भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 540 में से

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महाभारत के अनुसार शकुन्तला पुत्र के सहित दुष्यन्त के पास राजमहल में उपस्थित हुई। दुष्यन्त ने सारा वृत्त जानते हुए भी जब उसे अस्वीकार कर दिया तब निराश होकर वह जाने लगी, ठीक इसी समय आकाशवाणी हुई—भरस्व पुत्रं दौष्यन्ति सत्यमाह शकुन्तला। शकुन्तला सत्य कह रही है दुष्यन्त ! यह तुम्हारी ही पुत्र है, इसका भरण पोषण करो। देवताओं ने समर्थन किया, पुरोहित ने उसका अनुमोदन किया। इस प्रकार सर्वसम्मति से दुष्यन्त ने शकुन्तला को अपनाया। इससे दुष्यन्त के हृदय की कमजोरी प्रगट होती है। अतः कवि ने इसे बदल दिया। नाटक के अनुसार शकुन्तला गर्भिणी अवस्था में ही राजा के पास गई। दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण उसे उसके साथ हुए गान्धर्व विवाह आदि का वृत्त विस्मृत हो गया। अतः उसने उसे परस्त्री समझकर धर्मतः अपने यहाँ रखना उचित नहीं समझा। अनन्तर शार्ङ्गरव, शारद्वत और गौतमी उसको वहाँ छोड़कर वन में लौट जाने के बाद विवश हो अपने भाग्य को कोश कर रोती हुई पुरोहित के पीछे-पीछे उसके घर जाती हुई शकुन्तला को एक स्त्री स्वरूपवाली अदृश्य ज्योति उठा ले गई। उसके बाद धीवर से प्राप्त अंगूठी को देखकर राजा को सारी बातें याद आ गई। वह अपनी गलती पर पश्चात्ताप करने लगा और पुनः उसका चित्त शकुन्तला की ओर आकृष्ट हो गया। इसी बीच दुर्जय दानवों के आक्रमण को विफल करने के निमित्त इन्द्र के आह्वान पर मातलि द्वारा उपस्थापित उनके रथ पर सवार हो स्वर्ग जाकर दानवों के पराजय के बाद सत्कृत हो लौटते समय मरीचिनन्दन महर्षि कश्यप के आश्रम जाता है। वहाँ उसने पहले शेर के बच्चों से खेलते हुए सर्वदमन को देखा बाद शकुन्तला से उसका मिलन हुआ। पति-पत्नी के मिलन के पूर्व पुत्र के दर्शन ने उसे दृढ कर दिया। पुत्र, पिता और माता के बीच जो प्रेम की ग्रन्थि होता है उसे कवि ने नाटक में बड़ी कुशलता से दर्शाया है। जिसकी चर्चा मूल महाभारत में नहीं है। उसे कवि ने अपनी कल्पना के बल से बहुत ही रोचक उपादेय, ग्राह्य एवं बुद्धिगम्य बना दिया है। और भी, वृद्धा गौतमी, राजपुरोहित, विदूषक, वैखानस। सेनापति आदि की चर्चा महाभारत में नहीं है, किन्तु कवि ने नाटक में इनकी उद्भावना कर इस नाटक अभिज्ञान शाकुन्तल को संसार में अनूठा बना दिया है। मूलकथा को रोचक बनाने के लिए कविर कालिदास ने अपनी अद्भुत मौलिक कल्पना से और कई बातें उसमें जोड़ दी हैं।

षष्ठ अङ्क में धीवर तथा राष्ट्रिय के दृश्य सन्निवेश में अंगूठी वाला प्रसंग अत्यन्त निपुणता के साथ प्रस्तुत किया गया है। शाप तथा अंगूठी की घटनाओं से वह मनो-वैज्ञानिक कड़ी उपस्थित की गई है, जो वर्तमान को अतीत से जोड़ती है एवं मानवीय जीवन को सफल बनाने का एक स्तुत्य साधन है।

दुर्वासा का शाप राजा दुष्यन्त को कलङ्क से बचाता है। प्रियम्वदा और अनसूया की उपस्थिति दुष्यन्त शकुन्तला के प्रथम मिलन के समय बातचीत के प्रसंग को सरस बनाती है। अंगूठी का वृत्तान्त इस कथा की जान है। विदूषक बीच-बीच में हास्य रस का पुट देकर प्रसंगों को ताजा बना देता है। मातलि का विदूषक पर आक्रमण राजा की चित्तवृत्ति को बदलता है। तिरस्कृत शकुन्तला के विरह में राजा उद्विग्न एवं उदासीन था, शायद उस अवस्था में वह इन्द्र का मनोरथ पूरा न कर पाता। अतः उसे क्रोध उत्पन्न करना आवश्यक था। जिसे अन्त में मातलि ने स्वयं स्पष्ट कर दिया है। इस प्रकार नाटक के निर्माता कविकालिदास ने अपनी अद्भुत कल्पना की उद्भावना से इसे लोकोत्तर चमत्कृत