलाई को सोचती है बुराई की तरफ उसका ध्यान ही नहीं जाता। चतुर्थ अंक में अनसूया दुष्यन्त के हस्तिनापुर चले जाने पर अनसूया चिन्तित है कि निवास में मग्न होकर राजा शकुन्तला का स्मरण करेगा या नहीं। इसपर प्रियम्बदा कहती है कि—अनसूये ! तुम विश्वास रखो क्योंकि दुष्यन्त के समान आकार वाले लोग गुणहीन नहीं होते--तत्र तावद् विश्वस्ता भव, नहि तादृशा आकृतिविशेषा गुणविरहिणो भवन्ति। अनसूया दूरदर्शिनी है, वह भविष्य की चिन्ता करती है। प्रियम्बदा सरल है वह भविष्य के झंझट में नहीं पड़ती, वर्तमान से ही सन्तुष्ट रहती है। अनसूया धीर प्रकृति की है और प्रियम्बदा शीघ्र घबड़ा जाती है। वह दुर्वासा के शाप को सुनकर घबड़ा उठती है और किंकर्तव्यविमूढ हो जाती है, किन्तु अनसूया धीरता रखकर महर्षि को मनाने के लिए उसे भेजती है और जब प्रियम्बदा घबड़ाती है कि तीर्थयात्रा से लौटने पर राजा के साथ शकुन्तला का विवाह सुनकर पिता जी न जाने क्या कहेंगे। तब अनसूया समझाती हुई कहती है कि कन्या को अनुरूप वर के हाथ सौंपना चाहिए यह पहला विचार है। यदि देव यह कार्य स्वयं बना दे तो गुरुजन कृतकृत्य ही होंगे—अनुरूपस्य वरस्य हस्ते कन्यका प्रतिपादनीया अयं तावत् प्रथमः कल्पः। तं यदि दैवं संपादयति ननु कृतार्थो गुरुजनः। अतः पिता जी के अप्रसन्न होने की कोई बात ही नहीं। प्रियम्बदा भावावेश में बहती है, वह कोई काम करते समय तो बिना सोचे विचारे कर देती है। बाद में उसे घबड़ाहट होती है। दुष्यन्त को शकुन्तला से मिलाने के समय तो उसने पिताजी को नहीं सोचा अनन्तर वह उनसे भयभीत हो उठी अनसूया से कहने लगी—कि मुझे तो यह चिन्ता है कि पिताजी तीर्थयात्रा से वापस आकर और राजा दुष्यन्त के साथ शकुन्तला का गन्धर्व विवाह सुनकर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे?—एतावत् पुनश्चिन्तनीयम्। तातस्तीर्थयात्रातः प्रतिनिवृत्तः इमं वृत्तान्तं श्रुत्वा न जाने किं प्रतिपत्स्यते।
इस प्रकार शकुन्तला की दोनों सखियों अनसूया तथा प्रियम्बदा के चारित्रिक समता एवं विषमता पर विचार करने पर प्रतीत होता है कि दोनों भिन्न प्रकृति की आदर्श महिला हैं। इन दोनों के साथ शकुन्तला का घनिष्ठतम सम्बन्ध है। अभी दोनों कुमारी हैं।
( ७३ )
गौतमी
गौतमी महर्षि कण्व की धर्मभगिनी हैं और तपस्या की प्रतिमूर्ति है। वह अत्यन्त सीधी सादी तपस्विनी है। उसके प्रभाव से आश्रम की व्यवस्था ठीक चलती है। सभी आश्रमवासी उसका आदर करते हैं। वह शकुन्तला को बड़ा प्यार करती है। शकुन्तला जब राजा दुष्यन्त के दर्शन से कामपीड़ित होकर मालिनी नदी के तट के समीपवर्ती एक लतामण्डप में शिलाफलक पर विराजमान होकर समय बिताती है तब उस बेचारी तपस्विनी गौतमी को क्या मालूम कि शकुन्तला किस खेल में अलमस्त है। वह शकुन्तला के शारीरिक ताप का समाचार सुनकर स्वस्थता के लिए तत्काल मन्त्रपूत दर्भोदक हाथ में लेकर उसके पास पहुँचती है उससे उसके शरीर पर सींच कर प्यार से पूछती है—बिटिया, तुम्हारे शरीर का सन्ताप क्या कुछ कम हुआ ? शकुन्तला कुछ लाभ होने का उत्तर देती है। उस वृद्धा तापसी के आने के पूर्व ही शकुन्तला की बीमारी की वास्तविक दवा राजा दुष्यन्त तो मिल ही गये हैं, किन्तु उस बेचारी को क्या पता। वह अपने उपचार से आराम का अनुभव करके शकुन्तला को साथ लेकर कुटी पर चली जाती है। उस वृद्धा तपस्विनी गौतमी के सदाचार और सद्व्यवहार का ही परिणाम है कि कुलपति कण्व जैसे महर्षि भी उसका समादर करते हुए शकुन्तला की विदाई के अवसर पर शार्ङ्गरव द्वारा दुष्यन्त को सन्देश देकर पूछते हैं कि इस विषय में गौतमी का क्या मत है?—कथं वा मन्यते गौतमी। इस पर गौतमी कहती है कि वधूजनों के लिए इतना ही उपदेश पर्याप्त है—बेटी ! इस अमृतोपदेश को स्मरण रखना—एतावानेव वधूजनस्योपदेशः। जाते एतद् खलु सर्वमवधारय। शार्ङ्गरव, शारद्वत तथा शकुन्तला के साथ हस्तिनापुर में दुष्यन्त के दरबार में उपस्थित हो राजा के समक्ष गौतमी जिस धैर्य एवं सरलता से अपना कर्तव्य निभाती है उससे पाठकों का हृदय प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। राजा दुष्यन्त शकुन्तला के साथ उसका भी अपमान करते हुए स्त्री समूह की निन्दा करते हैं, उन्हें धूर्त बतलाते हैं—
स्त्रीणामशिक्षितपटुत्वममानुषीषु संदृश्यते किमुत याः प्रतिबोधवत्यः ।
प्रागन्तरिक्षगमनात् स्वमपत्यजातमन्यैर्द्विजैः परभृताः खलु पोषयन्ति ॥ ५।२२
किन्तु तपस्विनी गौतमी शान्त और निर्विकार बनी रहती है। इससे इसकी समुद्र जैसी गम्भीरता पृथ्वी की भाँति सहनशीलता तथा मुनियों जैसी क्षमाशीलता व्यक्त होती है गौतमी के समान विशुद्ध पावनचरित भारतीय महिलाओं के लिए आदर्श का निदर्शन है।
सर्वदमन ( भरत )
अभिज्ञानशाकुन्तल के अनुसार देवताओं की माता अदिति तथा पिता महर्षि कश्यप के आश्रम हेमकूटपर्वत पर शकुन्तला के गर्भ से उसकी माता मेनका अप्सरा के पास सर्वदमन का जन्म हुआ था और वहाँ ही उसके जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न हुए। यह बचपन से ही बड़ा तेजस्वी एवं चञ्चल बालक था। शेर के बच्चों के साथ खेलता और जबरदस्ती उनका मुख दवा कर उनके दांत गिनता था।
जिस समय राजा दुष्यन्त इन्द्र के शत्रु दुर्जय नामक दैत्यगण को युद्ध में परास्त कर इन्द्र के रथ से अपनी राजधानी हस्तिनापुर लौट रहे थे उस समय वे मरीचिनन्दन महर्षि कश्यप के दर्शनार्थ रथ से उतर पड़े तथा इन्द्रसारथी मातलि दर्शन का अवसर जानने
( ७४ )
के निमित्त उनके पास चला जाता है। राजा दुष्यन्त एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लग जाते हैं। वहीं खेलते हुए शेर के बच्चे का दांत गिनते सर्वदमन को देखकर दुष्यन्त अपने मन में सोचते हैं यह किसका बालक है? जिसकी गोद में धूल धूसरित यह बालक खेलता होगा, वह व्यक्ति धन्य है। इतने में एक तापसी दूसरी से कहती है कि यह बालक बड़ा चपल हो गया है, शेर के बच्चे को तंग कर रहा है. कुटी में जाकर शकुन्त (खेलने के लिए बना हुआ मिट्टी का मयूर) ला। इस पर सर्वदमन कहता है कि मेरी माँ शकुन्तला कहाँ है? तब राजा दुष्यन्त तापसी से पूछ बैठते हैं कि यह किसका बालक है? इस पर वह कहती है—यह बालक पुरुवंश के एक राजर्षि का औरस पुत्र है। इस पर वे पुनः पूछते हैं कि उसका क्या नाम है? तब वह कहती है कि अपनी पत्नी का त्याग कर देने वाले का नाम कौन ले? इस पर दुष्यन्त पुनः अपने मन ही मन सोचते हैं कि यह सारी बातें तो मुझ में ही घटती हैं और इस बालक को देखकर मुझे औरस पुत्र के समान स्नेह भी हो रहा है। इतने में दूसरी तापसी मिट्टी का मयूर लेकर आ जाती है। उसे लेने के लिए जब बालक हाथ पसारता है तो उसमें चक्रवर्ती के चिह्न देखकर राजा और प्रसन्न हो जाते हैं। तबतक तापसी बोल बैठती है—हाय, जन्म के समय रक्षार्थ महर्षि द्वारा इसके हाथ में बँधा हुआ रक्षा-सूत्र कहाँ गिर गया? इस पर दुष्यन्त तत्काल जमीन से उठाकर कहते हैं कि यह है। इसपर वे आश्चर्य करने लगती हैं। तब दुष्यन्त पूछते हैं कि आप लोग क्यों आश्चर्य करती हैं? तब वे कहती हैं कि इस बालक के माता-पिता के अतिरिक्त अन्य के उठा लेने पर यह साँप बनकर काट लेता है। इतने में ही शकुन्तला वहाँ आ जाती है जिसे देखकर राजा दुष्यन्त उससे अपनी भूल पर क्षमा माँगने लगते हैं। तब तक मातलि आकर कहता है—राजन् ! कश्यपजी दर्शन देने के लिए तैयार बैठे हैं। कृपया आप अपनी पत्नी और पुत्र के साथ चलकर उनका दर्शन करें। तदनुसार वे सभी जाकर उनका दर्शन कर प्रणाम करते हैं। आशीर्वाद देते हुए महर्षि कहते हैं—दुष्यन्त ! मैंने पहले ही जान लिया था कि दुर्वासा के शापवश आपने कण्व पुत्री का त्याग कर दिया था। यह सर्वदमन जयन्त जैसा प्रतापी है और यह साध्वी शकुन्तला इन्द्राणी के समान सौभाग्यवती है इनके साथ राजधानी में जाकर सुखपूर्वक रहो। इन्द्र तुम्हारे राज्य में प्रचुर वृष्टि करें और तुम प्रजाओं का पालन करो। इसके अनन्तर राजा दुष्यन्त सपत्नीक कश्यपजी को प्रणाम कर अपनी राजधानी में आकर सर्वदमन को युवराज बना देते हैं और उसका नाम भरत रख देते हैं। बाद इसी के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।
इस प्रकार शकुन्तला की मातृस्थानीया वृद्धा गौतमी, शेर के बच्चे को उसकी माता के पास से उसके दांत गिनने वाला निर्भीक शिशु सर्वदमन मालिक की मर्जी देखकर चलने वाला सेनापति, गरीब किन्तु अपनी जाति का स्वाभिमानी शक्रतीर्थ निवासी जालोपजीवी धीवर, सिद्ध साधक बनकर अपराधी पर अत्याचार करने का विचार करने वाले परन्तु उसके पास पुरस्कार के पैसे देखते ही मद्य की आशा से क्षणभर में बदल जाने वाले पुलिस के सिपाही और उनका अफसर राजा का साला, नगर रक्षक इन सबके चित्र भी बड़े मनोरंजक और सटीक उतारे गये हैं। इन सभी पात्रों के चरित्र चित्रण को देखकर कालिदास की मार्मिक सूक्ष्म-निरीक्षण शक्ति पर अत्यन्त आश्चर्य होता है।
कण्व, दुर्वासा, मारीच, सर्वदमन
पात्र-परिचय
पुरुष-पात्र
| सूत्रधार | नाटका प्रधान पात्र तथा रंगमंच का अध्यक्ष। |
| दुष्यन्त | नाटक का नायक, हस्तिनापुर का राजा। |
| सूत | राजा दुष्यन्त का सारथि। |
| वैखानस | कण्व के आश्रम का ब्रह्मचारी। |
| विदूषक (माधव्य) | वेश-भूषा, आकार एवं वाणी द्वारा दुष्यन्त का हास्यकार मित्र एवं नर्म सचिव। |
| भद्रसेन | राजा दुष्यन्त का सेनापति। |
| रैवतक | दौवारिक, द्वारपाल, राजा का द्वाररक्षक। |
| ऋषिकुमार | महर्षि कण्व के आश्रम में रहने वाले दो मुनि बालक। |
| वैतालिक | राजा दुष्यन्त के दरबार के स्तुतिपाठक, दो भाट। |
| कण्व | आश्रम के कुलपति, शकुन्तला के पालक पिता। |
| हारित | कुलपति कण्व का एक शिष्य। |
| शिष्य | ,, |
| शाङ्ग्ररव | कुलपति का व्यावहारिक शिष्य। |
| शारद्वत | कुलपति का गम्भीर शिष्य। |
| कञ्चुकी | राजा दुष्यन्त का नौकर, रनिवास की देख-भाल करने वाला। |
| करभक | हस्तिनापुर निवासी माताओं का सन्देशवाहक दूत, वातायन। |
| पुरुष (धीवर) | एक मछुवा। |
| श्याल | राजा का शाला, नगररक्षक, नगर का कोतवाल। |
| सूचक, जानुक | नगर के सिपाही। |
| सोमरात | राजा का पुरोहित। |
| मातलि | इन्द्र का सारथि। |
| मारीच | ब्रह्माजी के पौत्र, मरीचि के पुत्र, प्रजापति कश्यप। |
| सर्वदमन (भरत) | शकुन्तला से उत्पन्न राजा दुष्यन्त का औरस पुत्र। |
| गालव | महर्षि कश्यप का शिष्य। |
( ७६ )
स्त्री-पात्र
नटी — सूत्रधार की पत्नी। शकुन्तला — नाटक की नायिका, महर्षि कण्व की पोष्यपुत्री, मेनका से विश्वामित्र द्वारा उत्पन्न कन्या। अनसूया, प्रियंवदा — शकुन्तला की प्रिय सखियाँ। गौतमी — कुलपति कण्व की धर्मभगिनी। प्रतिहारी — राजा दुष्यन्त की परिचायिका। सानुमती या मिश्रकेशी } मेनका की प्रिय सखी, एक अप्सरा। परभृतिका, मधुकरिका } राजा दुष्यन्त के प्रमदवन की परिपालिका दासियाँ। चतुरिका — चेटी, राजा दुष्यन्त की दासी। प्रथमा तापसी — महर्षि कश्यप के आश्रम में रहनेवाली सर्वदमन की रक्षिका दासी। द्वितीया तापसी — महर्षि कश्यप के आश्रम में रहनेवाली सर्वदमन की रक्षिका दासी। अदिति — महर्षि कश्यप की धर्मपत्नी, देवताओं की माता, दक्ष की कन्या।
प्रसङ्गवश वर्णित अन्य पात्र
मघवा — देवताओं के राजा इन्द्र, हरि, आखण्डल, शतक्रतु, सहस्राक्ष आदि। दुर्वासा — एक ऋषि, महर्षि अत्रि तथा अनसूया जी के पुत्र। कौशिक — कुशिक के पुत्र तथा शकुन्तला के जन्मदाता पिता राजर्षि विश्वामित्र। मेनका — इन्द्रपुरी की एक अप्सरा, शकुन्तला की माँ। जयन्त — जयन्ती = शची, इन्द्राणी से उत्पन्न इन्द्र का पुत्र। नारद — देवर्षिनारद, ब्रह्माजी के अङ्गज पुत्र (उत्सङ्गान्नारदो यशे)। हंसपदिका — राजादुष्यन्त की अन्यतमा भार्या। सुमती — दुष्यन्त की अवसरज्ञा धर्मपत्नी।
जय माता दी
॥ श्रीः ॥
महाकविकालिदासप्रणीतम्
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
( मङ्गलाचरणम् )
या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः॥ १ ॥
नत्वा गुरुपदाम्भोजं स्मृत्वा सारस्वतं महः।
छात्राणां सुखबोधाय विदुषां मोदहेतवे॥
कालिदासस्य सर्वस्वे ह्यभिज्ञानशकुन्तले।
श्रीश्रीकृष्णमणिव्याख्यां प्रकुरुते च सुधामिधाम्॥
अथ तत्रभवान् कविकुलकलाधरः कालिदासः अभिनेयार्थं दृश्यकाव्यविशेषं व्याचिकीर्षुः समाप्तिकामो मङ्गलमाचरेदित्यनुमितशिष्टाचारानुसारं निर्विघ्नपरिसमाप्तये स्वेष्टदेवता-स्मरणत्मकं मङ्गलमाचरन्—
'आशीर्नमस्क्रियारूपः श्लोकः काव्यार्थसूचकः।
नान्दीति कथ्यते' इति ॥
भरतादिभिर्व्याकृताम् अवान्तरवाक्यात्मकाष्टपदभूषितां सर्वानन्दिनीं पूर्वरङ्गाङ्गभूतां नान्दीं नाटकादौ पठति स्थापनामा सूत्रधारः—या सृष्टिरिति।
**अन्वयः—**या स्रष्टुः आद्या सृष्टिः, या विधिहुतं हविः वहति, या च होत्री, ये द्वे कालं विधत्तः, या श्रुतिविषयगुणा विश्वं व्याप्य स्थिता, या सर्वबीजप्रकृति. इति आहुः, यया प्राणिनः प्राणवन्तः, ताभिः प्रत्यक्षाभिः अष्टाभिः तनुभिः प्रपन्नः वः अवतु ॥ १ ॥
या = तनुः स्रष्टुः = ब्रह्मणः आद्या = प्राथमिको सृष्टिः = सर्गः जलमयीमूर्ति-
जो मूर्ति ब्रह्माजी की प्रथम सृष्टि है। (जलमयी मूर्ति) जो विधिपूर्वक हवन किये गये हवि=घृतादि हवनीयद्रव्य को देवताओं तक पहुँचाती है (अग्निमयीमूर्ति) और जो मूर्ति हवन करने वाली है (यजमानरूपा मूर्ति) जो दो मूर्तियां समय=दिन रात का विभाजन करती हैं। (सूर्य और चन्द्रमारूपी मूर्ति) जो मूर्ति शब्द गुणवाली है और विश्व को व्याप्त करके अवस्थित है (आकाश
