अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५३ )
के घर की अपेक्षा पति के घर में दासता करते रहना भी अच्छा है। यह कहकर चल देते हैं और शकुन्तला रोती रह जाती है। बाद राजा उचित सलाह के लिए पुरोहित से कहता है, वे सुझाव देते हैं कि महाराज ! बच्चा होने तक यह देवी मेरे घर रहे, सिद्ध पुरुषों ने भविष्यवाणी की है कि आप को पहले चक्रवर्ती पुत्र होगा; यदि कण्व का दौहित्र चक्रवर्ती लक्षण से सम्पन्न होगा तो शकुन्तला की बात सत्य समझकर इसे निवास में स्थान दीजियेगा, अन्यथा इन दोनों को कण्व के आश्रम पर पहुँचा दिया जायेगा। राजा यह सुझाव मान लेते हैं। अपना भाग्य कोसती हुई शकुन्तला पुरोहित के पीछे-पीछे रोती हुई जा रही थी कि स्त्री के आकार की एक दिव्य ज्योति आकाश से आकर उसे उठा ले जाती है। जब पुरोहित जी आकर राजा से यह घटना बताते हैं तो वे आश्चर्य से व्याकुल होकर शयनागार में चले जाते हैं।
षष्ठ अङ्क
शक्रावतारतीर्थ का निवासी एक धीवर रत्नजटित एवं राजनामाङ्कित एक सोने की अंगूठी बेचने के लिए बाजार में जाता है, सिपाही उसे पकड़कर नगररक्षक कोतवाल के पास लाते हैं। अंगूठी की प्राप्ति का कारण पूछने पर वह बताता है कि 'स्वामिन् ! मैं जाल से मछलियों को मारकर अपने परिवार का पालन-पोषण करता हूँ। एक दिन शक्रावतारतीर्थ में जाल से फसाई गई रोहू मछली के पेट से यह अंगूठी मिली है। मैं इसे बेचने के लिए बाजार में आया तब इनके द्वारा पकड़कर आपके पास लाया गया हूँ। यह सुन वह नगर-रक्षक उस अंगूठी को लेकर राजा के पास जाता है, उसे देखते ही दुर्वासा के शाप का अन्त हो जाता है और राजा को शकुन्तला की स्मृति हो जाती है। उस अंगूठी के बदले धीवरको अपना स्वर्ण-कंकण पुरस्कार में दे डालता है। बाद राजा शकुन्तला के परित्याग के कारण वियोग से विकल हो जाता है। विदूषक को साथ लेकर अपने दुःख को दूर करने के लिए प्रमदवन में जाता है और वसन्तोत्सव न मनाने का आदेश दे देता है। इधर मेनका की सखी सानुमती नाम की एक अप्सरा शचीतीर्थ में अपनी पारी पूरी कर राजा के प्रमदवन में आकर तिरस्करिणी विद्या के प्रभाव से छिपकर राजा के पास खड़ी हो जाती है। राजा शकुन्तला के चित्र फलक को देखकर दुःखी हो जाता है, और उसमें कुछ परिवर्तन करने का संकेत करता है। बाद राजा नगरकार्य निरीक्षक अपने अमात्य को सन्देश देता है कि मैं रात में देर तक जग जाने के कारण आज धर्मासन पर नहीं जाऊँगा। आपने जो राजकार्य देखा हो उसे पत्र में लिखकर मेरे पास भेज दें। तदनुसार मन्त्री ने लिखा कि समुद्रमार्ग से व्यापार करनेवाला धनमित्र नाम का व्यापारी नौका दुर्घटना से मर गया है। वह सन्तानहीन था। अतः उसकी सम्पत्ति राजखजाने में जमा होनी चाहिए। सन्तानहीन की बात पढ़कर राजा दुःखी हो जाता है और अपने बाद पुरुवंश के विच्छेद हो जाने की आशंका से व्याकुल हो उठता है। अपने पितरों की भावी दशा का स्मरण कर अत्यन्त दुःखी हो जाता है। बाद आदेश देता है कि धनिकों की अनेक स्त्रियां होती हैं। पता लगाया जाय—यदि उसकी कोई स्त्री गर्भवती हो तो वह गर्भस्थ बालक ही इस सम्पत्ति का अधिकारी होगा। इस प्रकार अंगूठी देखने के बाद राजा का शकुन्तला में निश्चल प्रेम राजा को विरह व्यथा, और पुन मिलन की आशा बताने के लिए मेनका द्वारा भेजी हुई वह सानुमती अप्सरा चली जाती है।