भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 540 में से

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( २८ )

अनन्त कथारत्नों के सागर महाभारत के आधार पर कालिदास ने इस नाटक की रचना की है। कालिदास के अनुपम रचनाकौशल से यह नाटक लोकोत्तर बन गया है। इस नाटक की भाषा अत्यन्त प्रसाद युक्त और रमणीय है। इसमें उपमा अलंकार, उत्प्रेक्षा, स्वभावोक्ति, अर्थान्तरन्यास, काव्यलिङ्ग आदि अलङ्कारों की बहुलता है। इसमें कहीं भी क्लिष्टता, कल्पना की खींचातानी, दूरान्वय आदि दोष नहीं हैं। प्रत्येक पात्र के अनुरूप भाषा रखने में कवि ने पर्याप्त सावधानी रखी है। शकुन्तला तथा उसकी सखियां हमेशा लता वृक्ष आदिकों के सहवास में खेलने और रहने वाली हैं। इसलिए उनकी उक्तियों में आम्र, अतिमुक्तलता, नवमल्लिका आदि वृक्ष एवं लता का उल्लेख है। 'क इदानीं सहकारमन्तरेणातिमुक्तलतां पल्लवितां सहते' 'को नामोष्णोदकेन नवमल्लिकां सिञ्चति।' महर्षि कण्व हमेशा यज्ञ-याग से निरत और अध्यनाध्यार्पन में निमग्न रहते हैं। अतः वे ऐसे दृष्टान्तों का प्रयोग करते हैं जिनका सम्बन्ध यज्ञ एवं अध्ययन से है—'दृष्ट्या धूमाकुलितदृष्टेः यजमानस्य पावके एवाहुतिः पतिता'; 'वत्से ! सुशिष्यपरिदत्ता विद्येवाऽशोचनीया संवृत्ता।' हमेशा खाद्यलोलुप और विनोदी विदूषक के स्वभाव का प्रतिबिम्ब उसके कथन में पड़ा है—'यथा कस्यापि पिण्डखजूरैरुद्वेजितस्य तिन्तिण्यामभिलाषो भवेत् तथैव स्त्रीरत्नपरिभोगिणो भवत इयमभ्यर्थना।' किसी पात्र के भाषण में छोटे-छोटे चटकीले होने से उनको पढ़ते हुए पाठक के मन प्रसन्न हो जाता है।

तत्र श्लोकचतुष्टयम्

अभिज्ञानशाकुन्तल की विशेषता में समालोचकों का कहना है कि संस्कृत के काव्यों में नाटकों की उत्तमता है। उन सबों में अभिज्ञान शाकुन्तल अत्यन्त रमणीय है। उसमें उसका चतुर्थ अङ्क अत्युत्तम है, उसमें भी चार श्लोक आदर्श पूर्ण हैं—

काव्येषु नाटकं रम्यं तत्रापि च शकुन्तला ।
तत्राप्यङ्कस्तुरीयस्तु तत्र श्लोकचतुष्टयम् ॥

ये चारों श्लोक इस प्रकार हैं—

( १ )

यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया
कण्ठस्तम्भितबाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम् ।
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः
पीड्यन्ते गृहिणः कथं नु तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः ॥ ४।२

( २ )

पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या
नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम् ।
आद्ये वः कुसुमप्रसूतसमये यस्या भवत्युत्सवः
सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम् ॥ ४।८

( ३ )

अस्मान् साधु विचिन्त्य संयमधनानुच्चैः कुलं चात्मनः
त्वय्यस्याः कथमप्यबान्धवकृतां स्नेहप्रवृत्तिं च ताम् ।

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