२ अभिज्ञानशाकुन्तलम्
रित्यर्थः¹ । या = तनुः विधिकृतं = विधिना = श्रुतिस्मृत्युक्तविधानेन, विधिपूर्वकं हुतं = अग्नौ समर्पितं हविः = होमद्रव्यं घृतादिकं वहति = धारयति, देवान् प्रापयति, वह्निमयोमूर्तिरित्यर्थः² । या च = अपरा तनुः होत्री = जुहोतीति होत्री = हवनकर्त्री यजमानरूपा³ । ये = द्वे = द्विसंख्याके तनू कालं = समयं, रात्रिन्दिनम् विधत्तः = कुरुतः, व्यवस्थापयतः । तथा च चन्द्रात्मकं सूर्यात्मकं चेति तनुद्वयमित्यर्थः । या = तनुः श्रुतेर्विषयगुणा—श्रुतेः = श्रवणेन्द्रियस्य विषयः = गोचरः इति श्रुतिविषयः, श्रुतिविषयो गुणो यस्याः सा श्रुतिविषयगुणा = श्रवणेन्द्रियग्राह्यशब्दाख्यविशेषगुणशालिनी, विश्वं = समस्तं जगत् व्याप्य = व्यासं कृत्वा स्थिता = वर्तते, आकाशाख्या भगवतो मूर्तिरित्यर्थः⁴ । यां = तनुं सर्वबीजप्रकृति = सर्वेषां = समस्तानां बीजानां = सस्यादीनां प्रकृतिः = प्रधानकारणमिति सर्वबीजप्रकृतिः = सर्वविधसस्याङ्कुरयोनिः, इति = एवम् आहुः = कथयन्ति विद्वांसः । सर्वाङ्कुरकारणभूता पृथ्विरूपा तनुरित्यर्थः⁵ । यया = वायुरूपया तन्वा प्राणिनः = शरीरिणः, प्राणवन्तः = चैतन्यभाजो भवन्ति, वायुरूपा भगवतो मूर्तिरित्यर्थः । ताभिः = एताभिः पूर्वोक्ताभिः प्रत्यक्षाभिः = स्थूलबुद्धिभिरपि प्रत्यक्षमुपलक्ष्यमानाभिः अष्टाभिः = अष्टसंख्याभिः जल-वह्नि-यजमान-चन्द्र-सूर्यगगन-धरणी-वायुरूपाभिः तनुभिः मूर्तिभिः, प्रपन्नः = युक्तं, ईष्टे इति ईशः = चराचर-नियन्ता शक्तिविशिष्टो भगवान् शिवः, वः = युष्मान् सभ्यान्, अस्मान् नटादींश्च, अवतु = रक्षतु, शुभोदयेन योजयतु इत्यर्थः । एवं विश्वस्मिन्नष्टमूर्तेर्भवति समेषां प्रत्यक्षम् ।
रूपी मूर्ति ) जो मूर्ति समस्त बीजों को उत्पन्न करने वाली है ( पृथ्वीरूपी मूर्ति ) और जिस मूर्ति से प्राणिमात्र अनुप्राणित हैं ( वायु रूपी मूर्ति ) इस प्रकार प्रत्यक्षसिद्ध इन आठों मूर्तियों से युक्त भगवान् सदाशिव आपलोगों की रक्षा करें ॥ १ ॥
विशेष— भगवान् शिवजी का एक नाम अष्टमूर्ति भी है । इसका अभिप्राय यह है कि इनका शरीर आठ भागो में विभक्त होकर विश्व का कल्याण करता है जिनके नाम हैं जल, अग्नि, यजमान, सूर्य, चन्द्रमा, आकाश, पृथ्वी, और वायु । ये शिवजी की आठों मूर्तियाँ जगत्प्रसिद्ध हैं और प्राणिमात्र को इनका अनुभव प्रतिदिन प्रत्यक्ष होता रहता है । इन आठों मूर्तियों से विराजमान श्री शिवजी सृष्टिमात्र का संचालन करते हुए जीवमात्र का सर्वदा हित करते हैं ।
१. सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ।
अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत् ॥ म० स्मृ० १।१८
२. अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ।
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥ मं० स्मृ० ३।७६
३. दीक्षितं ब्राह्मणं प्राहुरात्मानं च मुनीश्वराः ।
यजमानाह्वया मूर्तिर्विश्वस्य शिवदायिनः ॥
४. आकाशस्य च विज्ञेयः शब्दो वैशेषिको गुणः । सि० मु०
श्रोत्रेन्द्रियग्राह्यो गुणः शब्द इत्यन्नंभट्टस्तर्कसंग्रहे ।
५. इयं हि भूमिर्भूतानां शाश्वती योनिरुच्यते ।
६. भूमिरपोऽनलो वायुरात्मा व्योम रविश्शशी ।
इत्यष्टौ सर्वलोकानां प्रत्यक्षा हरमूर्तयः ॥
प्रथमोऽङ्कः (आश्रमप्रवेश व शकुन्तला दर्शन)
प्रथमोऽङ्कः ३
उभयोः जल-वाय्वोः त्वगिन्द्रियेण स्पार्शं प्रत्यक्षं भवति, यजमान-चन्द्र-सूर्य-पृथिवीनां चक्षुरिन्द्रियेण चाक्षुषं प्रत्यक्षं जायते, शब्दस्य श्रोत्रेन्द्रियेण श्रावणम् आकाशस्य चौपचारिकं चाक्षुषं प्रत्यक्षं सर्वैरेव सर्वदाऽनुभूयते । तथाच जल-वह्नि-यजमान-चन्द्र-सूर्याकाश-पृथ्वीरूपया च मूर्त्या युक्तोऽष्टमूर्तिः सर्वप्रसिद्धः प्रत्यक्षमपि भूयमानमाहात्म्यातिशयो भगवान् सदाशिवः, सर्वेभ्यो भद्रं वितरत्विति भावः ।
यद्वा केचन पद्येनानेनाभिज्ञानशाकुन्तलप्रतिपाद्योऽपि विषयः सूच्यते इति ब्रुवते तथाहि—
या = शकुन्तला स्रष्टुः = ब्रह्मणः आद्या = श्रेष्ठा सृष्टिः = कृतिः, सौन्दर्यातिशयशालित्वात् तादृशसृष्टेरजातत्वाद्वा । या च विधिहुतं विधिना = गर्भाधानविधानेन हुतं = निषिक्तमिति विधिहुतं हविः = बीजं दुष्यन्तेनाहितं = वीर्यं वहति = धत्ते । एतेन शकुन्तलाया गर्भावस्था सूच्यते । या च होत्री = उपकुलपतिः कण्वो मुनिः । ये द्वे = सख्यौ = अनुसूया-प्रियंवदे कालं = महर्षेर्दुर्वाससः शापावसानसमयं विधत्तः = धारयतः = जानीतः, एतेन ते द्वे सख्यौ सूचिते । श्रुतिविषयगुणाया = श्रुतिविषयो गुणानाम् अयः = शुभावहो विधिः यस्याः सा श्रुतिविषयगुणाया यद्वा विषयो देशः-श्रुतो विषयैः = विषयवास्तव्यैर्लोकैः गुणानामयः = शुभावहो विधिः यस्याः सा श्रुतविषयगुणाया । एतेन दुष्यन्तराष्ट्रागमनं तत्तिरोधानं च सूचितं भवति । या पातिव्रत्यादिगुणैः विश्वं व्याप्य = सकलं लोकं व्याप्य स्थिता । एतेन-सूदूरकश्यपाश्रमनिवासः सूचितः । यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिः, इत्यनेन नामग्रहणाल्लाभैकदेश-ग्रहणमितिरीत्या सर्वदमनाख्यबीजस्य योनिरुत्पत्तिकारणमित्यर्थलाभात् सर्वदमनकुमारस्तदुत्पत्तिश्च सूच्यते । यया प्राणिनः प्रजाः प्राणवन्तः = प्रहृष्टाः इत्यनेन शकुन्तला-दुष्यन्त-सर्वदमनानां पुनः स्वराज्ये प्रत्यागमनं सूचितम् । ईशः = राजा दुष्यन्तः, इति = इत्थमष्टाभिः तनुभिः = प्रकृत्यादिभिः विभूतिभिः = अष्टानां लोकपालानां कलाभिः वा¹ प्रपन्नः = युक्तः समवेतो वा, स्वं राज्यम् अवतु = पालयतु । एतेन नाटकोक्तोऽर्थः सूचितो भवति ।
अत्र सर्वरीतीनां मुख्या रीतिः वैदर्भी । गुणेषु प्रधानः प्रसादगुणः । सृष्टिः स्रष्टुः, वहति हुत, प्राणि प्राण, भिर्भीः इत्यनुप्रासालङ्कारः । अग्नेर्हविःस्वभाववहनादिवर्णनात्
मनु आदि शास्त्रकारों का मत है कि ब्रह्माजी ने सर्वप्रथम जल की ही सृष्टि की थी । शास्त्रविधि के अनुसार हवन करने पर अग्निदेवता इस हवि को देवताओं के पास पहुँचा देते हैं । यद्यपि शास्त्रों के अनुसार काल अखण्ड और अनादि है, फिर भी सूर्य और चन्द्रमा के द्वारा दिन, रात, तिथि वर्ष आदि के रूप में उसका विभाजन होता है । इसलिए शास्त्रों में सूर्य और चन्द्रमा को काल का कर्ता बताया गया है ।
यद्यपि यहां प्राणी और प्राणवान् शब्द समानार्थक हैं, फिर भी यहाँ पुनरुक्ति दोष नहीं, क्योंकि प्रथम प्राणीशब्द जीव के अर्थ में रूढ है और दूसरा विशेषण है ।
