अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ अभिज्ञानशाकुन्तलम्
तवास्मि गीतरागेण हारिणा प्रसभं हृतः। एष राजेव दुष्यन्तः सारङ्गेणातिरंहसा ॥ ५ ॥ ( इति निष्क्रान्तौ ) इति प्रस्तावना ।
अन्वयः—हारिणा तव गीतरागेण अतिरंहसा सारङ्गेण एष राजा दुष्यन्तः इव प्रसभं हृतः अस्मि।
तवास्मीति। हारिणा—मनोहरेण, तव = भवत्याः गीतरागेण = गीतस्य = गानस्य रागेण गीतरागेण = गानरागेण अतिरंहसा = अतिवेगवता सारङ्गेण = चित्राङ्गेन हरिणेन एषः = पुरोदृश्यमानः राजा = नृपो दुष्यन्त इव = यथा प्रसभं = बलात् हृतः = विषयान्तर-मानीतः अपहृतचित्तवृत्तिः जातः अस्मि। यथा राजा दुष्यन्तोऽतिवेगवता मृगेणाकृष्टः
तुम्हारे इस मनोहर गीत के राग से सहसा मुग्ध होकर मैं उस प्रकार भूल गया था जैसे अति-वेगवान् हरिण उस राजा दुष्यन्त को दूर खींच ले गया है ॥ ५ ॥
( ऐसा कहकर दोनों बाहर चले जाते हैं )। यह इस नाटक की प्रस्तावना हुई।
विशेष—सूत्रधार के कहने का तात्पर्य है कि तुम्हारे संगीत जादू ने मुझे इस प्रकार अपनी ओर खींच लिया कि मैं अपने को भी भूल गया जिस प्रकार वेगशाली हरिण राजा दुष्यन्त की उसकी सेना से दूर भगा ले गया।
सूत्रधार के साथ नटी या विदूषक आदि पात्र इधर-उधर की बातें करते हुए जहाँ किसी प्रकृत विषय की सूचना दें उसे आमुख कहते हैं। इसी का नाम नाटक में प्रस्तावना है—
नटी विदूषको वापि पारिपार्श्वक एव वा।
सूत्रधारेण सहिताः संलापं यत्र कुर्वते॥
चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः।
आमुखं तत्तु विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनापि सा ॥ ( साहित्यदर्पण )
दशरूपक में आमुख = प्रस्तावना का लक्षण यह लिखा हुआ है कि—
सूत्रधारो नटीमार्यं ब्रूते वापि विदूषकम्।
स्वकार्ये प्रस्तुताक्षेपि चित्रोक्त्या यत्तदामुखम् ॥
साहित्यदर्पण के अनुसार प्रस्तावना के पाँच भेद माने गये हैं—( १ ) उद्घातक ( २ ) कथो-द्घात ( ३ ) प्रयोगातिशय ( ४ ) प्रवर्तक तथा ( ५ ) अवगलितं इनमें यहां अवगलितं नाम की प्रस्तावना है, जिसका लक्षण निम्नाङ्कित है—
उद्घातकः कथोद्घातः प्रयोगातिशयस्तथा।
प्रवर्तकावगलिते पञ्चप्रस्तावनाभिदः ॥
यत्रैकत्र समावेशात् कार्यमन्यत् प्रसाध्यते।
प्रयोगे खलु तज्ज्ञेयं नाम्नावगलितं बुधैः ॥
किन्तु दशरूपक में धनिक के अनुसार जहाँ सूत्रधार 'एषोऽयम्' यह कहकर किसी पात्र का प्रवेश कराता है, वह प्रयोगातिशय नाम की प्रस्तावना है। तदनुसार यहाँ 'एष राजेव दुष्यन्तः' कहकर राजा का प्रवेश कराया गया है। अतः यहां प्रयोगातिशय नामक प्रस्तावना है। जैसे—
एषोऽयमित्युपक्षेपात् सूत्रधारप्रयोगतः।
पात्रप्रवेशो येनैष प्रयोगातिशयो मतः ॥