भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 540 में से

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बनाकर इस नाटक के अपूर्ण अङ्ग को पूरा कर दिया है। और नई-नई उद्भावनाओं और नाटकीय तत्त्वों से अपने नाटक में असीम चारुता ला दी है। महाभारत और अभिज्ञान-शाकुन्तल इन दोनों की कथाओं में मुख्य अन्तर इस प्रकार है—

महाभारत मेंनाटक में
१. महर्षि कण्व उस समय फल लेने वन में गये हुए थे जब दुष्यन्त उनके आश्रम में प्रविष्ट होते हैं।१. वे शकुन्तला के प्रतिकूल ग्रहों की शान्ति करने के निमित्त सोमतीर्थ गये हुए थे।
२. उक्त सूचना स्वयं शकुन्तला राजा को देती है।२. उक्त सूचना राजा को वैखानस देता है।
३. शकुन्तला अपना जन्मवृत्तान्त स्वयं बताती है।३. सखी अनसूया शकुन्तला का जन्म वृत्तान्त राजा दुष्यन्त से बताती है।
४. शकुन्तला शर्त के साथ विवाह के लिए राजी हो जाती है।४. शर्त को निकृष्ट समझकर सखियों के वार्तालाप, परस्पर दर्शन, पारस्परिक अनुराग पत्रलेखन के अनन्तर गान्धर्व विवाह होता है।
५. कण्व के डर से राजा राजधानी चल देते हैं।५. राजधानी जाने का कारण नहीं निर्दिष्ट है।
६. कण्व के आश्रम पर ही शकुन्तला पुत्र को जन्म देती है।६. मरीचिनन्दन कश्यप के आश्रम में पुत्र पैदा होता है।
७. ९ वर्ष के बाद सर्वदमन को लेकर शकुन्तला राजा के दरबार में जाती है।७. गर्भवती अवस्था में ही राजा के पास पहुँचती है।
८. वह राजा से अनुनय विनय करती है कि आप बालक को युवराज बना लें।८. युवराज बनाने की प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि अभी पुत्र हुआ भी नहीं है वह अभी गर्भवती है।
९. लोकापवाद के भय से राजा शकुन्तला को नहीं पहचानता।९. दुर्वासा के शाप के कारण ब्याह का स्मरण न होने से राजा शकुन्तला को त्याग कर देता है, धीवर द्वारा अंगूठी प्राप्त होने पर पत्नी के परित्याग के कारण पश्चात्ताप करता है।
१०. शकुन्तला कण्वाश्रम की ओर लौटती है।१०. शार्ङ्गरव, शारद्वत तथा गौतमी के चले जाने पर जब पुरोहित के पीछे-पीछे शकुन्तला रोती हुई जाती है, तो दिव्य ज्योति बनकर मेनका उसे लेकर कश्यप के आश्रम पर पहुँचा देती है।
११. आकाशवाणी पर विश्वास करके नागरिकों के समक्ष राजा शकुन्तला को स्वीकार करता है।११. इन्द्र के बुलाने पर राजा असुरों को मारने के लिए स्वर्ग जाता है वहाँ से लौटते समय कश्यप के आश्रम पर पुत्र और पत्नी को प्राप्त कर वह प्रसन्नता से राजधानी में आता है।