अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 515, कुल 540 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्टम्
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जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान् पिशेल साहब ने कठपुतली के नाच से नाटकों की उत्पत्ति मानी है। कठपुतली के नाच में व्यवस्थापक नचानेवाला सूत्र (डोरी) पकड़कर पुतलियों को नचाता है। इस आधार पर उसे सूत्रधार कहते हैं। शारदा-तनय के अनुसार वह कथावस्तु, नायक, रस आदि का सूत्र अर्थात् संक्षेप में वर्णन करता है अतः उसे सूत्रधार कहते हैं—
सूत्रयन् काव्यनिक्षिप्तवस्तुनेतृकथारसान् । नान्दीश्लोकेन नान्द्यन्ते सूत्रधार इति स्मृतः ॥
इस प्रकार सूत्रधार रंगमञ्च का प्रधान अधिकारी और व्यवस्थापक ही नहीं होता है अपितु वह रंगमञ्च को सजाने की कला में भी प्रवीण होता है। वह नाटक के नायक, कवि और कथावस्तु के गुणों का संक्षेप में वर्णन करता है—
आसूत्रयन् गुणान् नेतुः कवेरपि च वस्तुनः । रंगप्रसाधनप्रौढः सूत्रधार इहोदितः ॥
प्रस्तावना—जिसमें नाटक की कथावस्तु को प्रस्तुत किया जाय, उसे प्रस्तावना या आमुख कहते हैं। जैसे—
नटी विदूषको वापि पारिपार्श्वक एव वा सूत्रधारेण सहिताः संलापं यत्र कुर्वते । चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिय । आमुखं तत्त विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनाऽपि सा ॥
अर्थात् नाटक का वह भाग जिसमें नाटक प्रारम्भ होने के पहले नटी विदूषक या पारिपार्श्वक अपने प्रस्तुत कार्य के सम्बन्ध में सुन्दर एवं रोचक शब्दों में सूत्रधार के साथ वार्तालाप करते हैं उसे आमुख या प्रस्तावना कहते हैं। इसमें विचित्र उक्तियों के द्वारा वार्तालाप होता है तथा बड़े कौशल से नाटक आरम्भ होता है—
सूत्रधारो नटीं ब्रूते मारिषं वा विदूषकम् । स्वकार्यं प्रस्तुताक्षेपि चित्रोक्त्या यत्तदामुखम् ॥
प्रयोगातिशय—यदि किसी एक ही प्रयोग में अन्य प्रयोग आरम्भ हो जाय और उसी के द्वारा पात्र का प्रवेश कराया जाय तो उसे प्रयोगातिशय कहते हैं। जैसे—
यदि प्रयोग एकस्मिन् प्रयोगोऽन्यः प्रयुज्यते । तेन पात्रप्रवेशश्चेत् प्रयोगातिशयस्तदा ॥
प्रयोगातिशय प्रस्तावना का ही एक भेद है।
विष्कम्भक—विष्कम्भक नाटक के किसी भी अङ्क के आदि में आने वाला वह भाग है, जिसमें मध्यम श्रेणी के दो पात्रों द्वारा पारस्परिक वार्तालाप में बीती हुई या आने-वाली नाटकीय कथा वस्तु से सम्बद्ध घटनाओं की सूचना दी जाती है।
विष्कम्भक दो प्रकार का होता है, एक शुद्ध विष्कम्भक दूसरा सङ्कीर्ण विष्कम्भक शुद्ध विष्कम्भक उसे कहते हैं, जिसमें एक या दो पात्र माध्यमश्रेणी के हों और संस्कृत भाषा का ही प्रयोग करते हों। सङ्कीर्ण विष्कम्भक वह होता है जिसमें
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