भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 540 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 39

( ३३ )

के हाथ से गिर गई। उसने भय के कारण यह बात शकुन्तला से नहीं जनाया और शकुन्तला भी उससे पूछना भूल गई। राजा के पास पहुँचने पर जब उनको विश्वास दिलाने के निमित्त आवश्यकता पड़ी तब शकुन्तला ने प्रियम्वदा से माँगी, पर प्रियम्वदा ने धीरे से उसके कान में कहा कि वह अंगूठी तो नदी में गिर गई है। यह सुनकर शकुन्तला बेहोश हो गई। इसके अतिरिक्त पद्मपुराण का कथानक अभिज्ञानशाकुन्तल के समान ही है। इस प्रकार महाभारत तथा पद्मपुराण के कथानक में अन्तर दिखाई पड़ता है, किन्तु पद्मपुराण की कथा में महाभारत तथा अभिज्ञानशाकुन्तल का मिश्रण है। इस आधार पर कहा जाता है कि यह कथा शकुन्तला से लेकर उसे अपनी शैली में लिख ली गई है।

मूल कथा में परिवर्तन

कालिदास ने मूलकथा महाभारत से ही ली है पर महाभारत के नीरस कथानक में उन्होंने यत्र-तत्र चमत्कारी परिवर्तन करके उसे सरस बनाकर नया रूप दिया है। मूल कथानक के अनुसार राजा दुष्यन्त शिकार खेलते हुए अपनी सेना के साथ महर्षि कण्व के आश्रम के पास पहुँचने पर अपनी सेना बाहर खड़ी करवाके आश्रम में प्रवेश करते हैं; किन्तु अभिज्ञान शाकुन्तल के अनुसार शिकार खेलते समय राजा की सेना पीछे छूट गई, राजा सूत के साथ आश्रम पर पहुँचते हैं फिर भी सहसा प्रवेश नहीं करते। उन्होंने ऐसे समय पर प्रवेश किया जब तपस्विकन्याओ द्वारा उनसे सहायता प्राप्त करने की चर्चा चल रही थी। यह घटना बड़े स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत की गई है। पीछे सेना का भी उपयोग कवि ने अच्छे ढंग से किया है। राजा को न पाकर सेना उसे खोजती हुई आश्रम के पास आगई वहाँ उसने भगदड़ मचाना शुरू कर दिया। उस समय राजा शकुन्तलासहित सखियों के साथ बातें करने में संलग्न था। सेना द्वारा मचाई भगदड़ समाचार सुनकर वे तपस्विकन्यायें कुटी में चली जाती हैं और राजा इन्हें सान्त्वना देकर व्यवस्था करने के लिए बाहर जाता है।

इस प्रकार कवि ने बड़ी सफाई के साथ शकुन्तला के शील, स्वभाव, लज्जा और मुग्धता की रक्षा की योजना कर शकुन्तला-दुष्यन्त के प्रथम मिलन को प्रस्तुत कर प्रथम अङ्क की समाप्ति कर दी है।

मूलकथा के अनुसार जब राजा दुष्यन्त महर्षि कण्व के आश्रम पर पहुँचे तो उस समय महर्षि फल लाने के लिए वन में गये हुए थे। इसलिए उनकी पोष्यपुत्री शकुन्तला ने उनका आतिथ्यसत्कार किया। राजा पूछने पर उसने स्वयं अपनी उत्पत्ति की कथा राजर्षि विश्वामित्र से मेनका में बतायी। राजा के द्वारा विवाह का प्रस्ताव करने पर उसने उनको महर्षि कण्व के वन से लौटने तक रुकने को कहा, किन्तु राजा के जल्दी करने पर उसने एक प्रगल्भा, व्यवहारनिपुणा, स्पष्टवादिनी महिला के समान इस शर्त के साथ विवाह करना स्वीकार कर लिया कि आपके बाद मेरा ही पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा। एक अपरिचित व्यक्ति के साथ भोली-भाली तपस्विकन्या का खुल कर इस प्रकार बातचीत करना अस्वाभाविक एवं नीरस प्रतीत होता है। इसके विपरीत अभिज्ञानशाकुन्तल की शकुन्तला लजालु एवं सुकुमारता का प्रतीक है।

इस प्रकार कालिदास की शकुन्तला में हृदय पक्ष की प्रबलता है, तो महाभारत की शकुन्तला में मस्तिष्क पक्ष प्रबल प्रतीत होता है जिसमें व्यापार की प्रवणता-प्रतीत होती है। इसलिए कालिदास ने इस घटना को बदल दिया है। महाभारत में महर्षि फल-फूल