अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः १३
( ततः प्रविशति रथाधिरूढः सशरचापहस्तो मृगमनुसरन् राजा सूतश्च¹ )
सूतः—( राजानं मृगं चावलोक्य ) आयुष्मन् !
कृष्णसारे ददच्चक्षुस्त्वयि चाधिज्यकार्मुके ।
मृगानुसारिणं साक्षात् पश्यामीव पिनाकिनम् ॥ ६ ॥
एतावतीं भूमिमायातः तथैवाहमपि मनोहारिणा ताललयरागवता गीतेन अपहृतचित्तवृत्तिः अवधारितमपि नाटकं विस्मृतवानस्मीति भावः। निष्क्रान्तौ=रङ्गमञ्चाद् बहिर्गतौ इति = समाप्ता प्रस्तावना = आमुखम्। अत्र श्रौती उपमा, काव्यलिङ्गं च वृत्तं चानुष्टुबेव ॥ ५ ॥
तत इति । ततः = सूतनिर्गमनान्तरं प्रस्तावनाया अन्ते वा प्रविशति = रङ्गमञ्चे दृश्यते, रथाधिरूढः = रथे उपविष्टः, सशरचापहस्तः—शरेण बाणेन चापेन = धनुषा च सहितौ हस्तौ = करौ यस्य स सशरचापहस्तः = धनुर्बाणपाणिः मृगं = हरिणं, अनुसरन् = राजा = नृपतिः दुष्यन्तः, भरतपुत्रः सूतश्च । उभौ = सारथिश्च रङ्गे प्रविशत इत्यर्थः ।
**सूतः—**सूतः = सारथिः, राजानं = दुष्यन्तं मृगं हरिणं च अवलोक्य = दृष्ट्वा ब्रूते—आयुष्मन् = महाराज ! ।
**अन्वयः—**कृष्णसारे अधिज्यकार्मुके त्वयि च चक्षुः ददत् ( अहम् ) मृगानुसारिणं साक्षात् पिनाकिनं ( त्वां ) पश्यामि इव ।
कृष्णसारे इति । पुरो धावमाने कृष्णसारे = चित्राङ्गे हरिणे ज्यामधिगतमधिज्यम् अधिज्यं कार्मुकं = धनुर्यस्य स अधिज्यकार्मुकः तस्मिन् आधिज्यकार्मुके=अध्यारोपितधनुषि
एष पद के द्वारा अंगुलि से दिखाया गया है कि दुष्यन्त आदि सज्जाकक्ष से निकलकर अब रंगभूमि में पधार ही रहे हैं।
( प्रस्तावना के अनन्तर रथ पर बैठकर धनुर्बाण हाथ में लिए मृग का अनुसरण करते हुए राजा दुष्यन्त और सारथि का रंगमंच पर प्रवेश होता है। )
सारथी—( राजा तथा मृग की ओर देखकर ) आयुष्मन् !
इस कालेमृग को और चढ़े हुए धनुष को धारण किये हुए आपको देखकर मुझे यज्ञरूप मृग का पीछा करते हुए पिनाकपाणि भगवान् शङ्कर का स्मरण हो आता है। अर्थात् धनुषबाण हाथ में लेकर मृग का पीछा करते हुए आप मुझे साक्षात् शिव के समान मालूम पड़ रहे हैं ॥ ६ ॥
**विशेष—**भगवान् शिव का नाम यहां पिनाकी कहा गया है। जिसका तात्पर्य यह है कि महापुरुषों के शंख, वीणा और धनुष का विशेष नाम देखा जाता है। जैसे भगवान् विष्णु के धनुष का शार्ङ्ग, अर्जुन के धनुष का नाम गाण्डीव है और नारदजी की वीणा का नाम महती एवं सरस्वती की वीणा का नाम कच्छपी है। इसी प्रकार भगवान् शिव के धनुष का नाम पिनाक है।
साधारण राजकर्मचारी राजा की चाटुकारिता का अवसर देखा करते हैं। यहाँ सारथि राजा की प्रशंसा करते हुए कह रहा है कि आप रुद्र के समान भीषण हैं और आपका धनुष पिनाक के समान लक्ष्यसाधक है। इस उपमा से उस कथा का स्मरण हो जाता है, जिसके अनुसार भगवान् शिवजी ने मृग का रूप धारण कर भय से भागते हुए यज्ञपुरुष का पीछा किया था अथवा पाशुपतास्त्र की प्राप्ति के लिए इन्द्रकील पर्वत पर भगवान् शिव की तपस्या करने वाले अर्जुन के साथ मृग = वाराह का पीछा किरातरूपधारी महादेव ने किया था।
महाभारत के सौप्तिक पर्व में यह कथा आती है कि एक बार शिवजी के श्वसुर दक्ष प्रजापति ने
पाठा०—१. ततः प्रविशति मृगानुसारी सशरचापहस्तो राजा रथेन सूतश्च ।