अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२ )
की आज्ञा के बिना ही मैंने उनकी कन्या का पाणिग्रहण कर लिया है, जब यह समाचार उन्हें मालूम होगा, न जाने वे क्या करेंगे ?
राजा के चले जाने के बाद महर्षि कण्व आश्रम पर आये और उन्होंने अपने तपोबल से दुष्यन्त के साथ शकुन्तला के गान्धर्व-विवाह का वृत्तान्त जान लिया और उस पर अपनी स्वीकृति दे दी। इस घटना के तीन वर्ष बाद शकुन्तला को एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका विधिवत् जातकर्म आदि संस्कार कण्व जी ने किया और शिशु का पालन पोषण किया। ६ वर्ष की अवस्था में ही उस बालक में बल और पराक्रम स्पष्ट दिखाई देने लगा। वह शेर के बच्चों को पकड़-पकड़कर उनके साथ खेलता था उनका दाँत गिनता था और बलपूर्वक वन्यपशुओं को पकड़कर उन्हें पेड़ों में बाँध देता था। इस अद्भुत पराक्रम को देखकर ऋषि ने उसका नाम सर्वदमन रख दिया। इस प्रकार नौ वर्ष के काल तक शकुन्तला तपोवन में रही। उसे तपोवन में रखना ऋषि को उचित नहीं प्रतीत हुआ। अतः वे पुत्र सहित शकुन्तला को तपस्वियों के साथ राजा के पास हस्तिनापुर भेज देते हैं।
जब शकुन्तला राजा के पास सामने पहुँचती है तब राजा पहचानते हुए भी कह देता है कि मैं तुम्हें नहीं पहचानता; यह पुत्र मेरा नहीं है; तुम स्वतन्त्र हो जहाँ जी चाहे जाओ। राजा की बात सुनकर शकुन्तला अवाक् हो गई उसने सत्य और धर्म की दुहाई दी, किन्तु राजा ने एक भी न मानी। अन्त में निराश होकर वह लौटने लगती है। इतने में आकाशवाणी होती है—राजन् ! शकुन्तला सत्य कहती है यह तुम्हारी भार्या है और यह सर्वदमन तुम्हारा ही पुत्र है तुम इन्हें रख लो और धर्मपूर्वक इनका भरण-पोषण करो—'भरस्व पुत्रं दौष्यन्तिं सत्यमाह शकुन्तला'। इस आकाशवाणी को सुनकर पुरोहित तथा मन्त्रियों से सवाल कर राजा उन दोनों को अपना लिया। इस प्रकार आकाशवाणी के द्वारा देवताओं की स्वीकृति मिल जाने पर शकुन्तला निर्दोष सिद्ध हो गई। बाद में राजा शकुन्तला को पटरानी पद पर प्रतिष्ठित करता है। सर्वदमन का भरत नाम रखकर युवराज पद पर आसीन कर देता है।
पद्मपुराण के कथानक का सारांश—
पद्मपुराण में भी राजा दुष्यन्त के द्वारा गान्धर्व-विवाह तक की कथा वैसी ही है जैसी महाभारत में। अन्तर केवल इतना ही है कि महाभारत के अनुसार शकुन्तला ने अपने जन्म की कथा को राजा के पूछने पर स्वयं बताया है किन्तु पद्मपुराण के अनुसार शकुन्तला के जन्म की उत्पत्ति उसकी सखी प्रियम्वदा ने बतलाई है। महाभारत के अनुसार राजा ने शकुन्तला को कोई अभिज्ञान नहीं दिया है, पर पद्मपुराण के अनुसार जाते समय राजा ने शकुन्तला को अपनी अंगूठी दे दी है। पुनः पद्मपुराण के अनुसार सात मास का गर्भ होने तक शकुन्तला महर्षि कण्व के तपोवन में ही रही जबकि अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के अनुसार कुलपति कण्व को दुष्यन्त के साथ शकुन्तला का प्रेम-सम्बन्ध और गान्धर्व-विवाह एवं गर्भवती हो जाने का पता लगते ही उन्होंने तत्काल उसे राजा के पास भेज दिया।
पद्मपुराण के अनुसार जब शकुन्तला हस्तिनापुर राजा के पास जाने लगी तो उसके साथ शार्ङ्गरव, शारद्वत तथा गौतमी के साथ प्रियम्वदा भी जाती है। मार्ग में सरस्वती नदी में स्नान करते समय अंगूठी को शकुन्तला ने प्रियम्वदा को दे दिया, यह अंगूठी प्रियम्वदा