अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
नाट्यशास्त्र के कुछ पारिभाषिक शब्द
**नान्दी—**नाटक के आरम्भ में जिस पद्य के द्वारा देवता राजा आदि का अभिनन्दन किया जाय, उसे नान्दी कहते हैं—नन्द्यन्ते = स्तूयन्ते देवतादयो यस्यामिति नान्दी। साहित्यदर्पण में विश्वनाथ भट्टाचार्य ने नान्दी की परिभाषा इस प्रकार की है—
आशीर्वचनसंयुक्ता स्तुतिर्यस्मात् प्रयुज्यते।
देवद्विजनृपादीनां तस्मान्नान्दीति संज्ञिता ॥ ६।२४
अर्थात् ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति के लिए आशीर्वादात्मक वाक्यों से युक्त नाटक के आरम्भ में की गई देवता, ब्राह्मण, नृप आदि की माङ्गलिक प्रार्थना को नान्दी कहा जाता है। इस नान्दी के लिए अपेक्षित है कि इसके द्वारा शङ्ख, चन्द्र, पद्म, चक्रवाक, कैरव आदि मङ्गलास्पद वस्तुओं की अभिव्यञ्जना हो जाय। नान्दी चतुष्पदा, अष्टपदा तथा द्वादशपदा भी होती है। जैसे —
माङ्गल्यशङ्खचन्द्राब्ज कोककैरवशंसीनी ।
पदैर्युक्ताद्वादशभिरष्टाभिर्वा पदैरुत ॥ सा० द० ६।२५
भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में कहा है कि—
देवद्विजनृपादीनामाशीर्वादपरायणा ।
नन्दन्ति देवता यस्मात्तस्मान्नान्दीति संज्ञिता ॥
काव्यप्रदीप में लिखा है कि—
नन्दन्ति काव्यानि कवीन्द्रवर्गाः कुशालवाः पारिषदश्च सन्तः।
यस्मादलं सज्जन सिन्धुहंसी तस्मादियं सा कथितेव नान्दी ॥
**सूत्रधार:—**नाटक का वह प्रधान नट जो नाटकीय कथा वस्तु के भिन्न-भिन्न उपकरणों के सूत्र को सम्भाले रहता है, उसे सूत्रधार कहते हैं—सूत्रं धारयतीति सूत्रधारः। जैसे—
नाट्योपकरणादीनि सूत्रमित्यभिधीयते।
सूत्रं धारयतीत्यर्थे सूत्रधारो निगद्यते ॥
अर्थात् नाट्य के विभिन्न उपकरणों को सूत्र कहते हैं और जो पात्र उन्हें सँभालना है उसे सूत्रधार कहते हैं। सूत्रधार की अन्य सरल एवं संक्षिप्त परिभाषा यह है कि प्रधान नट विशेष को सूत्रधार कहते हैं जो सर्वप्रथम रंगमञ्च पर आकर वर्णनीय कथावस्तु की सूचना देता है।
वर्णनीयं कथासूत्रं प्रथमं येन सूच्यते।
रंगभूमि समासाद्य सूत्रधारः स उच्यते ॥
परिशिष्टम्
४३३
जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान् पिशेल साहब ने कठपुतली के नाच से नाटकों की उत्पत्ति मानी है। कठपुतली के नाच में व्यवस्थापक नचानेवाला सूत्र (डोरी) पकड़कर पुतलियों को नचाता है। इस आधार पर उसे सूत्रधार कहते हैं। शारदा-तनय के अनुसार वह कथावस्तु, नायक, रस आदि का सूत्र अर्थात् संक्षेप में वर्णन करता है अतः उसे सूत्रधार कहते हैं—
सूत्रयन् काव्यनिक्षिप्तवस्तुनेतृकथारसान् । नान्दीश्लोकेन नान्द्यन्ते सूत्रधार इति स्मृतः ॥
इस प्रकार सूत्रधार रंगमञ्च का प्रधान अधिकारी और व्यवस्थापक ही नहीं होता है अपितु वह रंगमञ्च को सजाने की कला में भी प्रवीण होता है। वह नाटक के नायक, कवि और कथावस्तु के गुणों का संक्षेप में वर्णन करता है—
आसूत्रयन् गुणान् नेतुः कवेरपि च वस्तुनः । रंगप्रसाधनप्रौढः सूत्रधार इहोदितः ॥
प्रस्तावना—जिसमें नाटक की कथावस्तु को प्रस्तुत किया जाय, उसे प्रस्तावना या आमुख कहते हैं। जैसे—
नटी विदूषको वापि पारिपार्श्वक एव वा सूत्रधारेण सहिताः संलापं यत्र कुर्वते । चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिय । आमुखं तत्त विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनाऽपि सा ॥
अर्थात् नाटक का वह भाग जिसमें नाटक प्रारम्भ होने के पहले नटी विदूषक या पारिपार्श्वक अपने प्रस्तुत कार्य के सम्बन्ध में सुन्दर एवं रोचक शब्दों में सूत्रधार के साथ वार्तालाप करते हैं उसे आमुख या प्रस्तावना कहते हैं। इसमें विचित्र उक्तियों के द्वारा वार्तालाप होता है तथा बड़े कौशल से नाटक आरम्भ होता है—
सूत्रधारो नटीं ब्रूते मारिषं वा विदूषकम् । स्वकार्यं प्रस्तुताक्षेपि चित्रोक्त्या यत्तदामुखम् ॥
प्रयोगातिशय—यदि किसी एक ही प्रयोग में अन्य प्रयोग आरम्भ हो जाय और उसी के द्वारा पात्र का प्रवेश कराया जाय तो उसे प्रयोगातिशय कहते हैं। जैसे—
यदि प्रयोग एकस्मिन् प्रयोगोऽन्यः प्रयुज्यते । तेन पात्रप्रवेशश्चेत् प्रयोगातिशयस्तदा ॥
प्रयोगातिशय प्रस्तावना का ही एक भेद है।
विष्कम्भक—विष्कम्भक नाटक के किसी भी अङ्क के आदि में आने वाला वह भाग है, जिसमें मध्यम श्रेणी के दो पात्रों द्वारा पारस्परिक वार्तालाप में बीती हुई या आने-वाली नाटकीय कथा वस्तु से सम्बद्ध घटनाओं की सूचना दी जाती है।
विष्कम्भक दो प्रकार का होता है, एक शुद्ध विष्कम्भक दूसरा सङ्कीर्ण विष्कम्भक शुद्ध विष्कम्भक उसे कहते हैं, जिसमें एक या दो पात्र माध्यमश्रेणी के हों और संस्कृत भाषा का ही प्रयोग करते हों। सङ्कीर्ण विष्कम्भक वह होता है जिसमें
28 २८ शाकु०
४३४ | अभिज्ञानशाकुन्तलम्
एक पात्र मध्यम श्रेणी का हो तथा दूसरा निम्न श्रेणी का। इसमें प्राकृत तथा संस्कृत दोनों भाषाओं का प्रयोग होता है—
वृत्तवर्तिष्यमाणानां कथांशानां निदर्शकः ।
संक्षिप्तार्थस्तु विष्कम्भ आदावङ्कस्य दर्शितः ॥
मध्येन मध्यमाभ्यां वा पात्राभ्यां संप्रयोजितः ।
