भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 540 में से

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नाट्यशास्त्र के कुछ पारिभाषिक शब्द

**नान्दी—**नाटक के आरम्भ में जिस पद्य के द्वारा देवता राजा आदि का अभिनन्दन किया जाय, उसे नान्दी कहते हैं—नन्द्यन्ते = स्तूयन्ते देवतादयो यस्यामिति नान्दी। साहित्यदर्पण में विश्वनाथ भट्टाचार्य ने नान्दी की परिभाषा इस प्रकार की है—

आशीर्वचनसंयुक्ता स्तुतिर्यस्मात् प्रयुज्यते।
देवद्विजनृपादीनां तस्मान्नान्दीति संज्ञिता ॥ ६।२४

अर्थात् ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति के लिए आशीर्वादात्मक वाक्यों से युक्त नाटक के आरम्भ में की गई देवता, ब्राह्मण, नृप आदि की माङ्गलिक प्रार्थना को नान्दी कहा जाता है। इस नान्दी के लिए अपेक्षित है कि इसके द्वारा शङ्ख, चन्द्र, पद्म, चक्रवाक, कैरव आदि मङ्गलास्पद वस्तुओं की अभिव्यञ्जना हो जाय। नान्दी चतुष्पदा, अष्टपदा तथा द्वादशपदा भी होती है। जैसे —

माङ्गल्यशङ्खचन्द्राब्ज कोककैरवशंसीनी ।
पदैर्युक्ताद्वादशभिरष्टाभिर्वा पदैरुत ॥ सा० द० ६।२५

भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में कहा है कि—

देवद्विजनृपादीनामाशीर्वादपरायणा ।
नन्दन्ति देवता यस्मात्तस्मान्नान्दीति संज्ञिता ॥

काव्यप्रदीप में लिखा है कि—

नन्दन्ति काव्यानि कवीन्द्रवर्गाः कुशालवाः पारिषदश्च सन्तः।
यस्मादलं सज्जन सिन्धुहंसी तस्मादियं सा कथितेव नान्दी ॥

**सूत्रधार:—**नाटक का वह प्रधान नट जो नाटकीय कथा वस्तु के भिन्न-भिन्न उपकरणों के सूत्र को सम्भाले रहता है, उसे सूत्रधार कहते हैं—सूत्रं धारयतीति सूत्रधारः। जैसे—

नाट्योपकरणादीनि सूत्रमित्यभिधीयते।
सूत्रं धारयतीत्यर्थे सूत्रधारो निगद्यते ॥

अर्थात् नाट्य के विभिन्न उपकरणों को सूत्र कहते हैं और जो पात्र उन्हें सँभालना है उसे सूत्रधार कहते हैं। सूत्रधार की अन्य सरल एवं संक्षिप्त परिभाषा यह है कि प्रधान नट विशेष को सूत्रधार कहते हैं जो सर्वप्रथम रंगमञ्च पर आकर वर्णनीय कथावस्तु की सूचना देता है।

वर्णनीयं कथासूत्रं प्रथमं येन सूच्यते।
रंगभूमि समासाद्य सूत्रधारः स उच्यते ॥

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