अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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कालिदास का शास्त्रीय ज्ञान
महाकवि कालिदास की रचनाओं के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि उन्हें संस्कृत साहित्य के मौलिक ग्रन्थों का पर्याप्त ज्ञान था। उनकी कृतियों में यत्र-तत्र प्रसंगवश उपनिषद्, पुराण, महाभारत, दर्शन, धर्मशास्त्र, ज्योतिष, व्याकरण, साहित्यशास्त्र आदि के सिद्धान्तों के स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध होते हैं। महाकाव्य रघुवंश के मङ्गलाचरण—
वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥
में उन्होंने काव्य का लक्षण “शब्दार्थौ काव्यम्” निर्दिष्ट किया है। इसी प्रकार वे अपने व्याकरण ज्ञान की प्रौढता को भी व्यक्त करते चलते हैं। वागार्थाविव इस अंश में ‘इवेन सह समासो विभक्त्यलोपश्च’ इस वार्तिक का तथा ‘पितरौ’ में “पिता मात्रा १।२।७०” इस पाणिनीय सूत्र का स्मरण दिलाते हुए वे अपनी व्याकरण विदग्धता को प्रदर्शित करते हैं। इसी प्रकार पन्द्रहवें सर्ग में बालिवध के प्रसङ्ग पर व्याकरण में उपमा की हृदयाकर्षक छटा दिखाते हैं—
स हत्वा बालिनं वीरस्तत्पदे चिरकाङ्क्षिते।
धातोः स्थान इवादेशं सुग्रीवं सन्न्यवेशयत्॥ १२।५८
अर्थात् उस राम ने बालि को मारकर धातु के स्थान पर आदेश के समान (अस् धातु के स्थान पर ‘अस्तेर्भू’ सूत्र से विहित भू आदेश के समान तथा पा धातु से पाघ्राध्मा सूत्र से विहित आदेश के समान) सुग्रीव को चिरकाल से अभिलषित उस बालि के स्थान पर रखा। रघुवंश के तृतीय सर्ग में उनका ज्योतिष विषयक परिपक्व ज्ञान परिलक्षित होता है—
ग्रहैस्ततः पञ्चभिरुच्चसंश्रयैरसूर्यगैः सूचितभाग्यसम्पदम्।
असूूत पुत्रं समये शचीसमा त्रिसाधना शक्तिरिवार्थमक्षयम्॥ ३।१३
अर्थात् अनन्तर इन्द्राणी के समान रानी सुदक्षिणा ने प्रसव का समय (दसवां महीना) होने पर उच्च स्थान में स्थित सूर्य के सान्निध्य से अस्त को नहीं प्राप्त हुए पांच ग्रहों के द्वारा जिसकी भाग्य सम्पत्ति सूचित हो रही है। ऐसे पुत्र को प्रभाव, उत्साह एवं मन्त्र इन तीन उपायों से सम्पन्न होने वाली शक्ति जैसे अक्षय अर्थ को उत्पन्न करती है वैसे ही उत्पन्न किया।
शकुन्तला के पञ्चम अङ्क में रानी हंसपदिका के सस्वर गीत को सुनकर राजा दुष्यन्त उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि ‘अहो रागपरिवाहिणी गीतिः’ रघुवंश के प्रथम सर्ग में रानी सुदक्षिणा और राजा दिलीप को अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में जाते समय कवि ने अपनी संगीत विदग्धता का परिचय देते हुए कहा है—
मनोऽभिरामा शृण्वन्तौ रथनेमिस्वनोन्मुखैः।
षड्जसंवादिनीः केका द्विधाभिन्ना शिखण्डिभिः॥ १ ३६
अर्थात्—रथ के चक्रप्रान्ति के शब्द को सुनकर ऊपर मुख किये हुए मयूरों द्वारा दो प्रकार की हुई षड्ज स्वर का अनुसरण करने वाली तथा मन को प्रसन्न करने वाली वाणी को सुनते हुए वे दोनों सुदक्षिणा और दिलीप चले।
कुमार संभव के द्वितीय सर्ग में ब्रह्म और जगत् की एकात्मकता, ब्रह्म की जगत् रूप