शुद्धः स्यात् स तु सङ्कीर्णो नीचमध्यप्रकल्पितः ॥
प्रवेशक—प्रवेशक भी विष्कम्भक के समान अतीत या भावी कथांशों का सूचक है। इसमें प्रयुक्त शक्ति उदात्त नहीं होती। इसकी भाषा सदा प्राकृत होती है और इसमें नीच पात्रों का प्रयोग होता है। प्रवेशक की योजना हमेशा दो अङ्कों के बीच में ही होती है यह भी शेष अर्थों का सूचक है—
प्रवेशकोऽनुदात्तोक्त्या नीचपात्रप्रयोजितः ।
अङ्कद्वयान्तर्विज्ञेयः शेषं विष्कम्भके यथा ॥
अङ्कावतार—कभी-कभी पात्रों द्वारा एक अङ्क के अन्त में अगले अङ्क के अभिनय का आभास मिलता है, जिसे अङ्कावतार कहते हैं—
अङ्कावतारस्त्वङ्कान्ते पातोऽङ्कस्याविभागतः ।
जिस अङ्क में अङ्कावतार होता है, उस में प्रवेशक तथा विष्कम्भक नहीं होते।
स्वगत—कभी-कभी रंगमञ्च का पात्र अपने मन की गुप्त बातों को प्रकाश में लाने के लिए दूसरी ओर मुँह फेरकर इस तरह बात करता है जिसको दर्शक तो सुन लेते हैं, पर रंगमञ्च के अन्य पात्र नहीं सुन पाते। स्वगत का प्रयोग कथा-वस्तु के उस भाग के लिए होता है जो किसी भी पात्र को नहीं सुनाया जाता। इससे पात्र विशेष के मानसिक भावों की झलक मिलती है। इस प्रकार स्वगत मन ही मन बोलना कहलाता है—
अश्राव्यं खलु यद्वस्तु तदिह स्वगतं मतम् ।
प्रकाश—प्रकाश सर्वश्राव्य नाटकीय कथावस्तु का वह भाग है, जिसका रंगमञ्च के सभी पात्रों को सुनाना अभीष्ट है। प्रकाश का वास्तविक अर्थ है प्रगट रूप में सुनाने के लिए जो बात कही जाय। धनञ्जय ने दशरूपक में प्रकाश और स्वगत का लक्षण इस प्रकार किया है—
सर्वश्राव्यं प्रकाशं स्यादश्राव्यं स्वगतं मतम् ।
जनान्तिक—जनान्तिक एक नाटकीय पारिभाषिक शब्द है, जो नियत व्यक्तियों को ही सुनाने के लिए प्रयुक्त होता है। इसका प्रयोग वहाँ होता है जहाँ पर कोई पात्र रंगमञ्च पर स्थित अन्य पात्रों से किसी बात को छिपाने के लिए एक ओर होकर किसी पात्र से शनैः शनैः बात करता है। इसकी परिभाषा दशरूपक में धनञ्जय ने इस प्रकार दी है—
त्रिपताकाकरेणान्यानपवार्यान्तरा कथाम् ।
अन्योऽन्यं मन्त्रणं यत् स्याज्जनान्ते तज्जनान्तिकम् ॥
परिशिष्टम्
४३५
अपवारितम्—अन्य व्यक्तियों की ओर मुँह फेर कर किसी पात्र विशेष के प्रति जो किसी गुप्त रहस्य का प्रकाशन किया जाता है उसे अपवारित कहते हैं। इसकी परिभाषा विश्वनाथ भट्टाचार्य ने अपने साहित्यदर्पण में इस प्रकार की है—
..............................तद्भवेदपवारितम् ।
रहस्यं तु यदन्यस्य परावृत्य प्रकाश्यते ॥
और नाट्यदर्पण में लिखा है कि जो बात पात्र विशेष से छिपाकर अन्य पात्रों से कही जाती है उसे अपवारित कहते हैं—
रहस्यं कथ्यतेऽन्यस्य परावृत्यापवारितम् ।
पूर्वरङ्ग—नाटकीय कला की अवतारणा से पहले नटवृन्द रङ्गभूमि के विघ्नों को दूर करने के निमित्त जो कुछ भी करते हैं उसे पूर्वरङ्ग कहते हैं। विश्वनाथ भट्टाचार्य ने साहित्यदर्पण के छठे परिच्छेद में पूर्वरङ्ग की परिभाषा इस प्रकार की है—
यन्नाट्यवस्तुनः पूर्वं रङ्गविघ्नोपशान्तये ।
कुशीलवाः प्रकुर्वन्ति पूर्वरङ्गः स उच्यते ॥
अङ्क—नाटक की पूरी घटनाओं के विकास को कई भागों में विभक्त कर देने पर प्रत्येक भाग को अङ्क कहते हैं। प्रत्येक अङ्क में नायक तथा नायिका आदि पात्रों के चरित्र का प्रदर्शन होता है और प्रत्येक अङ्क में एक ही रस की प्रधानता होती है—
अङ्क इति रूढशब्दो भावैश्च रसैश्च रोहयत्यर्थान् ।
नानाविधानयुक्तो यस्मात्तस्माद् भवेदङ्कः ॥
अर्थप्रकृतियाँ और सन्धियाँ—नाटक में प्रधान कथावस्तु नायक का कोई न कोई लक्ष्य होता है उसे ही फल कहते हैं। उस फल की सिद्धि के उपाय ही अर्थप्रकृतियाँ हैं। ये पाँच हैं, बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य। अर्थप्रकृतियों के साथ सम्बन्ध होने पर सन्धियों का उद्भव होता है सन्धियाँ भी पाँच होती हैं—मुखसन्धि, प्रतिमुखसन्धि, गर्भसन्धि, अवमर्ष-सन्धि तथा उपसंहार—
अर्थप्रकृतयः पञ्च पञ्चावस्थासमन्विताः ।
यथासंख्येन जायन्ते मुखाद्या पञ्चसन्धयः ॥
मुख-प्रतिमुखे गर्भः सावमर्शोपसंहृतिः ।
बिन्दु—जहाँ किसी दूसरी कथा से विच्छिन्न हो जाने पर इतिवृत्त को जोड़ने एवं आगे बढ़ाने में जो कारण होता है, वह बिन्दु कहलाता है। यह अच्छेद कारण बिन्दु वृत्त में आगे जाकर ठीक वैसे ही प्रसारित होता है जैसे तेल की बूँद पानी में फैल जाती है। इसीलिए इसे बिन्दु कहते है—
अवान्तरार्थविच्छेदे विन्दुरच्छेदकारणम् ।
बीज—नाटक के आरम्भ में सल्पकूप से सङ्केतित वह तत्त्व जो नाटक के फल के कारण है और इतिवृत्त में अनेक रूप से पल्लवित होता है, उसे बीज कहते हैं। अल्प रूप में निर्दिष्ट हेतु बीज वृत्त के फल का साधक है और वृक्ष के बीज के समान पल्लवित होकर अनेक शाखी वृक्ष की तरह वृक्ष के रूप में बढ़ता है—
४३६ अभिज्ञानशाकुन्तलम्
अल्पमात्रं समुद्दिष्टं बहुधा यद्विसर्पति ।
फलस्य प्रथमो हेतुर्बीजमित्यभिधीयते ॥
नायक— नाटक का नायक त्यागी, यशस्वी, उच्चकुल में उत्पन्न, रूपयौवन शोभासम्पन्न उत्साही, चतुर, प्रजाओं में अनुरागपूर्ण, तेजस्वी, वाक्चतुर और शीलवान् होता है। जैसे—
त्यागो कृती कुलीनः सुश्रीको रूपयौवनोत्साही ।