यहाँ प्रत्यक्ष का अर्थ केवल नेत्रगोचर न होकर इन्द्रिय गोचर हैं, क्योंकि वायु का प्रत्यक्ष = स्पर्श त्वगिन्द्रिय गोचर है । साधारण मनुष्य आकाश को नीला समझते हैं । इसका प्रत्यक्ष औपचारिक माना जाता है । न्यायशास्त्र वायु और आकाश को प्रत्यक्ष नहीं मानता, किन्तु वेदान्त मानता है ।
१. भूतार्कचन्द्रयज्वानो मूर्तयोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ।
अष्टानां लोकपालानां मात्राभिर्जायते नृपः ॥
४ अभिज्ञानशाकुन्तलम्
( नान्द्यन्ते—ततः¹ प्रविशति सूत्रधारः )
स्वभावोक्तिः, या हविर्या च होत्रीति विरोधाभासः प्रत्यक्षाभिः ताभिः तनुभिः प्रपन्न इति समासोक्तिश्चालङ्कारः, स्रग्धराछन्दश्च विज्ञेयम् । नान्दीश्लोकत्वादस्य सर्वगुरुः क्षेमकरो मगणः । तथाचोक्तं भामहेन—क्षेमं सर्वगुर्वादत्ते मगणो भूमिदैवतः । इति । या सृष्टिः स्रष्टुराद्येतिपदमष्टपदा नान्दी । नान्दी स्वरूपं च प्रोक्तं साहित्यदर्पणे—
आशीर्वचनसंयुक्ता स्तुतिर्यस्मात् प्रयुज्यते ।
देवद्विजनृपादीनां तस्मान्नान्दीति संज्ञिता ॥
माङ्गल्यशंखचन्द्राब्जकोककैरवशंसिनी ।
पदैर्युक्ता द्वादशभिरष्टाभिर्वा पदैरुत ॥
पदानि चात्र वाक्योपलक्षणानि । तथा चोक्तम्—
न पदं पदमित्याहुर्वाक्यं तु पदमुच्यते ।
पदैर्द्वादशभिः षड्भिरष्टाभिर्वाप्यलङ्कृतम् ॥
यद्वा—
श्लोकपादं पदं केचित् सुप्तिङन्तमथापरे ।
परेऽवान्तरवाक्यैकस्वरूपपदमूचिरे ॥ = नाट्यप्रदीपः
तत्र नाट्यशास्त्रमतम्—
सूत्रधारो पठेन्नान्दीं मध्यमं स्वरमाश्रितः ।। १ ।।
मध्यम स्वरसंयुक्तां ततो नान्दीमुदीरयेत् ।
इत्थं पूर्वरङ्गस्य मुख्याङ्गरूपनान्दीविधानानन्तरं नाटकस्यारम्भं सूचयितुमुपक्रमते—नान्द्यन्त इति । नान्द्यन्ते = नान्द्या अन्ते = अवसाने, समाप्तौ या सृष्टिः स्रष्टुराद्येति मङ्गलाचरणश्लोकरूपनान्दीपाठनानन्तरं प्रविशति सूत्रधारः । इदमत्र रहस्यं नान्दी नाम मङ्गलाचरणं, तच्च प्रारब्धस्य नाटकस्य निर्विघ्नपरिसमाप्तये यथामिमतं तदवश्यं विधाय रङ्गान्तः प्रविशति सूत्रधारः । एवं पूर्वं नान्दी ततः सूत्रधारस्य प्रवेश इत्यायाति । साम्प्रतं क्वचिदस्य विपर्ययोऽपि दृश्यते ।
नान्दीपदव्युत्पत्तिस्तु—नन्दयति = आनन्दयति जनानीति नान्दी, यद्वा नन्दन्ति देवता अस्यामनया वेति नान्दी । नाटकादौ प्रथमं विहितं मङ्गलार्थं पद्यम् । नान्दीलक्षणं यथा—
देवतादिनमस्कारमङ्गलारम्भपाठकैः ।
या क्रिया नन्द्यते नाट्यारम्भे नान्दी तु सा स्मृता ॥ = साहित्यदर्पणे
( अभिनय करने वाले सूत्रधार द्वारा किये गये नान्दी=मङ्गलाचरण श्लोक पाठ के अन्त में सूत्रधार का प्रवेश । )
विशेष—सबसे पहले विघ्नशान्ति के निमित्त जो ईशप्रार्थना की जाती है उसे या आशीर्वाद से युक्त देवता, ब्राह्मण, और राजा आदिकों की स्तुति को नान्दी कहते हैं।
१. यह पाठान्तर कई प्रकाशनों में नहीं है केवल नान्द्यन्ते मात्र है ।
9419666702
प्रथमोऽङ्कः
५
सूत्रधारः—( ^१नेपथ्याभिमुखमवलोक्य ) आर्ये यदि नेपथ्यविधानमवसितं ^२तर्हीतस्तावदागम्यताम् ।
नाट्यप्रदीपे—
नन्दन्ति काव्यानि कवीन्द्रवर्गाः कुशीलवाः पारिषदाश्च सन्तः ।
यस्मादलं सज्जनसिन्धुहंसी तस्मादियं सा कथितेह नान्दी ॥
नान्दी च नाटकस्य पूर्वरङ्गाङ्गभूता। पूर्वरङ्गलक्षणं यथा—
सभापतिः सभाः सभ्या गायका वादका अपि ।
नटी नटश्च मोदन्ते यत्रान्योन्यस्य रञ्जनात् ॥
अतो रङ्ग इति ज्ञेयं पूर्वं यस्मात् प्रकल्प्यते ।
तस्मादयं पूर्वरङ्ग इति विद्वद्भिरुच्यते ॥
नान्द्या अवश्यकर्तव्यत्वं प्राचीनैरप्युक्तम्—
यद्यप्यङ्गानि भूयांसि पूर्वरङ्गस्य नाटके ।
तथाप्यवश्यं कर्तव्यं नान्दी विघ्नप्रशान्तये ॥
सूत्रधारः— सूत्रं प्रयोगानुष्ठानं धारयतीति सूत्रधारः यद्वा सूत्रं = नाटकीयसर्वपात्रप्रवर्त्तनाप्रयोजकं सर्वान्तःस्यूतं पुष्पमालामिव धारयतीति सूत्रधारः । नेपथ्यं = वेशविन्यासः तदर्थं यद्गृहं तदपि नेपथ्यम् । यत्र नाटकीयपात्राणि स्ववेशविन्यासान् प्रकुर्वते तन्नेपथ्यमिति भावः । तस्याभिमुखं = तत्सामुख्यम् अवलोक्य = चक्षुर्विधाय कथयति—अलमतिविस्तरेण = इतोऽधिकं मङ्गलाचरणमनावश्यकम् । आर्ये ! प्रिये ! नेपथ्यस्य विधानं = नववेशरचनाकरणम्, अवसितं = समाप्तं तर्हि = तदा तावत् = प्रथमम् इह रङ्गशालायाम आगम्यतां = उपगम्यतां त्वयेति, शेषः मत् समीपमेहीत्यर्थः ।
नाटक में आने वाली वस्तु का आभास जल्दी से मिलने के कारण इस नान्दी को पत्रावली नामक नान्दी कहते हैं। जैसे—
यस्यां बीजस्य विन्यासो ह्यभिधेयस्य वस्तुनः।
श्लेषेण वा समासोक्त्या नान्दी पत्रावलीति सा ॥ = नाट्यप्रदीप
सूत्रधार—( नेपथ्य=साज सज्जा कक्ष की ओर देखकर ) अत्यन्तविस्तार से क्या लाभ है ? प्रिये ! यदि तुम्हारा श्रृंगार समाप्त हो चुका हो तो जरा इधर आ जाओ ।
विशेष— नाटकों की सामग्री सूत्र कहलाती है उसे धारण करनेवाला अथवा संभालने वाला व्यक्ति सूत्रधार कहलाता है—
नाट्योपकरणादीनि सूत्रमित्यभिधीयते ।
सूत्रं धारयतीत्यर्थे सूत्रधारो मतो बुधैः ॥
ब्राह्मण, गुरुजन, मन्त्री, और सूत्रधार नटी परस्पर आर्य ! या आर्ये संबोधन का प्रयोग किया करते हैं—
विप्रामात्याग्रजाः सर्वे नटीं सूत्रकृतो मिथः । = भरतानुशासन
और भी—वाच्यौ नटी सूत्राधारावार्ये नाम्नेति सर्वदा ।
पाठा०—१. नेपथ्याभिधानम् । २. तदित आगम्यतां तावत्, इतस्तावदागम्यताम् ।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
६ अभिज्ञानशाकुन्तलम्
( प्रविश्य )
नटी—अज्जउत्त, इयं ह्नि । आणवे दु अज्जो को णिओओ अणुचिट्ठीअदुत्ति ।
[ आर्यपुत्र इयमस्मि । १आज्ञापयतु आर्यः को नियोगोऽनुष्ठीयतामिति । ]
सूत्रधारः—२आर्ये ! इयं हि रस-भाव-विशेषदीक्षागुरोर्विक्रमादित्यस्य अभिरूप-भूयिष्ठा परिषद् । ३अद्य खलु कालिदासग्रथितवस्तुनाभिज्ञानशँकुन्तलनामधेयेन नवेन नाटकेनोपस्थातव्यमस्माभिस्तत् प्रतिपात्रमाधीयतां यत्नः ।
प्रविश्य—रङ्गभूमौ आविर्भूय नटी=सूत्रधारपत्नी कथयति—हे आर्य ! हे स्वामिन् ! इयमस्मि = इयमहं भवन्नियोगादुपस्थिताऽस्मि । आज्ञापयतु = निर्दिशतु, आर्यः = श्रीमान् को नियोगः = कः खल्वादेशो भवतः अनुष्ठीयताम् = सम्प्रति मया अनुष्ठेयः, कर्तव्यः ।
सूत्रधारः—सूत्रधारः = प्रधाननटः कथयति यत्—
रङ्गं प्रसाद्य मधुरैः श्लोकैः काव्यार्थसूचकैः ।
रूपकस्य कवेराख्यां गोत्राद्यपि स कीर्तयेत् ॥
ऋतुं कञ्चिदुपादाय भारतीं वृत्तिमाश्रितः ।
इति धनिकोक्तौ नाटकस्य कवेः नाम कर्म च निर्दिष्टम् ।
भारती संस्कृतप्रायो वाग्व्यापारे नटाश्रयः ।
अङ्गान्येतोन्मुखीकारः प्रशंसातः प्ररोचना ॥
इत्युक्तस्वरूपां भारतीवृत्त्यङ्गभूतां प्ररोचनात्मकमङ्गमुपन्यस्यति सूत्रधारमुखेन—
आर्ये इति—आर्ये = प्रिये ! इयं = एषा, हि परिषद् = सभा, रसभावविशेषदीक्षा-
नटी—( रंगमंच पर आकर ) आर्यपुत्र ! मैं आ गयी । श्रीमान् आज्ञा दें कि मैं क्या करूँ ?
