भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 540 में से

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भी वह स्वतन्त्र उद्भावना के आश्रित रहा है। संस्कृत के प्राचीन नाटकों के रंगमञ्च पर बालकों के द्वारा नियोजन किये जाने के उदाहरण उपलब्ध हैं। जैसे शकुन्तला का सर्वदमन शेर के बच्चे से खेलते हुए दिखाया गया है। संस्कृत नाटकों में विभिन्न पात्रों के लिए विभिन्न प्रकार की भाषाओं का उपयोग है। नायक तथा प्रमुख पात्र संस्कृत बोलते हैं लेकिन स्त्रियां एवं निम्नकोटि के पात्र प्राकृत के भिन्न-भिन्न रूपों का व्यवहार करते हैं। इस प्रकार की व्यवस्था विश्व के किसी अन्य नाटक परम्परा में प्राप्त नहीं होती।

समीक्षकों ने महाकाव्यों के अनन्तर संस्कृत नाटकों का प्रादुर्भाव भास कवि के स्वप्नवासवदत्तम् तथा प्रतिज्ञायौगन्धरायण नामक नाटकों से माना है। जिनके कथानक रामायण और महाभारत से लिये गये हैं। नाटकों की निर्माण परम्परा में भास कवि के अनन्तर कालिदास का नाम आता है। कालिदास ने अपने मालविकाग्निमित्र की प्रस्तावना में भास, सौमिल्ल, कविपुत्र आदि प्रागवर्ती नाटककारों की चर्चा की है।

संस्कृत साहित्य के उपवन में कालिदास का आगमन एक वसन्त दूत के रूप में माना गया है जिसके कारण उपवन का कोना-कोना पुष्पित हो उठा है। इन्होंने नई साज सज्जाएँ, नई दिशाएँ नये विचार अभिनव भाव, नई-नई पद्धतियाँ प्रस्तुत की हैं ये संस्कृत में सबसे बड़े कवि और सर्वश्रेष्ठ नाटककार हुए हैं।

नाटकों के क्षेत्र में कालिदास ने तीन नाटकों का प्रणयन किया है—मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय और अभिज्ञानशाकुन्तल। इनमें मालविकाग्निमित्र कवि की आरम्भिक कृति है, जिसमें नाटक नियमों की दृष्टि से कथानिर्वाह, घटनाक्रम, पात्रयोजना आदि सभी नाटककार के असाधारण कौशल की छाप है। अभिज्ञानशाकुन्तल उनकी अन्तिम कृति है, किन्तु उसकी गणना आज विश्व साहित्य की पहली कृति के रूप में की जाती है। प्रेम और सौन्दर्य का ऐसा सरस, हृदयग्राही एवं मर्मस्पर्शी चित्रण अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। उसमें ओज के साथ मनोज्ञता और लघुत्व के साथ प्राञ्जलता का अद्भुत समन्वय हैं। शकुन्तला की सरलता अपराध में, दुःख में, अज्ञानता में, धैर्य में और क्षमा में परिपक्व है गम्भीर तथा स्थायी है। गेटे की आलोचना के अनुसार शकुन्तला के आरम्भिक तरुण सौन्दर्य ने मंगलमय परम परिणत सफलता लाभ करके मर्त्य को स्वर्ग के साथ संमिलित कर दिया है।

गणदास ने कहा है कि यह नाट्य देवताओं के नेत्रों का प्रसाधन करने वाला यज्ञ है। स्वयं शिवजी ने उमा से विवाह करके अपने शरीर में इसके अपने शरीर दो भाग कर दिये एक ताण्डव और दूसरा लास्य। इनमें सत्त्व, रज और तम तीनों गुण भी दिखाई पड़ते हैं। और अनेक रसों में लोकचरित लक्षित होते हैं। इसलिए भिन्न भिन्न रुचि वालों के लिए प्रायः नाटक ही एक ऐसा उत्सव है, जिससे सबको समान आनन्द मिलता है—

देवानामिदमामनन्ति मुनयः शान्तं क्रतु चाक्षुषं रौद्रेणैतदुमाकृतव्यतिकरे स्वाङ्गे विभक्तं द्विधा। त्रैगुण्योद्भवमत्र लोकचरितं नानारसं दृश्यते नाट्यं भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधाप्येकं समाराधकम् ॥

अभिज्ञानशाकुन्तल का उत्कर्ष

कालिदास का काव्य सरस्वती का सर्वोत्कृष्ट प्रसाद अभिज्ञान शाकुन्तल है। सौन्दर्य

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