दक्षोऽनुरक्तलोकस्तेजो वैदग्ध्यशीलवान्नेता ॥
विदूषक— नाटक का विदूषक कुसुम, वसन्त आदि नामवाला होता है। वह अपने कार्य, शरीर, वेश, भाषा आदि के द्वारा हास्योत्पादक, कलहप्रेमी तथा स्वकर्मज्ञ मधुर भोजन आदि का इच्छुक होता है—
कुसुमवसन्ताद्यभिधः कर्मवपुर्वेशभाषाद्यैः ।
हास्यकरः कलहरतिर्विदूषकः स्यात् स्वकर्मज्ञः ॥
कञ्चुकी— कञ्चुकी उस कार्यकुशल व्यक्ति को कहते हैं, जो जाति से ब्राह्मण वृद्ध सर्वगुणसम्पन्न एवं कार्यकुशल हो। राजा के अन्तःपुर में नियुक्त प्रबन्धक कञ्चुक पहनता है। अतः उसे कञ्चुकी कहते हैं। भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में कञ्चुकी की यह परिभाषा दी है—
अन्तःपुरचरो वृद्धो विप्रो गुणगणान्वितः ।
सर्वकार्यार्थकुशलः कञ्चुकीत्यभिधीयते ॥
विश्वनाथ कविराज ने कहा है कि कञ्चुकी रनिवास का संरक्षक वह वृद्ध व्यक्ति होता है जो सत्यवादी कामदोषरहित, व्यवहार कुशल तथा विवेकशील पुरुष हो—
ये नित्यं सत्यसम्पन्नाः कामदोषविवर्जिताः ।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नाः कञ्चुकीयास्तु ते मताः ॥
कथावस्तु या इतिवृत्त— कथावस्तु या इतिवृत्त उसे कहते हैं, जो रूपकों का भेदक हो। कथावस्तु दो प्रकार की होती है (१) आधिकारिक (२) प्रासङ्गिक। आधिकारिक कथावस्तु मुख्य होती है तथा प्रासङ्गिक गौण, कहा भी है—
इत्याद्यशेषसित वस्तुविभेदजातं रामायणादि च विभाव्य बृहत्कथाञ्च ।
आसूत्रयेत्तदनु नेतृरसानुगुण्यां चित्रां कथामुचितचारु वचः प्रपञ्चे ॥
भरतवाक्यम्— भरतवाक्य संस्कृत साहित्य में नाटकों के अन्त में आने वाले इस पद्य के लिए प्रयुक्त होता है, जिसमें राष्ट्र की गौरवपूर्ण सर्वविध समृद्धि के निमित्त किसी नाटकीय पात्र के द्वारा सामाजिकों की शुभाशंसा की जाती है। नाट्यशास्त्र के प्रणेता भरतमुनि के प्रति सम्मान प्रदर्शनार्थ ही इस अन्तिम पद्य को भरतवाक्य कहा जाता है। अथवा नाटक के किसी नटविशेष भरत की उक्ति होने के कारण इसे भरतवाक्य कहते हैं।
श्लोकानुक्रमणिका
| अ | इ | ||
|---|---|---|---|
| अक्लिष्टबालतरु० | ६।२० | इतः प्रत्यादेशात् | ६।९ |
| अतः परीक्ष्य कर्तव्यं | ५।२४ | इदं किलाव्याजमनो० | १।१८ |
| अधरः किसलयरागः | १।२१ | इदमनन्यपरायण० | ३।१६ |
| अध्याक्रान्ता वसति० | २।१४ | इदमशिशिरै० | ३।१० |
| अनवरतधनुर्ज्या० | २।४ | इदमुपनतमेवं | ५।१९ |
| अनाघ्रातं पुष्पं | २।१० | इदमुपहितसूक्ष्म० | १।२९ |
| अनुकारिणि पूर्वेषां | २।१६ | ई | |
| अनुमतगमना | ४।९ | ईषदीषच्चुम्बितानि | १।४ |
| अनुयास्यन् मुनि० | १।२८ | उ | |
| अनेन कस्यापि | ७।१९ | उत्पक्ष्मणोर्नयनयो० | ४।१४ |
| अन्तर्गतप्रार्थनं० | ७।२ | उत्सृज्य कुसुम० | ३।१९ |
| अन्तर्हिते शशिनि | ४।३ | उदेति पूर्वं कुसुमं | ७।३० |
| अपरिक्षतकोमलस्य | ३।२१ | उद्गलितदर्भकवला | ४।११ |
| अभिजनवतो भर्तुः | ४।१८ | उन्नमितैभ्रूलत० | ३।१२ |
| अभिनवमधुलोलुपो | ५।१ | उपोढशब्दा न | ७।१० |
| अभिमुखे मयि संहृत० | २।११ | ए | |
| अभ्यक्तमिव स्नातः | ५।११ | एकैकमत्र दिवसे | ६।१२ |
| अभ्युन्नता पुरस्ताद० | ३।५ | एवमाश्रमविरुद्ध० | ७।१८ |
| अमी वेदिं परितः | ४।७ | एष त्वामभिनव० | ६।२७ |
| अयं स ते तिष्ठति | ३।११ | एषा कुसुमनिष्णा | ६।१९ |
| अयमरविवरेभ्यः | ७।७ | एषापि प्रियेण विना | ४।१५ |
| अर्थो हि कन्या | ४।२१ | औ | |
| अर्धपीतस्तनं मातुः | ७।१४ | औत्सुक्यमात्रमव० | ५।६ |
| असंशयं क्षत्रपरिग्रह० | १।२२ | क | |
| अस्मात्परं बत | ६।२५ | कथं नु तं बन्धुर० | ६।१३ |
| अस्मान् साधु | ४।१६ | कः पौरवे वसुमतीं | १।२४ |
| अहन्यहन्यात्मन | ६।२६ | का कथा बाण० | ३।१ |
| आ | कामं प्रत्यादिष्टां | ५।३१ | |
| आखण्डलसमो | ७।२८ | कामं प्रिया न सुलभा | २।१ |
| आचार इत्यवहितेन | ५।३ | कार्या सैकतलीन० | ६।१७ |
| आजन्मनः शाठ्य० | ५।२५ | का स्विद्वगुण्ठन० | ५।१३ |
| आताम्रहरितपाण्डुर | ६।२ | किं कृतकार्यद्वेषो | ५।१८ |
| आ परितोषाद् | १।२ | किं तावत् व्रतिना | ५।९ |
| आलक्ष्यदन्तमुकुलान् | ७।१७ | किं शीतलै क्लम० | ३।१८ |
| ४३८ | अभिज्ञानशाकुन्तलम् |
|---|
| कुतो धर्मक्रियाविघ्नः | ५।१४ | त्वन्मतिः केवला | ६।३२ |
| कुमुदान्येव शशाङ्कः | ५।२८ | त्वमर्हतां प्राग्रसरः | ५।१५ |
| कुल्याम्भोभिः पवन० | १।१५ | त्वमसि मया चूताङ्कुर | ६।३ |
| कृतं न कर्णार्पित० | ६।१८ | द | |
| कृताभिमर्शामनु० | ५।२० | दर्भाङ्कुरेण चरणः | २।१२ |
| कृता शरव्यं हरिणा | ६।२९ | दर्शनसुखमनुभवतः | ६।२१ |
| कृत्योर्भिन्नदेशत्वाद् | २।१७ | दिष्ट्या शकुन्तला | ७।२९ |
| कृष्णसारे ददच्चक्षु | १।६ | दुष्यन्तेनाहितं | ४।४ |
| क्व वयं क्व परोक्ष० | २।१८ | न | |
| क्षामक्षामकपोल० | ३।७ | न खलु न खलु | १।१० |
| क्षौमं केनचिदिन्दु० | ४।४ | न नमयितुमधिज्य० | २।३ |
| ग | नापेक्षितो गुरुजन | ५।१६ | |
| गच्छति पुरः शरीरं | १।३३ | नियमयसि विमार्ग० | ५।८ |
| गान्धर्वेण विवाहेन | ३।२० | नीवाराः शुकगर्भ० | १।१४ |
| गाहन्तां महिषा | २।६ | नैतच्चित्रं यदय० | २।१५ |
| ग्रीवाभङ्गाभिरामं | १।७ | प | |
