भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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३७० | अभिज्ञानशाकुन्तलम्

शैलानामवरोहतीव शिखरादुन्मज्जतां मेदिनी पर्णस्वान्तरलीनतां विजहति स्कन्धोदयात्पादपाः । संतानैस्तनुभावनष्टसलिला व्यक्तिं भजन्त्यापगाः केनाप्युत्क्षिपतेव पश्य भुवनं मत्पार्श्वमानीयते ॥ ८ ॥

अन्वयः—पश्य मेदिनी उन्मज्जतां शैलानां शिखरात् अवरोहतीव, पादपाः स्कन्धोदयात् पर्णस्वान्तर्लीनतां विजहति, तनुभावनष्टसलिला अपगाः सन्तानैः व्यक्तिं भजन्ति, भुवनमुत्क्षिपता केनापि मत्पार्श्वमानीयते ।

अधोऽवलोकयन् भूलोकस्याश्चर्यदर्शनत्वं समर्थयन् राजा देवराजसारथि मातलिं ब्रवीति—शैलानामिति । पश्य = साश्चर्यमवलोकय मेदिनी = पृथिवी उन्मज्जतां = सहसोत्प्लुत्य प्रकटी भवताम् क्रमशः स्पष्टं दृश्यमानानां शैलानां = महागिरीणां शिखरात् = अग्रभागात् शृङ्गात् अवरोहतीव = अवतरतीव, अधो गच्छतीव, नहि शैला उन्मज्जन्ति, नापि पृथ्‍वी अवरोहति, किन्तु वेगात् शैलानामुन्मज्जनं, मेदिन्याश्चावरोहणं द्वयमेतत् आश्चर्यं दृश्यते पूर्वं तु दूरतया पर्वतशिखरलग्नेव भूरलक्षिता, इदानीं तु सान्निध्यात् पर्वतमेदिन्योः शनैः शनैः दूरीभावो ज्ञायते इति भावः । पादपाः = वृक्षाः स्कन्धोदयात् — स्कन्धानां = प्रकाण्डानाम् उदयात् = प्राकट्यात्, आविर्भावात् पर्णस्वान्तर्लीनतां-पर्णानाम् = पत्राणां सु = अतिशयेन यदन्तरं = मध्यं तत्र लीनतां = तदाकारताम् पृथगनुपलब्धिम् विजहति = त्यजति प्रकटी भवन्तीत्यर्थः, पूर्वं पत्रपुञ्जमात्ररूपेण दृष्टास्तरवः साम्प्रतं काण्डादिमन्तो दृश्यन्ते इति तात्पर्यम् एतच्चाश्चर्यं वेगात् जातम् । तनुभावनष्टसलिलाः—तनुभावेन = क्षीणतया नष्टानि = अलक्षितानि सलिलानि = जलानि यासां ताः तनुभावनष्टसलिलाः = तनुभावेन नष्टसलिलेन च प्रतीयमाना इत्यर्थः । अपगाः = नद्यः सन्तानैः = विस्तारैः ‘सन्तानो विस्तृत्तौ देववृक्षे चापत्तिगोत्रयोः’ इति धरणिः । व्यक्ति = प्रकटतां भजन्ति =


यह पृथ्वीमण्डल हिमालय आदि पर्वतों के शिखरों से नीचे उतरता हुआ सा प्रतीत हो रहा है । वृक्ष भी जो पहले पत्तों से छिपे हुए से मालूम पड़ते थे, वे अब धीरे-धीरे दिखाई देने से पत्तों से निकलते हुए से प्रतीत हो रहे हैं । ये नदियाँ भी जो पहले, जहाँ-जहाँ उनके प्रवाह में जल कुछ कम था, वहाँ बीच-बीच में खण्डित सी मालूम होती थीं, वे ही अब धीरे-धीरे कम जलवाले प्रवाह भाग के स्पष्ट हो जाने से अखण्डित एवं जुड़ी-सी मालूम हो रही हैं । देखिए यह भूलोक भी मानो किसी के द्वारा नीचे से ऊपर की ओर जोर से उछाला जाकर गेंद की तरह हमारे पास दौड़ा चला आ रहा है ॥ ८ ॥

विशेष—इसका तात्पर्य यह है कि आकाश से नीचे उतरते समय पहले पर्वतों के शिखर ही दिखाई देते हैं पीछे धीरे-धीरे पृथ्वी दिखाई देती है । अतः ऐसा प्रतीत होता है कि मानो पृथ्वी पर्वत के शिखरों से ही धीरे धीरे नीचे उतर रही है । इसी प्रकार पहले वृक्षों की पत्तियाँ दिखाई पड़ती हैं, पुनः पेड़, शाखा-प्रशाखा आदि दिखाई देते हैं । नदियाँ भी पहले खण्डित-सी मालूम पड़ती हैं, क्योंकि जहाँ नदियों का पाट चौड़ा है, वहाँ जल ज्यादा है । अत वही भाग पहले दिखाई पड़ता है और कम जलवाला भाग पहले नहीं दीख पड़ता है । इसलिए नदियां पहले टूटी सी मालूम पड़ती हैं और पीछे पास आने से जुड़ी हुई सी मालूम होने लगती हैं । ज्यों-ज्यों रथ नीचे उतरता है त्यों त्यों भूमण्डल भी मानो ऊपर की ओर गेंद के समान उछलता हुआ पास आ रहा प्रतीत होता है ।