भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 540 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 379

षष्ठोऽङ्कः । २९७

तुमं सि मए चूदंकुर दिण्णो कामस्स गहीदधणुअस्स ।
पहिअजणजुवइलक्खो पंचब्भहिओ सरो होहि ॥ ३ ॥
[ त्वमसि मया चूताङ्कुर दत्तः कामाय गृहीतधनुषे ।
पथिकजनयुवतिलक्ष्यः पञ्चाभ्यधिकः शरो भव ॥ ]
( इति चूताङ्कुरं क्षिपति )

हस्तकः तं कपोतहस्तकम् कपोतहस्तकशब्दः पारिभाषिकशब्दः करतलयोः सर्वाङ्गश्लेषे वर्तते कपोतहस्तकं यथासङ्गीतरत्नाकरे—

कपोतोऽसौ करो यत्र श्लिष्टमूलाग्रपार्श्वकः ।
प्रणामे गुरुसंभाषे……………… ॥

नाट्यशास्त्रे च भरतमुनिः—

उभाभ्यामपि हस्ताभ्यामन्योऽन्यं पार्श्वसङ्ग्रहात् ।
हस्तः कपोतको नाम……………… ॥

एष विनयाभ्युपगमे, प्रणामकरणे, गुरोश्च सम्भाषे प्रयुज्यते । कपोतहस्तकं कृत्वा = प्रणामाञ्जलिं बद्ध्वा नमो भगवते मकरध्वजाय इत्युक्त्वा च—त्वमसीति ।

अन्वयः—हे चूताङ्कुर गृहीतधनुषे कामाय त्वं मया दत्तः असि । पथिकजनयुवति-लक्ष्यः पञ्चाभ्यधिकः शरो भव ।

अभिनवे वसन्तावतारसमये परभृतिका नाम चेटी मदनमुद्दिश्य आम्रमञ्जरीं समर्पयन्ती कामदेवार्चनमन्त्रगाथां पठति —त्वमसि मयेति । हे चूताङ्कुर ! = हे सहकारप्रसव ! आम्रमञ्जरि ! गृहीतं = आत्तं धनुः = शरासनं येनासौ तस्मै गृहीतधनुषे = धनुर्धराय मानिनीमानभञ्जनसन्नाहशालिने कामाय = मदनाय त्वं मया = चेट्या दत्तः = समर्पितः असि । पथिकजनानां = विरहिणां या युवतयः = तरुण्यो भार्याः ता एव लक्ष्यं = शरव्यम् यस्य सः पथिकजनयुवतिलक्ष्यः=पान्थस्त्रीहृदयकर्तनः पञ्चभ्यः अरविन्दादिभ्यः पञ्चभ्यः


कपोतहस्तक = कबूतर की तरह बनाया गया हाथ । हाथ जोड़ने की यह कला है । दोनों हाथों की पांचों अंगुलियों के छोर एक दूसरे से मिले हों, हथेली का मध्य भाग दूर रखकर मूल मिला दिया जाता है, यह है हाथों का कपोताकार बनाना । संगीतरत्नाकर के अनुसार करकपोत तत्र होता है जब आगे और पीछे के करभाग जुड़े हों, यह प्रणाम और गुरु-संभाषण के समय करना चाहिए ।

हे आम्रमञ्जरी ! मैंने तुम्हें धनुर्धारी कामदेव को अर्पित कर दिया है । पथिक परदेश गये हुए व्यक्तियों की युवती स्त्रियों के हृदयों को तथा कुपित मानिनी नायिकाओं के हृदयों को बेधने वाले काम के पांचों बाणों में सब से श्रेष्ठ बाण बन जाओ ॥ ३ ॥

( इसके बाद आम्र की बौर फेंक देती है । )

विशेषगृहीतधनुषे इस विशेषण से प्रतीत होता है कि वसन्त ऋतु में कामदेव धनुष धारण किये रहता है । वनिता से वियोगी व्यक्ति को वसन्त ऋतु में अपनी प्रियतमा का स्मरण विशेषरूप से होत रहता है और काम के बाण उसे पीडित करते रहते हैं उनका लक्ष्य उस समय केवल बिरहणी स्त्रियाँ रहती हैं । आम का अंकुर देखकर कामिनियों का मान भंग हो जाता है । कवियों ने कामदेव को पञ्चसायक कहा है, क्योंकि उसके पांच ही बाण हैं वे सभी बाण पुष्प के हैं ।

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 379, कुल 540 में से · BharatKosha