| च | परिग्रहबहुत्वेऽपि | ३।१७ | |
| चलापाङ्गां दृष्टि | १।२३ | पातुं न प्रथमं | ४।८ |
| चित्रे निवेश्य | २।९ | पुत्रस्य ते रणशिर० | ७।२६ |
| चूतानां चिरनिर्गता | ६।४ | पृष्टा जनेन सम० | ३।८ |
| ज | प्रजाः प्रजाः स्वा इव | ५।५ | |
| जन्म यस्य पुरोर्वंशे | १।१२ | प्रजागरात् | ६।२२ |
| जाने तपसो वीर्यं | ३।२ | प्रत्यादिष्टविशेष० | ६।६ |
| ज्वलति चलितेन्धनो | ६।३१ | प्रथमं सारङ्गाक्ष्या | ६।७ |
| त | प्रथमोपकृतं मरुत्वतः | ७।१ | |
| तत्साधुकृतसन्धानं | १।११ | प्रलोभ्यवस्तुप्रणय० | ७।१६ |
| तदेषा भवतः कान्ता | ५।२६ | प्रवर्ततां प्रकृति० | ७।३५ |
| तपति तनुगात्रि | ३।१४ | प्राणानामनिलेन | ७।१२ |
| तव कुसुमशरत्वं | ३।३ | प्राहुर्द्वादिशधा | ७।२७ |
| तव न जाने हृदयं | ३।१३ | ब | |
| तव भवतु | ७।३४ | बल्मीकाग्रनिमग्न | ७।११ |
| तव सुचरित० | ६।११ | बाष्पेण प्रतिषिद्धेऽपि | ७।२३ |
| तवास्मि गीतरागे | १।५ | भ | |
| तस्याः पुष्पमयी | ३।२३ | भवनेषु रसाधिकेषु | ७।२० |
| तीव्राघातप्रतिहत० | १।२२ | भवन्ति नम्रास्तरवः | ५।१२ |
| तुरगखुरहत० | १।३१ | भव हृदय साभिलाषं | १।२७ |
| त्रिस्रोतसं वहति | ७।६ | भानुः सकृद्युक्त० | ५।४ |
श्लोकानुक्रमणिका
| भूत्वा चिराय | ४।१९ | वैखानसं किमनया | १।२६ |
| म | व्यपदेशमाविलयितुं | ५।२१ | |
| मनोरथाय नाशंसे | ७।१३ | श | |
| मय्येव विस्मरण० | ५।२३ | शक्यमरविन्दसुरभिः | ३।४ |
| महत्तस्तेजसो | ७।१५ | शमप्रधानेषु तपोधनेषु | २।७ |
| महाभागः कामं | ५।१० | शममेष्यति मम | ४।२० |
| मानुषीषु कथं वा | १।२५ | शान्तमिदमाश्रमपदं | १।१६ |
| मुक्तेषु रश्मिषु | १।८ | शापादसि प्रतिहता | ७।३२ |
| मुनिसुताप्रणय० | ६।८ | शुद्धान्तदुर्लभमिदं | १।१७ |
| मुहुरङ्गुलिसंवृता० | ३।२२ | शुश्रूषस्व गुरून् | ४।१७ |
| मूढः स्यामहमेषा वा | ५।२९ | शैलानामवरोहतीव | ७।८ |
| मेदश्छेदकृशोदरं | २।५ | स | |
| मोहान्मया सुतनु | ७।२५ | संकल्पितं प्रथममेव | ४।१२ |
| य | संदष्टकुसुमशयना० | ३।१५ | |
| यथा गजो नेति | ७।३१ | संरोपितेऽप्यात्मनि | ६।२४ |
| यदालोके सूक्ष्मं | १।९ | सख्यस्ते स किल | ६।३० |
| यदि यथा वदति | ५।२७ | सतीमपि ज्ञाति० | ५।१७ |
| यदुत्तिष्ठति वर्णेभ्यो | २।१३ | सरसिजमनुविद्धं | १।२० |
| यद्यत् साधु न | ६।१४ | सहजं किल | ६।१ |
| ययातेरिव शर्मिष्ठा | ४।६ | साक्षात् प्रियामुप० | ६।१६ |
| यस्य त्वया व्रण० | ४।१३ | सा निन्दन्ती | ५।३० |
| यात्येकतोऽस्तशिखरं | ४।२ | सायन्तने सवनकर्मणि | ३।२४ |
| या सृष्टिः स्रष्टुराद्या | १।१ | सिध्यन्ति कर्मसु | ७।४ |
| यास्यत्यद्य शकुन्तलेति | ४।५ | सुखपरस्य हरे० | ७।३ |
| येन येन वियुज्यन्ते | ६।२३ | सुतनु हृदयात् | ७।२४ |
| यो हनिष्यति | ६।२८ | सुभगसलिला० | १।३ |
| र | सुरयुवतिसंभवं | २।८ | |
| रथेनानुद्धात० | ७।३३ | स्तनन्यस्तोशीरं | ३।६ |
| रम्यं द्वेष्टि यथा | ६।५ | स्त्रीणामशिक्षित० | ५।२२ |
| रम्याणि वीक्ष्य | ५।२ | स्निग्धं वीक्षित० | २।२ |
| रम्यान्तरः कमलिनी | ४।१० | स्मर एव तापहेतुः | ३।९ |
| रम्यास्तपोधनानां | १।१३ | स्मृतिभिन्नमोहो० | ७।२२ |
| व | स्रस्तांसावतिमात्र० | १।२९ | |
| वसने परिधूसरे | ७।२१ | स्वप्नो नु माया | ६।१० |
| वाचं न मिश्रयति | १।३० | स्वसुखनिरभिलाषः | ५।७ |
| विचिन्तयन्ती यमनन्य० | ४।१ | स्वायंभुवान्मरीचेर्यः | ७।९ |
| विच्छित्तिशेषैः | ७।५ | स्विन्नाङ्गुलि० | ६।१५ |
टीकाकर्तृवंशपरिचयः
पुराणादिषु शास्त्रेषु सङ्गीतयशसो मुदा।
देवश्लाघ्यस्य दिव्यस्य सर्वप्राणिहितैषिणः ॥ १ ॥
भारतस्योत्तरे भागे देवरियाख्यमण्डले।
धर्मांगतछपरायां प्रसिद्धायां स्वमण्डले ॥ २ ॥
धन्यधान्यादिना पूर्णे सदाधारमनोरमे।
कुबेरनाथसविधे त्रिपाठिब्राह्मणान्वये ॥ ३ ॥
रमेशमणिविदुषः प्रख्यातस्य सुकीर्तये।
नागेश्वरमणिविद्वान् तनयोऽभूद् द्विजाग्रणी ॥ ४ ॥
तदात्मजाश्च चत्वारो जाता विद्याविशारदाः।
शीलसौजन्यसम्पन्ना विनीता बुद्धिशालिनः ॥ ५ ॥
बलदेवः सुदामा च भरोसापण्डितस्तथा।
चतुर्थोऽस्ति श्रीकृष्णमणि शास्त्री प्रसन्नधीः ॥ ६ ॥
माता फूलमती देवी श्रीमती शुभलक्षणा।
अजीजनत् सुतानेतान् मोदनिर्भरमानसा ॥ ७ ॥
चत्वारो भ्रातरो ह्येते लोककल्याणकारिणः।
सर्वेऽपत्यकलत्रादिसुखिनः सौम्यमूर्तयः ॥ ८ ॥
वात्सल्यस्नेहभाक् तेषु कनीयान् ग्रन्थलेखकः।
श्री श्रीकृष्णमणिवर्मी काशीवासी सुधीवरः ॥ ९ ॥
एतस्याप्यद्भुताः सन्ति तनया भाग्यशालिनः।
विजयश्च सुरेशश्च महेशश्च दिनेशकः ॥ १० ॥
प्रासोष्ट शुभगानेतान् द्वे सुते अपि शोभने।
चन्द्रकलां च सावित्रीं राजदेवी मुदान्विता ॥ ११ ॥
सर्वसौभाग्यसम्पन्ना गृहिणी धर्मचारिणी।
रससन्ततिमाता सा मोदमाप्नोति सर्वदा ॥ १२ ॥
एतेषु विजयास्ति पुत्रो विनयनामकः।
बालविद्यालयेऽधीते वयस्यैर्मोदमावहन् ॥ १३ ॥
कुबेरनाथकृपया विप्राणां च प्रसादतः।
स्वधर्मकर्मनिरतो वंशोऽयं भ्राजते भुवि ॥ १४ ॥
अभिज्ञानशाकुन्तलस्यातिलघूत्तरीयाणि
लघूत्तरीयाणि च प्रश्नोत्तराणि
अतिलघूत्तरीयाणि प्रश्नोत्तराणि
(१) प्रश्न:—अभिज्ञानशाकुन्तलस्य रचयिता कः ?
