अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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दिया। सत्पात्र के चुनाव पर कण्व जी प्रसन्न हुए और शकुन्तला का अभिनन्दन करते हुए उन्होंने उस योग्य वर की प्राप्ति का अनुमोदन किया। बाद वे शार्ङ्गरव-शारद्वत इन दो शिष्यों तथा वृद्धा तापसी गौतमी के साथ शकुन्तला को दुष्यन्त के पास हस्तिनापुर भेजने का आदेश देते हैं। शकुन्तला की विदाई के अवसर पर वहाँ के वृक्षों ने दिव्य आभूषण तथा वस्त्र दिये। विदाई के समय कण्व के आश्रम में करुणा की अति हो गई। वीतराग तपस्वी कण्व तक रो पड़े। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी आदि से संयुक्त वह सारा तपोवन जीवित प्राणी के समान विकल हो उठा। वृक्षों ने पत्ते गिरने के बहाने अश्रुधारा बहाई मृग मुख में तृण लिए ही रह गये। इस प्रकार समस्त आश्रमवासी स्तब्ध हो गये।
महर्षि कण्व गृहस्थ जीवन को सुखमय बनाने की दृष्टि से शकुन्तला को अनेक समयोचित उपदेश देते हैं और राजा दुष्यन्त को शिष्यों द्वारा उत्तम कर्तव्योचित सन्देश देकर जलाशय के पास से अनसूया और प्रियम्बदा के साथ शकुन्तला से शून्य आश्रम पर आकर कहते हैं कि कन्या के जन्म से पिता को चिन्ता बनी रहती है कि इसे किस योग्य वर को दिया जाय। कन्यारूपी अमानत उसके योग्य अधिकारी को सौंपकर पिताओं का हृदय हलका हो जाता है। आज शकुन्तला को योग्य पति राजा दुष्यन्त के पास भेज कर मेरा भी हृदय निर्मल हो गया।
पञ्चम अङ्क
राजा दुष्यन्त विदूषक से कहता है कि मित्र ! सुनो, गीत का स्वर सुनाई पड़ रहा है मालूम पड़ता है कि सङ्गीतशाला में रानी हंसपदिका गाना सीख रही है जिसे सुनकर मेरा हृदय अन्तर्व्यथा का अनुभव कर रहा है। इतने में ही कञ्चुकी आकर कहता है—महाराज ! हिमालय की तराई के जङ्गल से महर्षि कण्व का सन्देश लेकर स्त्रियों के साथ तपस्वी लोग द्वार पर उपस्थित हैं। यह सुन राजा ने आदेश दिया कि पुरोहित सोमरातजी से कहो कि वे वैदिक रीति से उन तपस्वियों का सत्कार कर यज्ञशाला में लायें। मैं भी वहाँ जाकर उनसे भेंट करूँगा। बाद घूँघट काढ़ी हुई शकुन्तला गौतमी तथा कण्व के शिष्यों के साथ दुष्यन्त के दरबार में पहुँचती है। राजा शाप के कारण शकुन्तला के साथ गान्धर्वविवाह की बात भूल जाता है। सौन्दर्य की छटा देखकर वह शकुन्तला पर आकृष्ट होता है किन्तु धर्मनिष्ठा के कारण पराई स्त्री समझकर अस्वीकार कर देता है। गौतमी शकुन्तला का मुख देखती है। बाद शकुन्तला पहचान के लिए अंगूठी दिखाना चाहती है, पर वह अंगुली में नहीं मिलती, बाद कण्वाश्रम में साथ बिताए दिनों का मधुर प्रसङ्ग सुनाती है, फिर भी राजा को कुछ याद नहीं आता। अंगूठी का प्रसङ्ग उठाकर न दिखा पाने से राजा को और आशंका हो जाती है कि ये लोग मुझे धर्म से गिराना चाहते हैं।
स्त्री जाति परवञ्चना में बड़ी प्रवीण होती है मनुष्यों की कौन कहे पक्षी भो इससे बाज नहीं आते, कोयल उड़ने के पहले अपने बच्चों को कौए से पालन कराती हैं। इसी प्रकार शकुन्तला की माँ मेनका ने इसे जन्म देकर कण्व से पालन पोषण कराया है। जब अशिक्षित पक्षियों की यह हालत है तो शिक्षित मनुष्यों की क्या स्थिति होगी। अतः मैं इस वञ्चना में न फँसूंगा। इसके बाद शकुन्तला और शार्ङ्गरव राजा को भला बुरा भी सुनाते हैं, पर वह नहीं बदलता है। अन्त में शकुन्तला को छोड़ यह कहकर कि 'बिना बड़ों से पूछे जो तूने ऐसा कार्य किया है, उसका फल भोगो। विवाहिता लड़की के लिए पिता