अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 507, कुल 540 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽङ्कः ४२५
( इति निष्क्रान्ताः सर्वे )
( सप्तमोऽङ्कः )
समाप्तमिदमभिज्ञानशाकुन्तलं नाम नाटकम् ।
सरसाः कविताश्च सहृदयानां हृदयेषु चमत्कारं जनयित्वा विशिष्टसम्मानं लभन्ताम्, सर्वशक्तिशाली पार्वतीपतिः परमेश्वरश्च जन्मान्तरं निरस्य शाश्वतं पदं दिशत्विति शम् । अत्र समुच्चयालङ्कारः रुचिरा वृत्तञ्चास्ति ॥ ३५ ॥
इति कविवरकालिदासप्रणीतस्याभिज्ञानशाकुन्तलनामकनाटकस्य सप्तमेऽङ्के पं० श्रीकृष्णमणित्रिपाठिना संस्कृते कृता विमलाख्या व्याख्या समाप्ता ।
इत्थं समाप्तमिदमभिज्ञानशाकुन्तलं नाम नाटकम् ।
पुराणों ने अनुसार अमृत पानकर अमर होने के निमित्त देवता एवं दानवों द्वारा किये गये समुद्रमन्थन के अवसर पर अमृत निकलने के पूर्व निर्गत विष से चराचर जगत् को उसके शमन के लिए देवता तथा दानवों की प्रार्थना पर दयालु भगवान् शङ्कर ने विषपान कर लिया था। तदनुसार शिवजी के गले में अटके हुए उस हलाहल विष से उनका कण्ठ काला पड़ गया और उनकी जटा लाल हो गई। इसलिए वे परम कृपालु शिवजी नीललोहित कहे जाते हैं।
ततः करतलीकृत्य व्यापि हालाहलं विषम् ।
अभक्षयन् महादेवः कृपया भूतभावनः ॥ ( ८।७।४२ )
यस्यापि दर्शयामास स्ववीर्यं जलकल्मषः ।
यच्चकार गले नीलं तच्च साधो विभूषणम् ॥ ( ८।७।४३ )
इस प्रकार कविवर कालिदास द्वारा प्रणीत अभिज्ञानशाकुन्तल नामक नाटक में सप्तम अङ्क पर पं० श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा की गयी राष्ट्रभाषा हिन्दी में सुधा नामक व्याख्या समाप्त ।
अभिज्ञानशाकुन्तल नामक नाटक समाप्त ।