विशेष—संस्कृत के नाटकों में सूत्रधार राजा आदि श्रेष्ठपात्र, सन्यासिनो, और कभी-कभी राजकुमारी, तथा वेश्या स्त्रियाँ संस्कृत में बोलती है और शेष स्त्रियाँ प्रायः प्राकृत में बोलती हैं—
पठ्यं तु संस्कृतं नृणामनीचानां कृतात्मनाम् ।
लिङ्गिनीनां महादेव्या मन्त्रिजवेश्ययोः क्वचित् ॥
स्त्रीणां तु प्राकृतं प्रायः..................। = दशरूपक २।४४, ६५
१यद्यपि साधारणतः प्रवेश का अर्थ होता है 'चलकर अन्दर आना', किन्तु नाटक में प्रवेश करने का अर्थ है—रंगमंच पर प्रकट हो जाना, क्योंकि कभी-कभी किसी पात्र का लेटे हुए या बैठे हुए भी प्रवेश करना दिखाया जाता है । यहाँ नटी सूत्रधार की पत्नी हैं जिसे उसने पहले बुलाया था । संस्कृत साहित्य से पति के लिए आर्य सम्बोधन अत्यन्त प्रचलित है । यहाँ आर्य का अर्थ सज्जन है न कि कोई जाति । संस्कृत में आर्य की परिभाषा है । सभी स्त्रियाँ अपने पति को आर्यपुत्र कहकर पुकारती है—
कर्तव्यमाचरन् कार्यमकर्तव्यमना चरन् ।
तिष्ठति प्रकृताचारे स वै आर्य इति स्मृतः ॥
सर्वस्त्रीभिः पतिर्वाच्य आर्यपुत्रेति यौवने । = रत्नकोश
सूत्रधार—आर्ये ! यह शृङ्गारादि रस, भाव आदि के विशेष मर्मज्ञ महाराज विक्रमादित्य की
पाठ० १. क्वचित् पाठो नास्ति ।
२. आर्ये ! अभिरूप भूयिष्ठा परिषदीयम् ।
३. अस्यां च ।
४. शकुन्तल ।
प्रथमोऽङ्कः ७
नटी—सुविहिदप्पओअदाए अज्जस्स ण किं वि परिहाइस्यदि [ सुविहित-प्रयोगतयार्यस्य न किमपि परिहास्यते ] ।
सूत्रधारः—( सस्मितम् ) आर्ये कथयामि ते भूतार्थम्—
गुरोः = रसाः = शृङ्गारादयः भावाः = विभावातुभावसंचारिभावाः तेषां विशेषा रसभावविशेषाः तेषां दीक्षागुरुः = दीक्षादायको गुरुः तस्यै = रसभावविशेषदीक्षागुरोः = शृङ्गारादिरसदेवादिविषयकरत्यादिभावप्रवर्तकस्य, विक्रमादित्यस्य = आदित्यपदलाञ्छनस्य राज्ञो विक्रमस्य । अभिरूपभूयिष्ठा = अभिलक्ष्यं रूपं येषां ते अभिरूपाः = अभिरूपाः = विद्वांसः भूयिष्ठाः = बहुला यस्यां सा अभिरूपभूयिष्ठा यद्वा अभिरूपैः भूयिष्ठा, अभिरूपभूयिष्ठा अथवा अभिरूपः भूयिष्ठः = भूयिष्ठभागो यस्यां सा अभिरूपभूयिष्ठा = विद्वद्गणबहुला । अद्य = अस्मिन् दिवसे, खलु = निश्चयेन, कालिदासग्रथितवस्तुना — कालिदासेन ग्रथितं वस्तु यस्मिन् तत् तेन कालिदासग्रथितवस्तुना अभिज्ञानशाकुन्तलेन—अभिज्ञायतेऽनेन यत्तद् अभिज्ञानं, शकुन्तलामधिकृत्य कृतं शाकुन्तलं अभिज्ञानं च तत् शाकुन्तलम् अभिज्ञानशाकुन्तलं तेन अभिज्ञानशाकुन्तलेन, अभिज्ञानशाकुन्तलनाम्ना नवेन = प्रत्यग्ररचितेन नाटकेन रूपकावन्तर्भेदेन उपस्थातव्यं = अभिनेतव्यम्, तत् = तस्मात् कारणात् = पात्रं पात्रं प्रतीति प्रतिपात्रम् = प्रतिनटम्, यत्नः = अध्यवसायः, आधीयताम् = क्रियताम् । एवंविधायाः विद्वद्विशिष्टायाः परिषद्को रञ्जने प्रवृत्तैरस्माभिः सर्वथाऽवहितैर्भाव्यमिति भावः ।
नटी—सुविहितः = कृतः प्रयोगो येन स सुविहितप्रयोगः तस्य भावः तत्ता सुविहितप्रयोगता तया सुविहितप्रयोगतया = बहुशः कृतनाटकाभिनयतया आर्यस्य = भवतः न किमपि परिहास्यते = नहि किमपि त्रुटितं भविष्यति । समेषां नटानां भवतश्च नाट्याद्यभ्यासनैपुण्येन सर्वं शोभनमेवेदं भवेदिति नट्याः अभिप्रायः ।
सूत्रधारः—स्मितं = मन्दहास्यम्, तेन सह सस्मितं सूत्रधारो नटी ब्रूते । आर्ये = प्रिये !
परिषद् हैं, इससे विद्वान् अधिक है। इस विद्वत्सभा के सामने आज हमें एक नये नाटक को प्रस्तुत करने के लिए उपस्थित होना है, जिसका विषयवस्तु प्रसिद्ध कविवर कालिदास द्वारा गुम्फित किया गया है और जिसका नाम अभिज्ञानशाकुन्तल है। अतः नाटक के खेलने वाले प्रत्येक पात्र को बड़ी सावधानी से कार्य करना होगा, कोई त्रुटि न होने पाये ।
विशेष—विशेष रूप से प्रयत्न करने का कारण विद्वानों की सभा बतायी गयी। दूसरा कारण कालिदास जैसे प्रसिद्ध महाकवि की रचना है जिसके प्रति विशेष सम्मान होने के कारण अभिनय अच्छा होना चाहिए। तीसरा कारण है—नाटक नया है, नयी चीज को जमाना कठिन होता है। अतः सावधानी के साथ प्रत्येक पात्र को तैयार रहना चाहिए।
नटी—आपकी मण्डली नाटक के खेलने में अत्यन्त निपुण है। अतः पात्रों से किसी प्रकार त्रुटि होने का भय नहीं ।
विशेष—नटी के कहने का तात्पर्य यह है कि आपकी अभिनय कुशलता एवं बारंबार अभ्यास के कारण ऐसी कोई भी कमी नहीं रहेगी, जो विद्वानों को खले। अतः आप निर्भीक होकर इस नाटक के अभिनय की व्यवस्था करें।
सूत्रधार—( मुसकरा कर ) आर्ये मैं तुमसे सत्य कह रहा हूँ—
८
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
आपरितोषाद् विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम् ।
बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेतः ॥ २ ॥
नटी—अज्ज ! एवं णेदं । अणन्तरकरणिज्जं दाव अज्जो आणवेदु । [ आर्य ! एवं न्विदम् । अनन्तरकरणीयं तावदार्य आज्ञापयतु । ]
सूत्रधारः—आर्ये ! ^२किमन्यदस्याः परिषदः श्रुतिप्रमोदहेतोर्गीतात् करणीयमस्ति ?