उत्तरम्—अभिज्ञानशाकुन्तलस्य रचयिता महाकविः कालिदासः।
(२) प्रश्न:—पुरा कवीनां गणना प्रसङ्गे कनिष्ठिकाधिष्ठितः कः ?
उत्तरम्—पुरा कवीनां गणनाप्रसङ्गे कनिष्ठिकाधिष्ठितः कालिदासः।
(३) प्रश्न:—अद्यापि कथमनामिका सार्थवती बभूव ?
उत्तरम्—अद्यापि तत्तुल्यकवेरभावादनामिका सार्थवती बभूव।
(४) प्रश्न:—कालिदासस्य का प्रसिद्धा ?
उत्तरम्—कालिदासस्य उपमा प्रसिद्धा।
(५) प्रश्न:—अभिज्ञानशाकुन्तले कोऽङ्गी रसः ?
उत्तरम्—अभिज्ञानशाकुन्तले शृङ्गारोऽङ्गी रसः।
(६) प्रश्न:—अभिज्ञानशाकुन्तले कः नायकः ?
उत्तरम्—अभिज्ञानशाकुन्तले दुष्यन्तः नायकः।
(७) प्रश्न:—दुष्यन्तः कीदृशः नायकः ?
उत्तरम्—दुष्यन्तः धीरोदात्तः नायकः।
(८) प्रश्न:—अभिज्ञानशाकुन्तलस्य नायिका का ?
उत्तरम्—अभिज्ञानशाकुन्तलस्य नायिका शकुन्तला।
(९) प्रश्न:—शकुन्तला कीदृशी नायिका ?
उत्तरम्—शकुन्तला स्वीया नायिका अस्ति।
(१०) प्रश्न:—कालिदासस्य किं सर्वस्वम् ?
उत्तरम्—कालिदासस्य सर्वस्वमभिज्ञानशाकुन्तलम्।
(११) प्रश्न:—काव्येषु किं रम्यम् ?
उत्तरम्—काव्येषु नाटकं रम्यम्।
(१२) प्रश्न:—नाटकेषु किं रम्यम् ?
उत्तरम्—नाटकेषु रम्यं शाकुन्तलम्।
(१३) प्रश्न:—महाकवि कालिदासेनाभिज्ञानशाकुन्तलस्य कथानकं कुतः सङ्गृहीतम् ?
उत्तरम्—महाकविकालिदासेनाभिज्ञानशाकुन्तलस्य कथानकं महाभारतस्या-दिपर्वणः शाकुन्तलोपाख्यानात् सङ्गृहीतम्।
४४२ अभिज्ञानशाकुन्तलम्
(१४) प्रश्न:—अभिज्ञानशाकुन्तलं रूपकस्य कः भेदः ?
उत्तरम्—अभिज्ञानशाकुन्तलं रूपकस्य नाटकभेदः।
(१५) प्रश्न:—अभिज्ञानशाकुन्तले कति अङ्काः सन्ति ?
उत्तरम्—अभिज्ञानशाकुन्तले सप्त अङ्काः सन्ति।
(१६) प्रश्न:—स्रष्टुः आद्या सृष्टिः का ?
उत्तरम्—स्रष्टुः आद्या सृष्टिः जलरूपा।
(१७) प्रश्न:—विधिहुतं हविः कः वहति ?
उत्तरम्—विधिहुतं हविः पावकः वहति।
(१८) प्रश्न:—कया प्राणिनः प्राणवन्तः ?
उत्तरम्—वायुरूपया भगवतः मूर्त्या प्राणिनः प्राणवन्तः भवन्ति।
(१९) प्रश्न:—का सर्वबीजप्रकृतिराहुः ?
उत्तरम्—पृथिवीरूपा भगवतः तनुः सर्वबीजप्रकृतिराहुः।
(२०) प्रश्न:—अभिज्ञानशाकुन्तलस्य प्रथमे श्लोके किं छन्दः ?
उत्तरम्—अभिज्ञानशाकुन्तलस्य प्रथमे श्लोके स्रग्धराछन्दः विज्ञेयम्।
(२१) प्रश्न:—कस्य दिवसाः परिणामरमणीयाः ?
उत्तरम्—ग्रीष्मसमयस्य दिवसा परिणामरमणीयाः।
(२२) प्रश्न:—काः शिरीषकुसुमानि अवतंसयन्ति ?
उत्तरम्—अवतंसयन्ति दयमानाः प्रमदाः शिरीषकुसुमानि।
(२३) प्रश्न:—राजा दुष्यन्तः केन हृतः ?
उत्तरम्—एष राजा दुष्यन्तः सारङ्गेणातिरंहसा हृतः।
(२४) प्रश्न:—सूतः राजानं दुष्यन्तं कमिव पश्यति ?
उत्तरम्—सूतः राजानं दुष्यन्तं मृगानुसारिणं साक्षात् पिनाकिनमिव पश्यति।
(२५) प्रश्न:—कः वियति बहुतरं स्तोकमुर्व्यां प्रयाति ?
उत्तरम्—सारङ्गो वियति बहुतरं स्तोकमुर्व्यां प्रयाति।
(२६) प्रश्न:—कस्य शराः वज्रसाराः ?
उत्तरम्—दुष्यन्तस्य शराः वज्रसाराः।
(२७) प्रश्न:—कस्याश्रमः अनुमालिनीतीरं दृश्यते ?
उत्तरम्—कुलपतेः कण्वस्याश्रमः अनुमालिनीतीरं दृश्यते।
(२८) प्रश्न:—कुलपतिः किमर्थं सोमतीर्थं गतः ?
उत्तरम्—कुलपतिः कण्वः दुहितरं शकुन्तलामतिथिसत्काराय नियुज्य दैवमस्याः प्रतिकुलं शमयितुं सोमतीर्थं गतः।
अतिलघूत्तरीयाणि लघूत्तरीयाणि च प्रश्नोत्तराणि
४४३
(२९) प्रश्न:—कथं प्रवेष्टव्यानि तपोवनानि नाम ?
उत्तरम्—विनीतवेषेण प्रवेष्टव्यानि तपोवनानि नाम।
(३०) प्रश्न:—केषां द्वाराणि सर्वत्र भवन्ति ?
उत्तरम्—भवितव्यतानां द्वाराणि सर्वत्र भवन्ति।
(३१) प्रश्न:—कथं यौवनमङ्गेषु सन्नद्धम् ?
उत्तरम्—कुसुममिव लोभनीयं यौवनमङ्गेषु सन्नद्धम्।
(३२) प्रश्न:—केषां कुत्रान्तःकरणप्रवृत्तयः प्रमाणम् ?
उत्तरम्—सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः।
(३३) प्रश्न:—शकुन्तलायाः कथं कण्वः पिता ?
उत्तरम्—शरीरसंवर्द्धनादिभिस्तातकाश्यपोऽपि (कण्वः) अस्याः शकुन्तलायाः पिता।
(३४) प्रश्न:—देवैः मेनका कथं प्रेषिता ?
उत्तरम्—जातशङ्कैः देवैः नियमविघ्नकारिणी मेनका नामाप्सराः प्रेषिता।
(३५) प्रश्न:—शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं किमस्ति ?
उत्तरम्—शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमस्ति तेजः।
(३६) प्रश्न:—नृपाणां किं ददति आरण्यकाः ?
उत्तरम्—तपःषड्भागमक्षय्यं ददत्यारण्यकाः हि नृपाणाम्।
(३७) प्रश्न:—आपन्नाभयसत्रेषु दीक्षिताः खलु के ?
उत्तरम्—आपन्नाभयसत्रेषु दीक्षिताः खलु पौरवाः।
(३८) प्रश्न:—कः शशाङ्कं ग्लपयति ?
