अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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की मादकता, प्रेम की निश्चलता, प्रकृतिजन्य सरलता, ऋषिकुल की उदारता, महर्षि कण्व का आदर्श वात्सल्य, दुर्वासा का निर्ममदण्ड, वासना का प्रक्षालन, आत्मा का निर्मलीकरण तथा संस्कृति के पीयूष संमिलन, श्रेयस् एवं प्रेयस् मनोग्राही ग्रन्थिबन्ध इन सभी उपादानों को एक साथ मिश्रित कर कविवर कालिदास ने अभिज्ञानशाकुन्तल में जो प्रपाणक रस तैयार किया है वह भारतीय जीवन के निमित्त नितान्त मूल्यवान् है। इस नाटक के प्रथम चार अंकों को भोग-भूमि पाँच एवं छः दो अंकों को दण्डभूमि और अन्तिम सप्तम अंक को सिद्धभूमि माना गया है। इस प्रकार यह नाटक कवि की प्रतिभा का अनुपम फल है।
अभिज्ञानशाकुन्तल में कवि की निपुणकला भारतीय संस्कृति के सौरभ में सनकर अधिक अभिराम तथा प्रभविष्णु बन गई है। महाभारत की चालाक तथा बिना शील वाली युवती शकुन्तला नाटक में लजीली सम्मानपूर्ण करुणोत्पादक नायिका में रूपान्तरित हो गई है। इसी प्रकार स्वार्थपरायण राजा दुष्यन्त जो महाभारत में नीति के अनुरोध से उसे न पहचानने का व्याज करता है वही यहां नाटक में ऐसी विस्मृति से अभिभूत चित्रित किया गया है, जिसके लिए उसकी भर्त्सना नहीं की जा सकती, उसका नैतिक चरित्र ऊँचा उठ गया है और वह पराई स्त्री सम्पर्क से विमुख एक आदर्श राजा बन गया है।
अपनी काव्यात्मक प्रतिभा के सहारे कालिदास को दो रूपों सफलता मिली है। प्रथमतः वे काव्योचित भावों के धनी हैं, जिन्हें वे बड़ी निपुणता से चरित्र के साथ मिला देते हैं तथा द्वितीयतः उनमें संयम एवं सन्तुलन की काव्यात्मक भावना है जो किसी नाटककार के लिए सफलता की आवश्यक हेतु हैं। विद्वानों का कथन है कि कालिदास ने अपने नाटकों में नाट्य शास्त्रों के विधानों का प्रायः अनुसरण किया है उनकी रचनाओं में अधिकांश नियमों का प्रतिबिम्ब झलकता है।
यद्यपि कालिदास ने संस्कृत में तीन नाटक लिखे हैं (१) मालविकाग्निमित्र (२) विक्रमोर्वशीय तथा (३) अभिज्ञानशाकुन्तल, किन्तु नाटककार के रूप में उनकी कीर्ति सर्वाङ्गसुन्दर अभिज्ञानशकुन्तल से स्थिर हो सकी है।
समालोचकों ने चरित्रचित्रण, रसपरिपाक भाषासौष्ठव, संविधान के चातुर्य की दृष्टि से अभिज्ञानशाकुन्तल को संस्कृत नाटकों में सर्वश्रेष्ठ माना है। कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सर विलियम जोंस ने एक संस्कृत के पण्डित की सहायता से १७८६ ई० में अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का अंग्रेजी में अनुवाद किया। जिसने यूरोपीय विद्वानों की मनोदृष्टि भारतीय नाट्य प्रतिभा की प्रतीति से चकित एवं मुग्ध कर दिया। उसके अनन्तर कई यूरोपीय भाषाओं में उसके अनुवाद भी हुए। इस समय तो विश्व की कोई भी ऐसी भाषा नहीं है, जिसमें अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक का अनुवाद न हुआ हो।
इस नाटक के सप्तम अंक में सर्वदमन का अकृत्रिम हास्य, तोतली बोली का वर्णन तथा शेर के बच्चों के साथ बालक्रीड़ा पढ़कर शेजी नाम के एक फ्रेञ्च विद्वान् को इतना आनन्द आया कि वह नाचने लगा। विश्वविख्यात जर्मनकवि गेटे ने इस नाटक का अनुवाद पढ़कर आनन्द विभोर होकर कहा था कि यदि स्वर्ग और पृथ्वी को बातें एक जगह देखना हो तो अभिज्ञान शाकुन्तल का अध्ययन करो। इस प्रकार अभिज्ञान शाकुन्तल को लोकप्रिय होने के कारण समीक्षकों का यह कहना सर्वथा संगत प्रतीत होता है कि कालिदास के ग्रन्थों में अभिज्ञान शाकुन्तल सर्वोत्कृष्ट है—कालिदासस्य सर्वस्वमभिज्ञानशाकुन्तलम्।