श्रेष्ठे । प्रयोगस्यसाधुत्वे सुशिक्षितत्त्वं न प्रमाणम्, अपितु विदुषां सन्तोष एवेति कथयामि-निर्दिशामि, भूतार्थं = परमार्थम्, त्वं सत्यं न वेत्सि, इदानीमाकर्णयेति ।
अन्वयः—विदुषां आपरितोषात् प्रयोगविज्ञानं साधु न मन्ये बलवदपि शिक्षितानां चेतः आत्मनि अप्रत्ययम् ( भवति ) ।
आपरितोषादिति—विदुषां प्रयोगरहस्यवेदिनां सामाजिकानाम्, आपरितोषात् = सन्तुष्टिपर्यन्तम्, विशिष्टज्ञानं प्रयोगस्य विज्ञानं प्रयोगविज्ञानं=अभिनयकलाकौशलम्, साधु न मन्ये = अहं शोभनं न स्वीकरोमि त्वं साधु मन्यसे चेत् तन्न युक्तमिति भावः । साधुमननाभावे हेतुमाहुः—बलवदिति । बलवत् = दृढतरं शिक्षितानां = कृताभ्यासानामपि चेतः हृदयं आत्मनि = आत्मप्रयोगे अप्रत्ययं = अविश्वासं भवति । सामाजिकानां विदुषां परितोष एव प्रयोगस्य साधुत्वे विश्वासं जनयति । तथा च सुशिक्षितस्यापि नटस्यात्मनः प्रयोगे सामाजिकपरितोषमन्तरा विश्वासो न भवतीति भावः । तच्चोक्तमभियुक्तैः—प्रायः प्रत्ययमाधत्ते स्वगुणेषूत्तमादरः । अत्रार्थान्तरन्यासोऽलङ्कारः, आर्याच्छन्दश्च ॥ २ ॥
नटी—नटी = सूत्रधारपत्नी, विनयः = नम्रत्वं तेन सह वर्तते इति सविनयम् । एवमेतत् = यथा भवानाह तथैव तत्, सत्यमिदम् । अनन्तरं करणीयम् अनन्तरकरणीयम् =, अग्रे यद् विधेयं तदार्यः आदिशतु ।
सूत्रधारः—आर्ये ! अस्याः = प्रस्तुताः परिषदः = सभायाः, सामाजिकानां श्रुतिप्रमोदहेतोः = श्रुत्योः = कर्णयोः प्रमोदः तस्य हेतुः कारणमिति श्रुतिप्रमोदहेतुः तस्मात् श्रुतिप्रमोदहेतोः = कर्णानन्ददायिनः, गीतात् = गायनात् अन्यत् = अतिरिक्तं, किं=करणीयमस्ति न किमपि करणीयमस्तीति भावः ।
विद्वानों को जबतक सन्तोष न हो जाय, तबतक मैं अभिनय के प्रयोग की कुशलता ठीक नहीं समझता, क्योंकि सुशिक्षित पात्रों के भी चित्त में अपने विषय में सन्देह ही बना रहता है ॥ २ ॥
विशेष—विद्वानों के सन्तोष को अभिनय की कसौटी माना गया है । यों तो अपना काम सभी को अच्छा लगता है तथा प्रत्येक व्यक्ति अपने को योग्य समझता है । जब तक कार्य समुचित रूप से सम्पन्न न हो जाय, तब तक आत्मविश्वास नहीं होता ।
नटी—( नम्रतापूर्वक ) आर्य ! आप बिलकुल ठीक कहते हैं । अब आज्ञा दीजिए कि अब इसके बाद मुझे क्या करना चाहिए ।
सूत्रधार—प्रिये ! इस सभा के अनुरञ्जन=मनोविनोद के लिये श्रुतिमधुर गीत से बढ़कर इस समय क्या कार्य हो सकता है ? अतः तुम कोई मधुर गाना गाओ ।
पाठा०—१. एवमिदम्, एवमेव तत्, एवमेतत् । २. किमन्यदस्याः परिषदः श्रुतिप्रसादनतः ।
प्रथमोऽङ्कः
९
**नटी—**अध कदमं उण उदुं अधिकरिअ गायिस्सम्। [ अथ कतमं पुनऋतुंम- धिकृत्य गास्यामि । ]
**सूत्रधारः—**नन्विममेव¹ तावदचिरप्रवृत्तमुपभोगक्षमं ग्रीष्मसमयमधिकृत्य² गीयताम्। संप्रति हि—
सुभगसलिलावगाहाः ³पाटलसंसर्गसुरभिवनवाताः।
प्रच्छायसुलभनिद्रा दिवसाः परिणामरमणीयाः ॥ ३ ॥
**नटी—**अथ = अधुना कतमं = कम्, ऋतुं = समयम्, अधिकृत्य = विषयीकृत्य गास्यामि = गायामि। वसन्तादीनां षण्णामृतूनां मध्ये कतममृतुमधिकृत्य मया गानमाच- रणीयमिति प्रश्नस्याशयः।
**सूत्रधारः—**इममेव अचिरप्रवृत्तं = इदानीमेव प्रादुर्भूतममुम्, उपभोगक्षमं = उपभोगाय • चन्दनाद्युपभोगाय क्षमं = समर्थं ग्रीष्मस्य समयं = कालम् अधिकृत्य विषयीकृत्य, गीय- ताम् = गानं क्रियताम्। साम्प्रतं = इदानीं ग्रीष्मे, हि = यस्मात्।
**अन्वयः—**दिवसाः सुभगसलिलावगाहाः पाटलसंसर्गसुरभिवनवाताः प्रच्छायसुलभ- निद्राः परिणामरमणीयाः।
सुभग इति। दिवसाः = दिनानि सुभगसलिलावगाहाः—सुभगः = ग्रीष्मसन्तापनिवर्त- कत्वेन मनोहरः सलिले = जले अवगाहः = स्नानं जलक्रीडा येषु ते सुभगसलिलावगाहाः पाटलस्य = पाटलिपुष्पस्य संसर्गेण = सम्बन्धेन सुरभयः सुगन्धपूर्णाः वनस्य विपिनस्य वाता वायवः येषु ते पाटलसंसर्गसुरभिवनवाताः प्रच्छायसुलभनिद्राः प्रकृष्टा छाया येषु ते प्रच्छायाः प्रच्छायाेषु घनच्छायायुक्तेषु स्थानेषु सुलभा सुखप्राप्या निद्रा येषु ते प्रच्छाय- सुलभनिद्राः परिणामरमणीयाः—परिणामे = अन्ते, दिवसावसाने सायंकाले रमणीयाः =
**नटी—**तो किस ऋतु के अनुरूप गीत गाऊँ !
**विशेष—**नाटक में कथोपकथन की शृङ्खला स्थिर रखने तथा वक्ता के वक्तव्य को बोझिल न होने देने के निमित्त छोटे-छोटे वाक्यों में बातें कही गयी हैं। नटी अपने मनसे गीत भी नहीं चुन रही है, क्योंकि सूत्रधार की इच्छा के अनुसार ही सब कार्य होने चाहिए।
**सूत्रधार—**प्रिये ! अभी थोड़े ही समय से प्रवृत्त हुए उपभोग क्षम इस ग्रीष्म ऋतु के प्रसंग में तुम कोई गीत गाओ, क्योंकि ग्रीष्म काल बड़ा ही सुहावना होता है। इस समय तो—
सुन्दर-सुन्दर जलाशयों में स्नान एवं जलक्रीड़ा करने में बड़ा ही आनन्द आता है। वन एवं उपवनों में गुलाब आदि अच्छे-अच्छे फूलों के संसर्ग से सुरभित पवन बहता है। और दोपहर के समय कुञ्जों की ठण्डी ठण्डी छाया में नींद भी अच्छी लगती है ॥ ३ ॥
**विशेष—**ग्रीष्म ऋतु के समय स्नान, जल क्रीड़ा, सुरभित वायु दोपहर के समय शीतल छाया में आई नींद और सन्ध्याकाल की रमणीयता का विशेष महत्व है। इस पद्य में इन सभी का एक ही साथ वर्णन कर कवि ने एक उत्तम भाव व्यक्त किया है।
इससे प्रतीत होता है कि नाटक का अभिनय गर्मी में हुआ था। गर्मी में प्रकृति का सेवन पूर्ण- रूप से होता है। लोग सुबह साम शीतल हवा का सेवन करते हैं। नदियों में तैरते हैं, चाँदनी रातों में भ्रमणकर आनन्द लूटते हैं इस प्रकार प्रत्येक ऋतु का अपना-अपना विशेष महत्व होता है।
पाठा०—१. तमिममेव। २. आश्रित्य। ३. पाटलि।
१० | अभिज्ञानशाकुन्तलम्
नटी—तहं । [ तथा ] ( ^१ गायति )
ईसीसिचुम्बिआईं भमरेहिं सुउमारकेसरसिहाई ।
ओदंसयन्ति दअमाणा पमदाओ सिरिषकुसुमाई ॥ ४ ॥
[ ^२ ईषद्वीषच्चुम्बितानि भ्रमरैः सुकुमारकेसरशिखानि ।
अवतंसयन्ति दयमानाः प्रमदाः शिरीषकुसुमानि ॥ ४ ॥ ]
सूत्रधारः—आर्ये ! साधुगीतम् । अहो ^३ रागबद्धचित्तवृत्तिरालिखित इव सर्वतो रङ्गः । तदिदानीं ^४ कतमत् प्रकरणमाश्रित्यैनमाराधयामः ।
कमनीयाः परिणामरमणीयाः = सायंकालशोभनाः भवन्ति । अत्र शृङ्गार-परिकर-स्वभावोक्त्यलङ्काराः आर्यावृत्तञ्च ॥ ३ ॥
नटी—तथा गायति = आज्ञापयत्यार्यस्तथैवानुतिष्ठामि इत्यभिधाय गायति = गानं गानं करोति, ईषदिति ।
अन्वयः—दयमानाः प्रमदाः भ्रमरैः ईषद्वीषत् चुम्बितानि सुकुमारकेसरशिखानि शिरीषकुसुमानि, अवतंसयन्ति ।
ईषद्विति—दयमाना दयन्ते इति दयमानाः = ग्लानिशङ्कया दयां कुर्वन्त्यः प्रमदाः-प्रकृष्टो मदो रूपसौभाग्यजनितो गर्वो यासां ताः प्रमदाः = वराङ्गनाः कामिन्यो युवतयः, भ्रमरैः = रोलम्बैः—ईषद्वीषद् = अल्पालपं, शनैः शनैः सरभसोपक्रममन्तरा चुम्बितानि = स्पृष्टानि, आस्वादितानि सुकुमारकेशरशिखानि-सुकुमाराः = मृदवः केशराणां = किंजल्कानां शिखा = अग्रभागः येषां तानि सुकुमारकेशरशिखानि शिरीषकुसुमानि-शिरीषस्य कुसुमानि शिरीषकुसुमानि शिरीषसुमनानि अवतंसयन्ति = कर्णभूषणे कुर्वन्ति । अत्र परिकरकाव्यालङ्कारौ, आर्याच्छन्दश्च ॥ ४ ॥
सूत्रधारः—आर्ये ! साधु = मधुरं लयतालादिललितं यथा स्यात् तथा गीतं = गानं
