भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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( ३१ )

देख कर वे एक ही साथ तीन व्यक्तियों का स्मरण करेंगे-मेरा, माता कौशल्या का तथा महाराज दशरथ का—

मणिं दत्वा ततः सीता हनूमन्तमथाब्रवीत् । अभिज्ञानमभिज्ञातमेतद् रामस्य तत्त्वतः ॥ मणिं दृष्ट्वा तु रामो वै त्रयाणां संस्मरिष्यति । वीरो जनन्या मम च राज्ञो दशरथस्य च ॥ ६६।१-२ ॥

अभिज्ञानशाकुन्तल की कथा का मूल आधार

कविवर कालिदास ने अपने अभिज्ञान शाकुन्तल का कथानक महाभारत के आदिपर्व में वर्णित शकुन्तलोपाख्यान से ग्रहण किया है। अभिज्ञानशाकुन्तल के कथानक का मूल आधार महाभारत है। महाभारत के आदिपर्व ६९ वे अध्याय से ७४ वे अध्याय तक ६ अध्यायों के शकुन्तलोपाख्यान में राजा दुष्यन्त तथा महर्षि कण्व की पुत्री शकुन्तला के कथानक का वर्णन है। पद्मपुराण के स्वर्ग खण्ड में भी दुष्यन्त और शकुन्तला की कथा लिखी गई है, किन्तु पद्मपुराण की कथा की अपेक्षा महाभारत का कथानक प्राचीन सीधा-सादा तथा स्वाभाविक प्रतीत होता है। कविवर कालिदास ने महाभारत के सीधे-सीधे आख्यान को अपनी कला से परिष्कृत कर के एक नया सा रूप दे दिया है। उन्होंने अपनी उद्भावनाओं नाटकीय तत्त्वों से उसमें मनोहरता ला दी है।

पद्म पुराण की कथा में महाभारत तथा अभिज्ञानशाकुन्तल का मिश्रण है। समालोचकों का कहना है कि अभिज्ञानशाकुन्तल के अंशों को जोड़-जोड़कर पद्मपुराण की कथा बनाई गई है। इसके अन्त का भाग कालिदास के शाकुन्तल का सार-मात्र है। यह कथा अभिज्ञान शाकुन्तल से लेकर अपनी शैली में लिख ली गई है। अतः पद्मपुराण का अधिक हिस्सा बाद का रचा प्रतीत होता है। इस प्रकार अभिज्ञानशाकुन्तल के कथानक का आधार महाभारत मानना अधिक संगत है।

महाभारत के आख्यान का संक्षेप—

महाभारत के आदिपर्व में वर्णित शकुन्तलोपाख्यान का सारांश इस प्रकार है। एक बार चन्द्रवंशी राजा दुष्यन्त शिकार खेलते-खेलते कुलपति कण्व के आश्रम में जा पहुँचे, परन्तु उस समय महर्षि कण्व आश्रम में उपस्थित नहीं थे, वे फल लाने के लिए वन में गये हुए थे। उनकी अनुपस्थिति में उनकी पोष्यपुत्री शकुन्तला राजा का स्वागत करती है। उसके अपूर्व सौन्दर्य का अवलोकन कर राजा दुष्यन्त के मन में काम की भावना अङ्कुरित हो उठती है। उनके पूछने पर उसने विश्वामित्र से अपना उत्पत्ति-वृत्तान्त कह सुनाया। जब राजा को यह मालूम हो गया कि वह क्षत्रिय की कन्या है तब उन्होंने उसके प्रति अपना प्रेम व्यक्त किया और प्रलोभनों के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। इस पर शकुन्तला ने शर्त रखी कि आपके बाद मेरे पुत्र को ही राजसिंहासन मिलना चाहिए। राजा यह शर्त स्वीकार कर लेता है कि तुम्हारा पुत्र ही मेरे राज्य का उत्तराधिकारी होगा। परिणामतः दोनों गान्धर्व-विधि से प्रणय-सूत्र में आबद्ध हो जाते हैं। राजा ने उसका पाणिग्रहण कर उसके साथ सहवास किया जिससे वह गर्भवती हो गई। राजा उसके साथ कुछ देर तक रहा, बाद उसे आश्वासन देकर कि मैं नगर पहुँच कर तुम्हें ले जाने के लिए किसी विश्वास-पात्र व्यक्ति को भेजूंगा हस्तिनापुर वापस लौट आता है। मार्ग में वह सोचता जाता है कि ऋषि