भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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१४ अभिज्ञानशाकुन्तलम्

राजा—दूरममुना सारङ्गेण वयमाकृष्टाः¹। अयं² पुनरिदानीमपि—

ग्रीवाभङ्गाभिरामं मुहुरनुपतति स्यन्दने बद्धदृष्टिः
पश्चार्धेन प्रविष्टः शरपतनभयाद् भूयसा पूर्वकायम्।
दर्भैरर्धावलीढैः श्रमविवृतमुखभ्रंशिभिः कीर्णवर्त्मा
पश्योदग्रप्लुतत्वाद्वियति बहुतरं स्तोकमुर्व्यां प्रयाति ॥ ७ ॥

त्वयि = भवति च चक्षुः = लोचनं ददत् = निक्षिपन् अहं मृगानुसारिणं—मृगमनुसरति तच्छीलो मृगानुसारी तं मृगानुसारिणं = मृगरूपधरं दक्षप्रजापतियज्ञम् अनुसरन्तं साक्षात् पिनाकिनमिव = साक्षाद् धनुष्पाणि भगवन्तं सदाशिवमिव पश्यामि = विभावयामि, तर्कं. यामि इव, इति प्रतीयते दक्षप्रजापतियज्ञविध्वंसवेलायां सतीदाहेन क्रुद्धं पिनाकपाणिं भगवन्तं शिवमवलोक्य यज्ञो मृगरूपमास्थाय पलायाञ्चक्रे । तञ्च महता वेगेन सदा-शिवोऽनुससारेति पौराणिकी कथाऽत्रानुसन्धेया । अत्र विशेषालङ्कारो नोत्प्रेक्षा नवोपमा, अनुष्टुप् छन्दश्च ।

राजा—राजा = नृपो दुष्यन्तः कथयति—सारथे ! अमुना = पुरो धावमानेन अनेन सारङ्गेण = कृष्णमृगेण वयम् दूरं = दूरस्थानम् आकृष्टा = आकृष्य नीताः । अयं = असौ पुनः = तु इदानीम् = अधुनापि ।

अन्वयः— ( पश्य अयं पुनरिदानीमपि ) अनुपतति स्यन्दने मुहुः ग्रीवाभङ्गाभिरामं बद्धदृष्टिः ( सन् ) शरपतनभयात् भूयसा पश्चार्द्धेन पूर्वकायं प्रविष्टः ( सन् ) अर्धावलीढैः श्रमविवृतमुखभ्रंशिभिः दर्भैः कीर्णवर्त्मा ( सन् ) उदग्रप्लुतत्वात् वियति बहुतरम् उर्व्यां ( च ) स्तोकं प्रयाति ।

ग्रीवा इति । पश्य= अवलोकय अयं पुरो दृश्यमानः मृगः अनुपतति= स्वस्य पृष्ठे धावति स्यन्दने = अस्माकं रथे मुहुः = पुनः पुनः ग्रीवाभङ्गाभिरामं—ग्रीवायाः = कन्धरायाः भङ्गेन वलितेन अभिरामं = कमनीयम्, यथास्यात्तथा बद्धा = एकाग्रीकृता दृष्टिः = चक्षुः

यज्ञ किया, किन्तु वे ब्रह्मसभा में अपना अभ्युत्थान न करने से शिवजी पर क्रुद्ध थे । अतः उन्होंने अपने उस यज्ञ में न तो शिवजी को आमन्त्रित किया, न उनका भाग ही निकाला । यह देखकर दक्ष की पुत्री सती ने अपने पति के अपमान से दुःखित होकर यज्ञाग्नि से अपने शरीर को भस्म कर दिया । यह सुनकर शिवजी को अत्यन्त क्रोध हो आया । फलतः शिवजी ने यज्ञ का विध्वंस करना प्रारम्भ कर दिया, यज्ञ हरिण का रूपधारण कर भाग चला । शिवजी ने अपना पिनाक नामक धनुष लेकर उसका पीछा किया ।

राजा-- हे सारथे ! यह मृग हम लोगों को बहुत दूर खींच लाया है, फिर भी तो देखो—

यह हमारे रथ की ओर गर्दन घुमा-घुमाकर मनोहरतापूर्वक देखता हुआ बाण लगने की आशंका से अपने पीछे के भाग = पीठ को शरीर के पूर्वभाग = गर्दन की ओर समेट कर आधे चबाये हुए कुश के ग्रासों को परिश्रम के कारण खुले हुए अपने मुख से मार्ग में गिराता हुआ आकाश में छलांग मारता हुआ दौड़ ही रहा है । जमीन पर तो इसके पैर कभी-कभी पड़ते हैं ॥ ७ ॥

विशेष— यह पद्य बड़े सूक्ष्मनिरीक्षण से प्रस्तुत किया गया है । इसके प्रत्येक चरण में हरिण का एक स्वरूप व्यक्त किया गया है । विशेषरूप से दूसरे चरण में कही गई शरीर के सिकोड़ने की

पाठा०—सूत ! दूरममुना सारङ्गेण वयमाकृष्टाः । ३. सोऽयमिदानीमपि ।