नटी—ठीक है : ( गाती है )
जिनपर गुनगुन करते हुए भौंरे रसपान कर रहे हैं और जिनकी पतली पंखुड़ियों के अग्रभाग बड़े ही सुकुमार हैं ऐसे इन कोमल शिरीष पुष्पों को दयालु स्त्रियां अपनी छोटी-छोटी अंगुलियों से पकड़कर शनैः शनैः अलंकार रूप से अपने शरीरों पर धारण कर रही है ॥ ४ ॥
विशेष—कविवर कालिदास ने अपने काव्यों में शिरीष पुष्प को अत्यन्त कोमल कहा है कुमारसंभव में वे कहते हैं कि शिरीषपुष्प भौरों के पैर सह सकता है ! किन्तु पक्षियों के नहीं 'पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीषपुष्पं न पुनः पतत्त्रिण' । शिरीष पुष्प अत्यन्त कोमल पंखुड़ियों वाला कर्णभूषण जैसा होता है । अतः उसका वर्णन कर्णभूषण के लिये उपयुक्त ही है ।
शिरीष पुष्पों पर दया करने का अभिप्राय यह है कि भौरों ने पहले ही इसे थोड़ा-थोड़ा चूस लिया है सहसा स्पर्श करने पर शायद यह बिखर न जाय । इससे शकुन्तला का दुष्यन्त से प्रेम संकेत भी कवि ने माना है—शकुन्तला, भ्रमर और अप्सरा की पूर्व सूचना के निमित्त क्रमशः यहाँ शिरीष, भ्रमर और प्रमदा शब्द प्रयुक्त हैं । ईषद ईषद् दो बार प्रयुक्त होने से शिरीषपुष्पों की अत्यन्त कोमलता व्यक्त होती है । युवतियां शिरीष पुष्पों को तोड़कर अपने कानों का आभूषण बनाती है, किन्तु उन्हें तोड़ना नहीं चाहती, उन्हें तोड़ने में दया आती है ।
सूत्रधार--वाह वाह आर्ये ! तुमने बड़ा ही सुन्दर गीत गाया । तुम्हारे राग-रागिणी युक्त इस
पाठा०-१. इति गायति । २. क्षणं चुम्बितानि । ३. रागापहृत, रागनिविष्ट । ४. कतमं प्रयोगम् ।
प्रथमोऽङ्कः ११
नटी—णं अज्जमिस्सेहिं पढमं एव्व आणत्तं अहिण्णाणसाउन्दलं णाम अपुव्वं णाडअं पओए अधिकरीअदुत्ति । [ नन्वार्यमिश्रैः प्रथममेवाज्ञप्तमभिज्ञानशाकुन्तलं नामापूर्वं नाटकं प्रयोगेऽधिक्रियतामिति । ]
सूत्रधारः—आर्ये सम्यगनुबोधितोऽस्मि । अस्मिन् क्षणे विस्मृतं खलु मया । कुतः—
श्रावितम् । अहो = इत्याश्चर्यो रागबद्धचित्तवृत्तिः—रागेण = गीतरागेण बद्धा = आर्वाजिता चित्तस्य = मनसः वृत्तिः = व्यापारो यस्य सः रागबद्धचित्तवृत्तिः, आलिखितः = चित्रित इव निश्चेष्टः इव सर्वतः = सर्वासु दिक्षु, रङ्गः = रङ्गवासी जनः, तत् = तस्मात् कतमं = कीदृशप्रयोगः = प्रयुज्यते इति प्रयोगः = नाट्यगतं प्रयोगमाश्रित्य एनं = रङ्ग स्थितं लोकम् आराधयामः = अनुरञ्जयामः ।
नटी—आर्यमिश्रैः = पूज्यैर्भवद्भिः, प्रथममेव = पूर्वमेव आज्ञप्तं = आदिष्टं, यत् अपूर्वं = अभिनवम् अभिज्ञानशाकुन्तलं नाम नाटकम् प्रयोगे = अभिनये अभिनीयताम् = उपस्थाप्यताम् ।
सूत्रधारः—आर्ये ! = देवि ! सम्यक् = सुष्ठु अनुबोधितः = स्मारितः, अस्मि = अहम् अस्मिन् = एतस्मिन् क्षणे = काले विस्मृतं खलु = निश्चयेन मया = सूत्रधारेण । कुतः = यतः ।
मनोहर गीत से आकृष्टचित्त होकर यह रङ्गस्थलवर्ती दर्शक समाज चित्रलिखित सा निस्तब्ध प्रतीत हो रहा हैं । अच्छा, तो बताओ, अब इस विद्वत्समाज के सामने कौन से नाटक का प्रयोग (खेल दिखाकर इसे अनुरञ्जित) करूँ !
विशेष—सूत्रधार कह चुका है कि कविवर कालिदास द्वारा रचित अभिनव नाटक खेलना है । यहां पुनः नटी से पूछता है किस प्रयोग से रङ्गशालावर्ती पुरुषों का मनोरञ्जन करूँ । इससे मालूम पड़ता है कि नटी के मधुर गान से सुध-बुध खोकर सूत्रधार प्रसंग ही भूल गया । और सूत्रधार ने रंगस्थलवर्ती लीगों को चित्रलिखित के समान स्थिर बताया । वस्तुतः मनोमोहक गीत का ऐसा ही प्रभाव होता है, जिससे चित्तवृत्तियाँ एकाग्र हो जाती हैं । वस्तुतः विद्वानों ने स्वरवर्ण से विभूषित ध्वनिविशेषको मनुष्यों के चित्तों का रञ्जक राग बताया है—
योऽसौ ध्वनिविशेषस्तु स्वरवर्णविभूषितः ।
रञ्जको जनचित्तानां स रागः कथितो बुधैः ॥
नटी—अभी कुछ समय पहले आपने आज्ञा दी है कि हमलोगों को आज अपूर्व अभिज्ञान-शाकुन्तल नामक नाटक का अभिनय करना है ।
विशेष—यहां ननु शब्द से स्मरण दिलाया गया है । आर्यमिश्र शब्द सम्मानसूचक है । इसलिए इसमें बहुवचन का प्रयोग किया जाता है । कहा भी है—एकत्वं न प्रयुञ्जीत गुरावात्मनि चेश्वरे । अपने, श्रेष्ठपुरुष और गुरु के विषय में प्रायः बहुवचन का ही प्रयोग करना चाहिए ।
सूत्रधार—प्यारी, तुमने अच्छी सुधि दिलायी, इस समय मैं तो भूल ही गया था, क्योंकि—
१२ अभिज्ञानशाकुन्तलम्
तवास्मि गीतरागेण हारिणा प्रसभं हृतः। एष राजेव दुष्यन्तः सारङ्गेणातिरंहसा ॥ ५ ॥ ( इति निष्क्रान्तौ ) इति प्रस्तावना ।
अन्वयः—हारिणा तव गीतरागेण अतिरंहसा सारङ्गेण एष राजा दुष्यन्तः इव प्रसभं हृतः अस्मि।
तवास्मीति। हारिणा—मनोहरेण, तव = भवत्याः गीतरागेण = गीतस्य = गानस्य रागेण गीतरागेण = गानरागेण अतिरंहसा = अतिवेगवता सारङ्गेण = चित्राङ्गेन हरिणेन एषः = पुरोदृश्यमानः राजा = नृपो दुष्यन्त इव = यथा प्रसभं = बलात् हृतः = विषयान्तर-मानीतः अपहृतचित्तवृत्तिः जातः अस्मि। यथा राजा दुष्यन्तोऽतिवेगवता मृगेणाकृष्टः
तुम्हारे इस मनोहर गीत के राग से सहसा मुग्ध होकर मैं उस प्रकार भूल गया था जैसे अति-वेगवान् हरिण उस राजा दुष्यन्त को दूर खींच ले गया है ॥ ५ ॥
( ऐसा कहकर दोनों बाहर चले जाते हैं )। यह इस नाटक की प्रस्तावना हुई।
विशेष—सूत्रधार के कहने का तात्पर्य है कि तुम्हारे संगीत जादू ने मुझे इस प्रकार अपनी ओर खींच लिया कि मैं अपने को भी भूल गया जिस प्रकार वेगशाली हरिण राजा दुष्यन्त की उसकी सेना से दूर भगा ले गया।
सूत्रधार के साथ नटी या विदूषक आदि पात्र इधर-उधर की बातें करते हुए जहाँ किसी प्रकृत विषय की सूचना दें उसे आमुख कहते हैं। इसी का नाम नाटक में प्रस्तावना है—
नटी विदूषको वापि पारिपार्श्वक एव वा।
सूत्रधारेण सहिताः संलापं यत्र कुर्वते॥
चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः।
आमुखं तत्तु विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनापि सा ॥ ( साहित्यदर्पण )
दशरूपक में आमुख = प्रस्तावना का लक्षण यह लिखा हुआ है कि—
सूत्रधारो नटीमार्यं ब्रूते वापि विदूषकम्।
स्वकार्ये प्रस्तुताक्षेपि चित्रोक्त्या यत्तदामुखम् ॥
साहित्यदर्पण के अनुसार प्रस्तावना के पाँच भेद माने गये हैं—( १ ) उद्घातक ( २ ) कथो-द्घात ( ३ ) प्रयोगातिशय ( ४ ) प्रवर्तक तथा ( ५ ) अवगलितं इनमें यहां अवगलितं नाम की प्रस्तावना है, जिसका लक्षण निम्नाङ्कित है—
उद्घातकः कथोद्घातः प्रयोगातिशयस्तथा।
प्रवर्तकावगलिते पञ्चप्रस्तावनाभिदः ॥
यत्रैकत्र समावेशात् कार्यमन्यत् प्रसाध्यते।
प्रयोगे खलु तज्ज्ञेयं नाम्नावगलितं बुधैः ॥
किन्तु दशरूपक में धनिक के अनुसार जहाँ सूत्रधार 'एषोऽयम्' यह कहकर किसी पात्र का प्रवेश कराता है, वह प्रयोगातिशय नाम की प्रस्तावना है। तदनुसार यहाँ 'एष राजेव दुष्यन्तः' कहकर राजा का प्रवेश कराया गया है। अतः यहां प्रयोगातिशय नामक प्रस्तावना है। जैसे—
एषोऽयमित्युपक्षेपात् सूत्रधारप्रयोगतः।
पात्रप्रवेशो येनैष प्रयोगातिशयो मतः ॥
प्रथमोऽङ्कः १३
( ततः प्रविशति रथाधिरूढः सशरचापहस्तो मृगमनुसरन् राजा सूतश्च¹ )
सूतः—( राजानं मृगं चावलोक्य ) आयुष्मन् !
