भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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४२४ अभिज्ञानशाकुन्तलम्

प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिवः सरस्वती श्रुतिमहतां महीयसाम्¹। ममापि च क्षपयतु नीललोहितः पुनर्भवं ²परिगतशक्तिरात्मभूः ॥ ३५ ॥

**अन्वयः—**पार्थिवः प्रकृतिहिताय प्रवर्तताम् । श्रुतिमहतां सरस्वती महीयताम् । परिगतशक्तिः आत्मभूः नीललोहितः ममापि च पुनर्भवं क्षपयतु ॥ ३४ ॥

महर्षेः कश्यपस्य प्रभावात् सफलमनोरथोऽपि राजा दुष्यन्तो पुनरपि प्रियं प्रार्थयते—**प्रवर्ततामिति—**पार्थिवः-पृथिव्यामीश्वरः पार्थिवः = क्षितिपतिः प्रकृतिहिताय प्रकृतिः = प्रजा तस्याः हिताय = कल्याणाय श्रेयसे प्रवर्तताम् = प्रवृत्तो भवतु श्रुतिमहतां = श्रुत्या वेदज्ञानेन शास्त्रश्रवणेन वा महतां = वरिष्ठानां सरस्वती = वाणी यद्वा श्रुतिमहता = श्रोत्रेन्द्रियपूजिता, चमत्कारिणी सरस्वती = कविवाणी, महीयताम् = उत्कृष्टं गौरवं लभताम् यद्वा श्रुतिमहता = वेदवर्णिता सरस्वती = भगवती शारदा न हीयताम् = नाल्पसारा भवतु ! परिगतशक्तिः परिगता = मिलिता, नित्यसमवायिनी शक्तिः शिवा, यस्य स परिगतशक्तिः यद्वा परितः = सर्वतः गताः = व्याप्ताः शक्तयो यस्यासौ परिगतशक्तिः = सर्वशक्तिसम्पन्नः आत्मभूः-आत्मना = स्वयं भवतीत्यात्मभूः = स्वयम्प्रकाशः नीललोहितः-वामे नीलः दक्षिणे लोहितः इति नीललोहितः = भगवान् सदाशिवः ममापि = सूत्रधारस्य कवे-र्कालिदासस्य च पुनर्भवं = पुनर्जन्म, जन्मान्तरं नाशयतु !

**अयं भावः—**दयासिन्धो महर्षे ! भवदीयानुग्रहादहं सफलाभिलाष सम्पन्नः नातः परं किमपि प्रार्थनीयमस्ति । तथापि यदि भवान् प्रियं चिकीर्षति तर्हीदमस्तु—समस्ताः पृथिवीपतयः स्वसुखनिरपेक्षः सन्तः प्रजानामेव श्रेयसे सर्वदा प्रवर्तन्ताम्, महाकवीनां

राजा लोग प्रजा के हित कार्यों में हमेशा लगे रहें, चारों वेदों में गीयमान कीर्ति भगवती सरस्वती जगत् में पूजा को प्राप्त हों, या वैदिक वाङ्मय में प्रशंसित महान् कवियों की वाणी गौरव-मण्डित हो। और सर्वशक्तिमान् स्वयम्भू भगवान् सदाशिव मेरे पुनर्जन्म को = जन्मांतर प्राप्ति को समाप्त करें। अर्थात् भगवान् शिव की कृपा से मेरा जन्म-मरणरूप भवबन्धन हमेशा के लिए छूट जाय।

**विशेष—**नाटक के आदि और अन्त में मङ्गलाचरण प्रशस्त माना गया है। तदनुसार इस नाटक के आदि में नान्दी और अन्त में भरतवाक्य मंगल के रूप में प्रयुक्त है।

नाटकों के भरतवाक्यों में प्राणिमात्र की भलाई की कामना निहित रहती है। नाटकों में अन्तिम श्लोक जो प्रशस्ति के रूप में आता है, उसे भरतवाक्य कहते हैं। भरत नट को कहते हैं, नाटक के अन्त में समस्त अभिनेता एक साथ जो मङ्गलकामना करते हैं, उसे भरतवाक्य कहते हैं या नट लोग नाट्यशास्त्र के प्रवर्तक आचार्य भरतमुनि के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के निमित्त अपने वाक्य को भरतवाक्य कहते हैं।

इस भरतवाक्य में श्रुतिमहती शब्द के दो अर्थ हैं—एक वेदों में प्रतिपादित महत्त्वशाली संस्कृत विद्या तथा दूसरा अर्थ वैदिक वाङ्मय में स्थित समृद्ध संस्कार विद्या तथा आत्मभू शब्द का तात्पर्य है—बिना किसी तत्त्व अथवा बिना किसी की सहायता के स्वयं अपनी इच्छा से जन्म धारण करने वाले। अतः आत्मभू शब्द कभी ब्रह्मा जी के लिए, कभी विष्णु के लिए और कभी शिव के लिए आवश्यकतानुसार प्रयुक्त होता रहता है। प्रकृत में आत्मभू शब्द का अर्थ है अनादिदेव भगवान् शिव जी।


पाठा०—१. महीयताम् ।
२. परिगतभक्तिरात्मभूः