भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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विचरण तथा स्वेच्छया रूप धारण करने का वरदान प्राप्त किया था। महर्षि पाणिनी ने अपनी अष्टाध्यायी में शिलालि तथा कृशाश्व के द्वारा रचित नाट्य सूत्रों का उल्लेख किया है। भगवान् पतञ्जलि ने अपने महाभाष्य में कंसवध तथा बालिवध नामक नाटकों के अभिनय का वर्णन किया है। वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में नागरिकों के मनोवर्णन करते हुए नटों के द्वारा अभिनीत नाटकों के प्रदर्शन का उल्लेख किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अध्ययन से पता चलता है कि ललित कला की शिक्षा के लिए उस समय राज्य की ओर से पूर्ण प्रबन्ध था। इन बातों से प्रमाणित होता है कि वैदिक काल से ईसा की प्रथम शताब्दी तक हमारे देश में नाटकों का अभिनय क्रमशः चला आ रहा था।

इसलिए यह निर्विवाद सत्य है कि संस्कृत साहित्य में नाटकों के निर्माण की परम्परा बहुत पुरानी है और आदि काल से ही भारतीय जन जीवन के मनोरंजन के लिए नाटकों को श्रेष्ठ माध्यम के रूप में अपनाया जाता था।

भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में जो नाटकीय कला की उत्पत्ति का विवरण उपस्थित किया है उसके अनुसार इन्द्रादि-देवताओं के अनुरोध पर स्वयं ब्रह्माजी ने ऋग्वेद से पाठ, यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से गान, और अथर्ववेद से रस लेकर नाट्यवेद नामक पञ्चम वेद की रचना की तथा धर्म, क्रीडा, हास्य, युद्ध आदि भावों का प्रदर्शन इसका विषय कह कर इसे देवता और दैत्य दोनों के लिए ग्राह्य बताया और नाट्यशास्त्र में अभिनय के लिए वर्ग, आयत, या त्रिभुज के आकार वाले प्रेक्षागृहों के निर्माण की नियमविधि का उल्लेख किया है। इस प्रकार नाट्यकला का मूल सम्बन्ध धर्म से था, आगे चलकर इसने स्वतन्त्र साहित्यिक रूप ग्रहण कर लिया। संस्कृत के नाटककारों ने अपने नाटकों की कथावस्तु धर्म ग्रन्थों से लेकर जनता की रुचि में ढालकर देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार जनरञ्जन की दृष्टि से नाटकों की योजना की। भरत मुनि के मतानुसार नाट्य तीनों लोकों के भावों का अनुकरण है त्रैलोक्यस्य सर्वस्य नाट्यं भावानुकीर्तनम्। भरतमुनि का सिद्धान्त है कि नाटक में सभी प्रकार का ज्ञान, शिल्प, विद्याएं और शास्त्र समन्वित रहते हैं। वह वेदविद्या है इतिहास है और उसमें योग सदाचार एवं समाज को विनोद प्रदान करने के साधन विद्यमान हैं। इस मत का अनुमोदन महाभाष्य के कंसवध और बालिवध के अभिनय के वर्णन में किया गया है—

न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला। न स योगो न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥ १।१०६

पाश्चात्य विद्वानों ने इस परम्परानुमोदित मान्यता को अस्वीकार करते हुए अन्यान्य मूल कारणों की उद्भावना की। डा० कीथ के मतानुसार प्राकृतिक परिवर्तनों को जन-साधारण के सामने मूर्तरूप दिखाने की अभिलाषा से ही नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ।

जर्मनी के विद्वान् पिशेल ने नाटकों की उत्पत्ति पुत्तलिका नृत्य से बताई है। उसके कथनानुसार उस नृत्य की उत्पत्ति भारतवर्ष में हुई और यहां से इसका प्रचार एवं प्रसार अन्य देशों में हुआ। सूत्रधार एवं स्थापक जैसे शब्दों से इस मत की पुष्टि की गई है। डा० लूडर्स के मत से नाटकों की उत्पत्ति छाया-नाटकों से हुई। इसका समर्थन दूताङ्गद नाम छाया-नाटक से किया गया। नेपाल आदि देशों में प्रचलित इन्द्रध्वज महोत्सव से नाटकों की उत्पत्ति मानी। अनेकों ने सम्वाद सूत्रों से नाट्य का उद्गम प्रतिपादित किया है।

वस्तुतः संस्कृत नाटक भारतीय प्रतिभा की स्वतन्त्र सूझ है और अभिनय की कला में