उत्तरम्—दिवसः शशाङ्कं ग्लपयति।
(३९) प्रश्न:—केन विवाहेन बह्व्यो राजर्षिकन्यकाः परिणीताः ?
उत्तरम्—गान्धर्वेण विवाहेन बह्व्यो राजर्षिकन्यकाः परिणीताः।
(४०) प्रश्न:—कीदृशी विद्या अशोचनीया भवति ?
उत्तरम्—सुशिष्यपरिदत्ता विद्या अशोचनीया भवति।
(४१) प्रश्न:—कैः गृहिणः पीड्यन्ते ?
उत्तरम्—नवैः तनयाविश्लेषदुःखैः गृहिणः पीड्यन्ते।
(४२) प्रश्न:—'वनौकषोऽपि सन्तो लौकिकज्ञा वयम्' कस्येयमुक्तिः ?
उत्तरम्—वनौकषोऽपि सन्तो लौकिकज्ञा वयमितीयमुक्तिः महर्षेः कण्वस्य।
(४३) प्रश्न:—अर्थो हि कन्या परकीय एवेति कस्येयमुक्तिः ?
उत्तरम्—अर्थो हि कन्या परकीय एवे सूक्तिरियं कण्वस्य।
४४४
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
(४४) प्रश्नः—रात्रिन्दिवं कः प्रयाति ?
उत्तरम्—रात्रिन्दिवं गन्धवहः प्रयाति ।
(४५) प्रश्नः—कैः तरवः नम्राः भवन्ति ?
उत्तरम्—भवन्ति नम्रास्तरवः फलागमैः ।
(४६) प्रश्नः—धर्मांशौ तपति किं न आविर्भविष्यति ?
उत्तरम्—धर्मांशौ तपति तमः न आविर्भविष्यति ।
(४७) प्रश्नः—केषु अमी विकाराः मूर्च्छन्ति ?
उत्तरम्—मूर्च्छन्त्यमी विकाराः प्रायेणैश्वर्यमत्तेषु ।
(४८) प्रश्नः—क इव न च खलु परिभोक्तुं नैव शक्नोमि हातुम् ?
उत्तरम्—भ्रमर इव विभाते कुन्दमन्तस्तुषारं
न च खलु परिभोक्तुं नैव शक्नोमि हातुम् ।
(४९) प्रश्नः—परभृताः कमन्यैर्द्विजैः पोषयन्ति ?
उत्तरम्—परभृताः स्वमपत्यजातमन्यैर्द्विजैः पोषयन्ति ।
(५०) प्रश्नः—परीक्ष्य किं कर्तव्यम् ?
उत्तरम्—परीक्ष्य कर्तव्यं विशेषात् सङ्गतं रहः ।
(५१) प्रश्नः—अज्ञातहृदयेषु किं वैरीभवति ?
उत्तरम्—अज्ञातहृदयेष्वेवं वैरीभवति सौहृदम् ।
(५२) प्रश्नः—पतिकुले कस्य दास्यमपि क्षमम् ?
उत्तरम्—पतिकुले स्त्रीजनस्य दास्यमपि क्षमम् ।
(५३) प्रश्नः—वशिनां कीदृशी वृत्तिः ?
उत्तरम्—वशिनां परपरिग्रहसंश्लेषपराङ्मुखी वृत्तिः ।
(५४) प्रश्नः—मातलिः कस्य सारथिः ?
उत्तरम्—मातलिः इन्द्रस्य सारथिः ।
(५५) प्रश्नः—कः सपत्नीकः तपस्यति ?
उत्तरम्—सुरासुरगुरुः मारीचः सपत्नीकस्तपस्यति ।
(५६) प्रश्नः—का नामौषधिः सर्पो भूत्वा दशति ?
उत्तरम्—अपराजिता नामौषधिः सर्पो भूत्वा दशति ।
(५७) प्रश्नः—अपराजिता नामौषधिः कदा केन दत्ता ?
उत्तरम्—अपराजितानामौषधिः सर्वदमनस्य जातकर्मसमये भगवता मारीचेन दत्ता ।
(५८) प्रश्नः—शकुन्तलायाः दुष्यन्तेन पुनर्मेलनं कस्याश्रमेऽभवत् ?
उत्तरम्—शकुन्तलायाः दुष्यन्तेन पुनर्मेलनं मारीचस्याश्रमेऽभवत् ।
अतिलघूत्तरीयाणि लघूत्तरीयाणि च प्रश्नोत्तराणि ४४५
(५९) प्रश्न:—का दीर्घ विरहव्रतं विभर्ति ?
उत्तरम्—शकुन्तला दीर्घ विरहव्रतं विभर्ति ।
(६०) प्रश्न:—पार्थिवः कस्मै प्रवर्त्तताम् ?
उत्तरम्—पार्थिवः प्रकृतिहिताय प्रवर्त्तताम् ।
लघूत्तरीयाणि प्रश्नोत्तराणि
(१) प्रश्न:—कालिदासस्य कति ग्रन्थाः सन्ति ?
उत्तरम्—कालिदासस्याष्टौ ग्रन्थाः सन्ति, तद्यथा—
१. कुमारसम्भवमहाकाव्यम्, २. रघुवंश-महाकाव्यम्, ३. मेघदूतखण्डकाव्यम्, ४. ऋतुसंहारः, ५. शृङ्गारतिलकम्, त्रीणि नाटकानि, ६. अभिज्ञानशाकुन्तलम्, ७. मालविकाग्निमित्रम्, ८. विक्रमोर्वशीयञ्च ।
(२) प्रश्न:—कालिदासस्योपमाविषये किमप्येकमुदाहरणं लिख ?
उत्तरम्—कालिदासस्योपमाविषये उदाहरणमेकमवलोकयन्तु सुधयः—
सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्रौ-
र्यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा ।
नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे
विवर्णभावं स स भूमिपालः ॥
(३) प्रश्न:—धीरोदात्तस्य लक्षणं किमस्ति ?
उत्तरम्—धीरोदात्तनायकस्य लक्षणमुक्तं साहित्यदर्पणे—
अविकत्थनः क्षमावानतिगम्भीरो महासत्त्वः ।
स्थेयान्निगूढमानो धीरोदात्तो दृढव्रतः कथितः ॥
(४) प्रश्न:—नायकः कतिविधः भवति ?
उत्तरम्—नायकः चतुर्विधः भवति । यथोक्तं साहित्यदर्पणे—
धीरोदात्तो धीरोद्धतस्तथा धीरललितश्च ।
धीरप्रशान्त इत्ययमुक्तः प्रथमश्चतुर्भेदः ॥
(५) प्रश्न:—नाटकस्य कि लक्षणम् ?
उत्तरम्—नाटकस्य लक्षणमुक्तं साहित्यदर्पणे—
नाटकं ख्यातवृत्तं स्यात्पञ्चसन्धिसमन्वितम् ।
(६) प्रश्न:—कति रूपकाणि भवन्ति ?
उत्तरम्—दशरूपकाणि सन्ति । तदुक्तं साहित्यदर्पणे—
नाटकमथ प्रकरणं भाणव्यायोगसमवकारडिमाः ।
ईहामृगाङ्कवीथ्यः प्रहसनमिति रूपकाणि दश ॥
(७) प्रश्न:—अभिज्ञानशाकुन्तलस्य व्युत्पत्तिर्लेख्या ?
उत्तरम्—अभिज्ञायतेऽनेन यत्तद् अभिज्ञानम्, शकुन्तैर्लालिता शकुन्तला, शकुन्तलामधिकृत्य कृतं काव्यं शाकुन्तलं, अभिज्ञानं च तत् शाकुन्तलम्, अभिज्ञान-शाकुन्तलमिति ।
४४६ | अभिज्ञानशाकुन्तलम्
(८) प्रश्नः—अभिज्ञानशाकुन्तले के मुनित्रयः ?