कृष्णसारे ददच्चक्षुस्त्वयि चाधिज्यकार्मुके ।
मृगानुसारिणं साक्षात् पश्यामीव पिनाकिनम् ॥ ६ ॥
एतावतीं भूमिमायातः तथैवाहमपि मनोहारिणा ताललयरागवता गीतेन अपहृतचित्तवृत्तिः अवधारितमपि नाटकं विस्मृतवानस्मीति भावः। निष्क्रान्तौ=रङ्गमञ्चाद् बहिर्गतौ इति = समाप्ता प्रस्तावना = आमुखम्। अत्र श्रौती उपमा, काव्यलिङ्गं च वृत्तं चानुष्टुबेव ॥ ५ ॥
तत इति । ततः = सूतनिर्गमनान्तरं प्रस्तावनाया अन्ते वा प्रविशति = रङ्गमञ्चे दृश्यते, रथाधिरूढः = रथे उपविष्टः, सशरचापहस्तः—शरेण बाणेन चापेन = धनुषा च सहितौ हस्तौ = करौ यस्य स सशरचापहस्तः = धनुर्बाणपाणिः मृगं = हरिणं, अनुसरन् = राजा = नृपतिः दुष्यन्तः, भरतपुत्रः सूतश्च । उभौ = सारथिश्च रङ्गे प्रविशत इत्यर्थः ।
**सूतः—**सूतः = सारथिः, राजानं = दुष्यन्तं मृगं हरिणं च अवलोक्य = दृष्ट्वा ब्रूते—आयुष्मन् = महाराज ! ।
**अन्वयः—**कृष्णसारे अधिज्यकार्मुके त्वयि च चक्षुः ददत् ( अहम् ) मृगानुसारिणं साक्षात् पिनाकिनं ( त्वां ) पश्यामि इव ।
कृष्णसारे इति । पुरो धावमाने कृष्णसारे = चित्राङ्गे हरिणे ज्यामधिगतमधिज्यम् अधिज्यं कार्मुकं = धनुर्यस्य स अधिज्यकार्मुकः तस्मिन् आधिज्यकार्मुके=अध्यारोपितधनुषि
एष पद के द्वारा अंगुलि से दिखाया गया है कि दुष्यन्त आदि सज्जाकक्ष से निकलकर अब रंगभूमि में पधार ही रहे हैं।
( प्रस्तावना के अनन्तर रथ पर बैठकर धनुर्बाण हाथ में लिए मृग का अनुसरण करते हुए राजा दुष्यन्त और सारथि का रंगमंच पर प्रवेश होता है। )
सारथी—( राजा तथा मृग की ओर देखकर ) आयुष्मन् !
इस कालेमृग को और चढ़े हुए धनुष को धारण किये हुए आपको देखकर मुझे यज्ञरूप मृग का पीछा करते हुए पिनाकपाणि भगवान् शङ्कर का स्मरण हो आता है। अर्थात् धनुषबाण हाथ में लेकर मृग का पीछा करते हुए आप मुझे साक्षात् शिव के समान मालूम पड़ रहे हैं ॥ ६ ॥
**विशेष—**भगवान् शिव का नाम यहां पिनाकी कहा गया है। जिसका तात्पर्य यह है कि महापुरुषों के शंख, वीणा और धनुष का विशेष नाम देखा जाता है। जैसे भगवान् विष्णु के धनुष का शार्ङ्ग, अर्जुन के धनुष का नाम गाण्डीव है और नारदजी की वीणा का नाम महती एवं सरस्वती की वीणा का नाम कच्छपी है। इसी प्रकार भगवान् शिव के धनुष का नाम पिनाक है।
साधारण राजकर्मचारी राजा की चाटुकारिता का अवसर देखा करते हैं। यहाँ सारथि राजा की प्रशंसा करते हुए कह रहा है कि आप रुद्र के समान भीषण हैं और आपका धनुष पिनाक के समान लक्ष्यसाधक है। इस उपमा से उस कथा का स्मरण हो जाता है, जिसके अनुसार भगवान् शिवजी ने मृग का रूप धारण कर भय से भागते हुए यज्ञपुरुष का पीछा किया था अथवा पाशुपतास्त्र की प्राप्ति के लिए इन्द्रकील पर्वत पर भगवान् शिव की तपस्या करने वाले अर्जुन के साथ मृग = वाराह का पीछा किरातरूपधारी महादेव ने किया था।
महाभारत के सौप्तिक पर्व में यह कथा आती है कि एक बार शिवजी के श्वसुर दक्ष प्रजापति ने
पाठा०—१. ततः प्रविशति मृगानुसारी सशरचापहस्तो राजा रथेन सूतश्च ।
१४ अभिज्ञानशाकुन्तलम्
राजा—दूरममुना सारङ्गेण वयमाकृष्टाः¹। अयं² पुनरिदानीमपि—
ग्रीवाभङ्गाभिरामं मुहुरनुपतति स्यन्दने बद्धदृष्टिः
पश्चार्धेन प्रविष्टः शरपतनभयाद् भूयसा पूर्वकायम्।
दर्भैरर्धावलीढैः श्रमविवृतमुखभ्रंशिभिः कीर्णवर्त्मा
पश्योदग्रप्लुतत्वाद्वियति बहुतरं स्तोकमुर्व्यां प्रयाति ॥ ७ ॥
त्वयि = भवति च चक्षुः = लोचनं ददत् = निक्षिपन् अहं मृगानुसारिणं—मृगमनुसरति तच्छीलो मृगानुसारी तं मृगानुसारिणं = मृगरूपधरं दक्षप्रजापतियज्ञम् अनुसरन्तं साक्षात् पिनाकिनमिव = साक्षाद् धनुष्पाणि भगवन्तं सदाशिवमिव पश्यामि = विभावयामि, तर्कं. यामि इव, इति प्रतीयते दक्षप्रजापतियज्ञविध्वंसवेलायां सतीदाहेन क्रुद्धं पिनाकपाणिं भगवन्तं शिवमवलोक्य यज्ञो मृगरूपमास्थाय पलायाञ्चक्रे । तञ्च महता वेगेन सदा-शिवोऽनुससारेति पौराणिकी कथाऽत्रानुसन्धेया । अत्र विशेषालङ्कारो नोत्प्रेक्षा नवोपमा, अनुष्टुप् छन्दश्च ।
राजा—राजा = नृपो दुष्यन्तः कथयति—सारथे ! अमुना = पुरो धावमानेन अनेन सारङ्गेण = कृष्णमृगेण वयम् दूरं = दूरस्थानम् आकृष्टा = आकृष्य नीताः । अयं = असौ पुनः = तु इदानीम् = अधुनापि ।
अन्वयः— ( पश्य अयं पुनरिदानीमपि ) अनुपतति स्यन्दने मुहुः ग्रीवाभङ्गाभिरामं बद्धदृष्टिः ( सन् ) शरपतनभयात् भूयसा पश्चार्द्धेन पूर्वकायं प्रविष्टः ( सन् ) अर्धावलीढैः श्रमविवृतमुखभ्रंशिभिः दर्भैः कीर्णवर्त्मा ( सन् ) उदग्रप्लुतत्वात् वियति बहुतरम् उर्व्यां ( च ) स्तोकं प्रयाति ।
ग्रीवा इति । पश्य= अवलोकय अयं पुरो दृश्यमानः मृगः अनुपतति= स्वस्य पृष्ठे धावति स्यन्दने = अस्माकं रथे मुहुः = पुनः पुनः ग्रीवाभङ्गाभिरामं—ग्रीवायाः = कन्धरायाः भङ्गेन वलितेन अभिरामं = कमनीयम्, यथास्यात्तथा बद्धा = एकाग्रीकृता दृष्टिः = चक्षुः
यज्ञ किया, किन्तु वे ब्रह्मसभा में अपना अभ्युत्थान न करने से शिवजी पर क्रुद्ध थे । अतः उन्होंने अपने उस यज्ञ में न तो शिवजी को आमन्त्रित किया, न उनका भाग ही निकाला । यह देखकर दक्ष की पुत्री सती ने अपने पति के अपमान से दुःखित होकर यज्ञाग्नि से अपने शरीर को भस्म कर दिया । यह सुनकर शिवजी को अत्यन्त क्रोध हो आया । फलतः शिवजी ने यज्ञ का विध्वंस करना प्रारम्भ कर दिया, यज्ञ हरिण का रूपधारण कर भाग चला । शिवजी ने अपना पिनाक नामक धनुष लेकर उसका पीछा किया ।
राजा-- हे सारथे ! यह मृग हम लोगों को बहुत दूर खींच लाया है, फिर भी तो देखो—
यह हमारे रथ की ओर गर्दन घुमा-घुमाकर मनोहरतापूर्वक देखता हुआ बाण लगने की आशंका से अपने पीछे के भाग = पीठ को शरीर के पूर्वभाग = गर्दन की ओर समेट कर आधे चबाये हुए कुश के ग्रासों को परिश्रम के कारण खुले हुए अपने मुख से मार्ग में गिराता हुआ आकाश में छलांग मारता हुआ दौड़ ही रहा है । जमीन पर तो इसके पैर कभी-कभी पड़ते हैं ॥ ७ ॥
विशेष— यह पद्य बड़े सूक्ष्मनिरीक्षण से प्रस्तुत किया गया है । इसके प्रत्येक चरण में हरिण का एक स्वरूप व्यक्त किया गया है । विशेषरूप से दूसरे चरण में कही गई शरीर के सिकोड़ने की
पाठा०—सूत ! दूरममुना सारङ्गेण वयमाकृष्टाः । ३. सोऽयमिदानीमपि ।