अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७४ )
के निमित्त उनके पास चला जाता है। राजा दुष्यन्त एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लग जाते हैं। वहीं खेलते हुए शेर के बच्चे का दांत गिनते सर्वदमन को देखकर दुष्यन्त अपने मन में सोचते हैं यह किसका बालक है? जिसकी गोद में धूल धूसरित यह बालक खेलता होगा, वह व्यक्ति धन्य है। इतने में एक तापसी दूसरी से कहती है कि यह बालक बड़ा चपल हो गया है, शेर के बच्चे को तंग कर रहा है. कुटी में जाकर शकुन्त (खेलने के लिए बना हुआ मिट्टी का मयूर) ला। इस पर सर्वदमन कहता है कि मेरी माँ शकुन्तला कहाँ है? तब राजा दुष्यन्त तापसी से पूछ बैठते हैं कि यह किसका बालक है? इस पर वह कहती है—यह बालक पुरुवंश के एक राजर्षि का औरस पुत्र है। इस पर वे पुनः पूछते हैं कि उसका क्या नाम है? तब वह कहती है कि अपनी पत्नी का त्याग कर देने वाले का नाम कौन ले? इस पर दुष्यन्त पुनः अपने मन ही मन सोचते हैं कि यह सारी बातें तो मुझ में ही घटती हैं और इस बालक को देखकर मुझे औरस पुत्र के समान स्नेह भी हो रहा है। इतने में दूसरी तापसी मिट्टी का मयूर लेकर आ जाती है। उसे लेने के लिए जब बालक हाथ पसारता है तो उसमें चक्रवर्ती के चिह्न देखकर राजा और प्रसन्न हो जाते हैं। तबतक तापसी बोल बैठती है—हाय, जन्म के समय रक्षार्थ महर्षि द्वारा इसके हाथ में बँधा हुआ रक्षा-सूत्र कहाँ गिर गया? इस पर दुष्यन्त तत्काल जमीन से उठाकर कहते हैं कि यह है। इसपर वे आश्चर्य करने लगती हैं। तब दुष्यन्त पूछते हैं कि आप लोग क्यों आश्चर्य करती हैं? तब वे कहती हैं कि इस बालक के माता-पिता के अतिरिक्त अन्य के उठा लेने पर यह साँप बनकर काट लेता है। इतने में ही शकुन्तला वहाँ आ जाती है जिसे देखकर राजा दुष्यन्त उससे अपनी भूल पर क्षमा माँगने लगते हैं। तब तक मातलि आकर कहता है—राजन् ! कश्यपजी दर्शन देने के लिए तैयार बैठे हैं। कृपया आप अपनी पत्नी और पुत्र के साथ चलकर उनका दर्शन करें। तदनुसार वे सभी जाकर उनका दर्शन कर प्रणाम करते हैं। आशीर्वाद देते हुए महर्षि कहते हैं—दुष्यन्त ! मैंने पहले ही जान लिया था कि दुर्वासा के शापवश आपने कण्व पुत्री का त्याग कर दिया था। यह सर्वदमन जयन्त जैसा प्रतापी है और यह साध्वी शकुन्तला इन्द्राणी के समान सौभाग्यवती है इनके साथ राजधानी में जाकर सुखपूर्वक रहो। इन्द्र तुम्हारे राज्य में प्रचुर वृष्टि करें और तुम प्रजाओं का पालन करो। इसके अनन्तर राजा दुष्यन्त सपत्नीक कश्यपजी को प्रणाम कर अपनी राजधानी में आकर सर्वदमन को युवराज बना देते हैं और उसका नाम भरत रख देते हैं। बाद इसी के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।
इस प्रकार शकुन्तला की मातृस्थानीया वृद्धा गौतमी, शेर के बच्चे को उसकी माता के पास से उसके दांत गिनने वाला निर्भीक शिशु सर्वदमन मालिक की मर्जी देखकर चलने वाला सेनापति, गरीब किन्तु अपनी जाति का स्वाभिमानी शक्रतीर्थ निवासी जालोपजीवी धीवर, सिद्ध साधक बनकर अपराधी पर अत्याचार करने का विचार करने वाले परन्तु उसके पास पुरस्कार के पैसे देखते ही मद्य की आशा से क्षणभर में बदल जाने वाले पुलिस के सिपाही और उनका अफसर राजा का साला, नगर रक्षक इन सबके चित्र भी बड़े मनोरंजक और सटीक उतारे गये हैं। इन सभी पात्रों के चरित्र चित्रण को देखकर कालिदास की मार्मिक सूक्ष्म-निरीक्षण शक्ति पर अत्यन्त आश्चर्य होता है।