उत्तरम्—अभिज्ञान शाकुन्तले त्रयः मुनयः सन्ति—
१. कण्वः २. दुर्वासा, ३. मरीचिनन्दनः कश्यपश्च ।
(९) प्रश्नः—शार्ङ्गरवशारद्वतौ कौ ?
उत्तरम्—शार्ङ्गरवशारद्वतौ महर्षिकण्वस्य व्यवहारज्ञौ आज्ञाकारिणौ शिष्यौ स्तः।
(१०) प्रश्नः— अनसूयाप्रियंवदे के ?
उत्तरम्—अनसूयाप्रियंवदे शकुन्तलायाः प्रियसख्यौ।
(११) प्रश्नः—गौतमी कास्ति ?
उत्तरम्—गौतमी महर्षिकण्वस्य धर्मभगिनी।
(१२) प्रश्नः—सर्वदमनः कः ?
उत्तरम्—सर्वदमनः शकुन्तलायाः पुत्रः।
(१३) प्रश्नः—अभिज्ञानशाकुन्तले विदूषकस्य किं नामास्ति ?
उत्तरम्—अभिज्ञानशाकुन्तले विदूषकस्य नाम माधव्योऽस्ति।
(१४) प्रश्नः—का मिश्रकेशी ?
उत्तरम्—मिश्रकेशी मेनकायाः प्रियसखी एका अप्सरास्ति।
(१५) प्रश्नः—अदितिः का ?
उत्तरम्—अदितिः महर्षिकश्यपस्य धर्मपत्नी, देवानां माता, दक्षस्य कन्यास्ति।
(१६) प्रश्नः—अभिज्ञानशाकुन्तलस्य मङ्गलाचरणस्य श्लोकं लिखत ?
उत्तरम्—अभिज्ञानशाकुन्तले मङ्गलाचरणश्लोकमस्ति—
या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणाः या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः॥
(१७) प्रश्नः—काभिः प्रत्यक्षाभिः तनुभिरष्टाभिः शङ्करः पातु ?
उत्तरम्—जल-वह्नि-यजमान-चन्द्र-सूर्य-गगन-धरणी-वायुरूपाभिरष्टाभिः प्रत्यक्षाभिस्तनुभिः शङ्करो वः पुनातु। यथोक्तम्—
भूमिरापोऽनलो वायुरात्मा व्योम रविशशी।
इत्यष्टौ सर्वलोकानां प्रत्यक्षा हरमूर्तयः॥
(१८) प्रश्नः—नान्द्याः किं लक्षणम् ?
उत्तरम्—नान्द्याः लक्षणमुक्तं साहित्यदर्पणे—
देवतादिनमस्कारमङ्गलारम्भपाठकैः।
या क्रिया नन्द्यते नाट्यारम्भे नान्दी तु सा स्मृता॥
(१९) प्रश्नः—सूत्रधारः कः भवति ?
उत्तरम्—सूत्रं = सूत्रं प्रयोगानुष्ठानं धारयतीति सूत्रधारः, यया नाटकीयसर्वपात्रप्रवर्तनाप्रयोजकं सर्वान्तःस्यूतं पुष्पमालामिव धारयतीति सूत्रधारः।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अतिलघूत्तरीयाणि लघूत्तरीयाणि च प्रश्नोत्तराणि ४४७
तल्लक्षणमुक्तम्—
नाट्योपकरणादीनि सूत्रमित्यभिधीयते ।
सूत्रं धारयतीत्यर्थे सूत्रधारो निगद्यते ॥
(२०) प्रश्न:—किं नाम नेपथ्यम् ?
उत्तरम्— नेपथ्यं वेशविन्यासः, तदर्थं यद् गृहं तदपि नेपथ्यम् । यत्र नाटकीयपात्राणि स्ववेशविन्यासान् प्रकुर्वते तन्नेपथ्यमिति ।
(२१) प्रश्न:—प्रयोगविज्ञानं न साधु कुतः मन्यते ?
उत्तरम्— आपरितोषाद् विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम् ।
(२२) प्रश्न:—केषां आत्मन्यप्रत्ययं चेतः भवति ?
उत्तरम्— बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेतः ।
(२३) प्रश्न:—कथं तपोवनस्याभोगः ज्ञायते ?
उत्तरम्— सूतः दुष्यन्तं प्रति कथयति—इह हि क्वचित् तरूणां तलेषु शुक-गर्भकोटरमुखभ्रष्टाः मुनिधान्यकणाः विद्यन्ते । कुत्रापि इङ्गुदीफलभिदः प्रस्निग्धाः पाषाण-खण्डाः सूच्यन्ते । कस्मिंश्चिद्भागे विश्वासोपगमात् अभिन्नगतयः मृगाः रथशब्दं सहन्ते । क्वचित् प्रदेशे तोयाधारपथाः वल्कलाग्रपरिश्रुतजलाधाररेखाविभूषिताः दृश्यन्ते । तस्मादेभिर्लक्षणैरयमाश्रमस्यैवाभोग एवानुमीयते ।
(२४) प्रश्न:—कथं वनलताभिरुद्यानलता दूरीकृताः ?
उत्तरम्— राजा दुष्यन्तः मुनिकन्यकाः अवलोक्य कथयति—
इदं पुरो दृश्यमानं अन्तःपुरे दुर्लभं वपुःलावण्यं वा वनवासिनोऽपि जनस्य मुनिबालिकालोकस्य अस्ति तर्हि निश्चयेन वनलताभिः सौन्दर्यसौकुमार्यादिभिः गुणैः उद्यानलताः निराकृताः ।
(२५) प्रश्न:—ऋषिः कण्वः कथं शमीलतां छेत्तुं व्यवस्यति ?
उत्तरम्— राजा दुष्यन्तः वृक्षसेचनादौ तपोवनकर्तव्ये नियुक्तां दृष्ट्वा कथयति—
यः ऋषिः कण्वः पुरो दृश्यमानमव्याजमनोहरं शरीरं तपश्चरणयोग्यं सम्पादयितुं वाञ्छति, सः ऋषिः नूनं नीलोत्पलपत्रधारया कठिनां शमीवृक्षस्य शाखां छेतुं समीहते ।
(२६) प्रश्न:—‘किमिव हिः मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्’ सूक्तिरियं व्याख्येया ?
उत्तरम्— राजा दुष्यन्तः वल्कलभृतां शकुन्तलामवलोक्य कथयति—
शैवलेनापि अनुविद्धं सरसिजं रम्यम्, मलिनमपि चिह्नं चन्द्रस्य शोभां विस्तारयति । यतः एषा पुरोदृश्यमाना कृशाङ्गी निसर्गसुन्दरी शकुन्तला वल्कलेन कामं मनोहारिणी अस्ति, कतमत् वस्तु कमनीयानामाकृतीनां मण्डनं न भवति, अपि तु सर्वमपि वस्तु रम्याणां सुषमा वर्द्धयत्येव नीलकण्ठस्य कण्ठे विषमिव, कलङ्केन चन्द्रस्येव, शैवलेन कमलस्येव, अनेन वृक्षत्वग्वस्त्रेण अस्याः शकुन्तलायाः शोभैवेत्याशयः ।
(२७) प्रश्न:—मधुकरः कथं कृती ?
