अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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इसके अनन्तर राजपुरुषों को एक धीवर के पास वह अंगूठी मिली, उसे चोर समझ-कर कोतवाल ने उस घटना को राजा के पास उपस्थित किया। उस अंगूठी को देखते ही राजा दुष्यन्त को शकुन्तला के साथ गान्धर्व-विवाह का स्मरण हो आया। उसे अपनी भूल पर पश्चात्ताप होने लगा तथा तब से वह शकुन्तला के विरह में दुःखी रहने लगा। इस प्रकार इस नाटक के पञ्चम अंक में अंगूठी रूपी अभिज्ञान से शकुन्तला के पहचाने जाने के वृत्तान्त होने के कारण इस नाटक को अभिज्ञान शाकुन्तल कहते हैं।
इसमें दो अंश हैं—एक अभिज्ञान और दूसरा शाकुन्तल। अभिज्ञान का अर्थ है पहचानने का साधन—अभिज्ञायतेऽनेनेति अभिज्ञानम्। शाकुन्तलं का अर्थ है शकुन्तला विषयक या शकुन्तला सम्बन्धी—शकुन्तलाया इदं शाकुन्तलम्। अभिज्ञानशाकुन्तल की व्युत्पत्ति कई प्रकार से की जाती है (१) अभिज्ञानं=अभिज्ञानभूतं तत् शाकुन्त-लम् इति अभिज्ञान शाकुन्तम्। अर्थात् शकुन्तलाविषयक वह नाटक जो अभिज्ञान स्वरूप हो (२) अभिज्ञानेन स्मृतं शाकुन्तलं=शकुन्तलाविषयकं वृत्तान्तं यस्मिन् तत् अभिज्ञानशाकुन्तलम्—अर्थात् शकुन्तलाविषयक विवाह का वृत्तान्त में जिसमें निशानी के रूप में स्मृत हो आया हो। (३) अभिज्ञानं=परिचयस्वरूपं शाकुन्तलं=शकुन्त-लासम्बन्धिचरितं यत्र=नाटके तत् अभिज्ञानशाकुन्तलम्। अर्थात्, जिस नाटक में शकुन्तला का परिचयमय वैवाहिक वर्णन हो। (४) अभिज्ञानप्रधानं शाकुन्तलं यस्मिन् नाटके तत् अभिज्ञानशाकुन्तलम्। अर्थात् जिस नाटक में शकुन्तला का विवाह आदि वृत्तान्त अभिज्ञान प्रधान हो (५) अभिज्ञानं च शकुन्तलां च अभिज्ञानशकुन्तले ते अधिकृत्य कृतं नाटकमिति अभिज्ञानशाकुन्तलम्। अर्थात् शकुन्तला के विषय में निशानी या परिचय जिस नाटक में निबद्ध हो उसे अभिज्ञानशाकुन्तल कहते हैं। (६) अभिज्ञानेन स्मृता शकुन्तला अभिज्ञानशकुन्तला तामधिकृत्य कृतं नाटकमिति अभिज्ञान शाकुन्तलम्। अर्थात्—जिस नाटक में अभिज्ञान से स्मृत शकुन्तला को विषय बनाकर वर्णन किया गया हो उस नाटक को अभिज्ञानशाकुन्तलं कहते हैं। (७) कुछ प्राचीन प्रतियों में 'अभिज्ञानशकुन्तलम्' इस प्रकार का पाठ मिलता है जिसके अनुसार व्युत्पत्ति होगी अभिज्ञानेन स्मृता=स्मृतिपथमानीता शकुन्तला अभिज्ञानशकुन्तला यस्मिन् तत् अभिज्ञानशकुन्तलम्। अर्थात् जिस नाटक में शकुन्तला निशानी अंगूठी के रूप में स्मृत की गई हो वह नाटक अभिज्ञानशकुन्तलम् है।
आदिकाव्य वाल्मीकीय रामायण में भी अभिज्ञान शब्द पहचान के साधन अर्थ में प्रयुक्त है। सम्भवतः कालिदास ने वहीं से अभिज्ञान पद लेकर इस नाटक में भी प्रयुक्त किया है। सुन्दर काण्ड में हनुमान् जी ने सीता जी से कहा था—देवि ! यदि मेरे साथ आपको चलने की इच्छा नहीं है तो कृपया आप कोई अपनी पहचान ही दे दीजिए जिससे श्रीरामजी यह जान लें कि मैंने आपका दर्शन किया है—
अभिज्ञानं प्रयच्छ त्वं जानीयाद् राघवो यतः । ३८।१०
इसके उत्तर में सीताजी ने कहा—
इदं श्रेष्ठमभिज्ञानं ब्रूयास्त्वं तु मम प्रियम् । ३८।१२
इस प्रकार चित्रकूट पर्वतपर शक्रसुत जयन्त की कथा का स्मरण कराकर मणि देने के पश्चात् सीताजी हनुमानजी से बोलीं: मेरे इस चिह्न को श्रीराम भलीभांति जानते हैं। इसे