अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 30, कुल 540 में से
संदर्भ में पढ़ें( २४ )
कार्य के रूप में परिणत आदि बातें बड़ी चारुता के साथ काव्यात्मक सरल शैली में वर्णित की गई हैं। जैसे—
नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं प्राक् सृष्टेः केवलात्मने । गुणत्रयविभागाय पश्चात् भेदमुपेयुषे ॥ २।४
अर्थात् हे भगवन् ! संसार को रचने के पहले एक ही रूप में रहने वाले पर, जब संसार रचने लगते थे उस समय सत्त्व, रज एवं तम तीन गुण उत्पन्न करके ब्रह्मा, विष्णु और महेश नाम से तीन रूप के बन जाने वाले आपको प्रणाम है।
इसी प्रकार रघुवंश के प्रथम सर्ग में—
वैवस्वतो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम् । आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव ॥ १।११
आदि श्लोकों से वे यज्ञ आदि-कर्मकलाप के ज्ञान के साथ ही वेदोच्चारणविधि का प्रचार भी सूचित करते हैं तथा उनकी कृतियों में नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा पुराणों की प्रधान प्रधान बातें यथावसर व्यक्त होती रहती हैं । रघुवंश में रघु और इन्द्र के साथ युद्ध से तथा अभिज्ञानशाकुन्तल के सप्तम अङ्क में विदूषक पर आक्रमण के समय दुष्यन्त के शब्दवेधी बाण चलाने की कला से कविवर कालिदास के युद्धविषयक ज्ञान की सूचना मिलती है । तथा शकुन्तला के षष्ठ अङ्क में तूलिका से दुष्यन्त द्वारा चित्रित शकुन्तला विषयक चित्रकला और मूर्तिकला अनुशीलन करने पर कालिदास की चित्रकला का पर्याप्त ज्ञान प्रतीत होता है । इस प्रकार रघुवंश कुमारसम्भव शकुन्तला आदि में विभिन्न शास्त्रों के ज्ञान के पर्याप्त उदाहरण भरे पड़े हैं ।
संस्कृत नाटकों के उद्भव तथा विशेषता का विवेचन
संस्कृत साहित्य में नाटकों की एक विशिष्ट परम्परा रही है। लोकप्रियता के कारण भारत में नाट्यकला का प्रयोग अत्यन्त प्राचीन काल से होता चला आया है। ऋग्वेद के सूक्तों में सोमविक्रय के समय मनोरञ्जनात्मक अभिनय का संकेत प्राप्त होता है । पुरुरवा-उर्वशी, यम-यमी, इन्द्र-इन्द्राणी, वृषाकपी आदि के संवाद सूक्तों में नाटकीय कथनोपकथन उपलब्ध होते हैं। यजुर्वेद में शैलूष शब्द का स्पष्ट उल्लेख है, जो नट अथवा अभिनेता का समानार्थी है। वाल्मीकीय रामायण में नट, नर्तक तथा शैलूष शब्दों का उल्लेख है ।
इस प्रकार तत्कालीन जन जीवन में धार्मिक अवसर, संगीत समारोह तथा नृत्योत्सवों से नाटक का विशेष सम्बन्ध था ।
उत्तरवर्ती साहित्य में नाट्यकला की शिल्पविधियों का पूरा इतिहास दिखाई देता है । रामायण के एक प्रसंग में कहा गया कि नटों, नर्तकों और गायकों की मण्डलियों की कर्ण सुखद वाणियों को जनता पूरी तन्मयता से सुनती थी—
नटनर्तकसंघानां गायकानां च गायताम् । यतः कर्णसुखा वाचः शुश्राव जनता ततः ॥
महाभारत में नट, नर्तक, गायक, सूत्रधार आदि का निर्देश है । हरिवंश पुराण में रामचरित नाटक प्रदर्शित किये जाने का संकेत है । महाभारत के अनुसार प्रद्युम्नविवाह के प्रसंग में वसुदेव जी के यज्ञ के अवसर पर भद्रनामक नट ने अपने आकर्षक नाट्य-प्रदर्शन से उपस्थित ऋषि-महर्षियों को प्रसन्न किया था जिसके फलस्वरूप उसने आकाश-