उत्तरम्— राजा दुष्यन्तः कथयति—
४४८ | अभिज्ञानशाकुन्तलम्
चलापाङ्गां दृष्टिं स्पृशसि बहुशो वेपथुमतीं रहस्याख्यायीव स्वनसि मृदु कर्णान्तिकचरः । करं व्याधुन्वन्त्याः पिबसि रतिसर्वस्वमधरं वयं तत्त्वान्वेषान्मधुकर हतास्त्वं खलु कृती ॥
(२८) प्रश्नः—वसुधातलात् किं न उदेति ? उत्तरम्—प्रभाभिः तरलं ज्योतिः वसुधातलात् न उदेति ।
(२९) प्रश्नः—प्रस्तावनायाः किं लक्षणम् ? उत्तरम्—प्रस्तावनायाः लक्षणमुक्तं साहित्यदर्पणे—
नटी विदूषको वापि पारिपार्श्विक एव वा । सूत्रधारेण सहिताः संलापं यत्र कुर्वते ॥ चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः । आमुखं तत्तु विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनापि सा ॥
(३०) प्रश्नः—अकृतार्थेऽपि मनसिजे का रतिं कुरुते ? उत्तरम्—राजा दुष्यन्तो विरहेणोद्विग्नमना शकुन्तलां मनसा स्मरन् विमृशति— यथेच्छं शकुन्तला सुखप्राप्या न, तस्या प्रदानस्य गुर्वधीनत्वात्, तु मे मनः शकुन्तलायाः मय्यनुरागसूचकानां भावानां दर्शनेन आश्वासयुक्तं वर्तते । मनसिजे अचरितार्थेऽपि स्त्रीपुरुषयोः प्रार्थना रतिं प्रीतिं कुरुते सुखं जनयति । नायिका-समागमसुखालाभेऽपि तच्चेष्टादिभिरेव मनो मे मोदते ।
(३१) प्रश्नः—सेनापतिः मृगयाया गुणान् कथं वर्णयति ? उत्तरम्—
मेदश्छेदकृशोदरं लघु भवत्युत्थानयोग्यं वपुः सत्त्वानामपि लक्ष्यते विकृतिमच्चित्तं भयक्रोधयोः । उत्कर्षः च धन्विनां यदिषवः सिध्यन्ति लक्ष्ये चले मिथ्यैव व्यसनं वदन्ति मृगयामीदृग्विनोदं कुतः ॥
अनेन प्रकारेण सेनापतिः मृगयायाः गुणान् वर्णयति ।
(३२) प्रश्नः—शकुन्तलायाः लाभे सन्दिहानो राजा किं चिन्तयति ? उत्तरम्—शकुन्तलायाः लोकोत्तरं लावण्यं सञ्चिन्त्य तल्लाभे सन्दिहानो राजा दुष्यन्तो नर्मसचिवं विदूषकं प्रति कथयति—
अनाघ्रातं पुष्पं किसलयमलूनं कररुहै- रनाविद्धं रत्नं मधु नवमनास्वादितरसम् । अखण्डं पुण्यानां फलमिव च तद्रूपमनघं न जाने भोक्तारं कमिह समुपस्थास्यति विधिः ॥
(३३) प्रश्नः—सुरयुवतयः कुत्र विजयम् आशंसन्ते ? उत्तरम्—दैत्यैः बद्धवैराः सुरयुवतयः दुष्यन्तस्य अधिज्ये धनुषि पौरुहूते वज्रे च विजयं आशंसन्ते ।
(३४) प्रश्नः—'परिहासविजल्पितं सखे' इति राजा कथं कथयति ?
अतिलघूत्तरीयाणि लघूत्तरीयाणि च प्रश्नोत्तराणि । ४४९
उत्तरम्—शकुन्तलाविषयकमनुरागं प्रच्छादयन् तस्याः स्वाभिलाषानर्हत्वं च समर्थन् राजा दुष्यन्तो विदूषकं ब्रूते—
क्व वयं क्व परोक्षमन्मथो मृगशावैः सममेधितो जनः।
परिहासविजल्पितं सखे परमार्थेन न गृह्यतां वचः ॥
(३५) प्रश्नः—विष्कम्भकस्य किं लक्षणम् ?
उत्तरम्—
वृत्तवर्तिष्यमाणानां कथांशानां निदर्शकः।
सङ्क्षिप्तार्थस्तु विष्कम्भ आदावङ्कस्य दर्शितः ॥
(३६) प्रश्नः—राजा दुष्यन्तः कथं विघ्नानपोहति ?
उत्तरम्—राजा दुष्यन्तः धनुषः हुङ्कारेणेव विघ्नानपोहति ।
(३७) प्रश्नः—कः कुसुमवाणान् वज्रसारीकरोति ?
उत्तरम्—मदनः कुसुमवाणान् वज्रसारीकरोति ।
(३८) प्रश्नः—शकुन्तलायाः अस्वास्थ्यं ग्रीष्ममूलकं काममूलकं वेति कथं विचारयति राजा दुष्यन्तः ?
उत्तरम्—मालिनीतीरवर्तिनि लतामण्डपे कुसुमशयने शयानां सखीभ्यां वीज्यमानामस्वस्थशरीरां शकुन्तलामवलोक्य तदस्वास्थ्यं ग्रीष्ममूलकं काममूलकं वेति विकल्पयन् राजा दुष्यन्तो विचारयति—
स्तनन्यस्तोशीरं शिथिलितमृणालैकवलयं
प्रियायाः साबाधं किमपि कमनीयं वपुरिदम्।
समस्तापः कामं मनसिजनिदाघप्रसरयो-
र्न तु ग्रीष्मस्यैवं सुभगमपराद्धं युवतिषु ॥
(३९) प्रश्नः—'श्रिया दुरापः कथमीप्सितो भवेत्' सूक्तिरियं पूरणीया ?
उत्तरम्—शकुन्तलाद्वारा कृतामात्मनोऽवधीरणामाशङ्कमानो राजा दुष्यन्तः तां परिहरन्नभिधत्ते—
अयं स ते तिष्ठति सङ्गमोत्सुकः
विशङ्कसे भीरु यतोऽवधीरणाम्।
लभेत् वा प्रार्थयिता न वा श्रियं
श्रिया दुरापः कथमीप्सितो भवेत् ॥
(४०) प्रश्नः—शकुन्तला पत्रे किं लिखित्वा वाचयति ?
उत्तरम्—शकुन्तला पत्रे लिखित्वा वाचयति—
तव न जाने हृदयं मम पुनः कामो दिवापि रात्रावपि ।
निर्घृण तपति बलीयस्त्वयि वृत्तमनोरथान्यङ्गानि ॥
(४१) प्रश्नः—दुष्यन्तस्य के द्वे प्रतिष्ठे ?
उत्तरम्—राजा दुष्यन्तः कथयति—
परिग्रहबहुत्वेऽपि द्वे प्रतिष्ठे कुलस्य मे।
समुद्रवसना चोर्वी सखी च युवयोरियम् ॥
४५० | अभिज्ञानशाकुन्तलम्
(४२) प्रश्नः—गान्धर्वेण विवाहेन परिणीताः काः अभिनन्दिता ?
उत्तरम्—गान्धर्वेण विवाहेन बहव्यो राजर्षिकन्यकाः ।
श्रूयन्ते परिणीतास्ताः पितृभिश्चाभिनन्दिताः ॥
यतो हि क्षत्रियस्य गान्धर्वो विवाहः श्रेष्ठः उच्यते ।
(४३) प्रश्नः—चक्रवाकवधूः आमन्त्रयस्व सहचरमित्यनेन का सूचना ?
उत्तरम्—लतामण्डपदिशा गौतम्याः प्रवेशमालोक्य शकुन्तलाबोधनाय प्रकृतमर्थं सङ्गोप्य सख्योः प्रियंवदाऽनसूपयोः वचनमिदं नेपथ्यात् । अमुनाऽप्राकृतेन च हे शकुन्तले ! स्वप्रियं दुष्यन्तम् आमन्त्रयस्व = आपृच्छस्वगोपाय, उपस्थिता तत्र भवती गौतमी । रात्रिर्हि चक्रवाकमिथुनस्य वियोगकारिणी राजन्यपगते चक्रवाकयोरिव गौतमीगमने पुनरपि युवयोः समागमो भविष्यति । अतोऽत्यन्तं विषादो मा विधेय इति सूच्यते ।
(४४) प्रश्नः—कीदृश्यः बहुधा छायाः चरन्ति ?
उत्तरम्—भयमादधानाः सन्ध्यापयोदकपिशाः पिशिताशनानां राक्षसानां छायाः बहुधाः चरन्ति ।
(४५) प्रश्नः—'कथा प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव' इति सम्पूर्णं पद्यं लिखत ?
उत्तरम्—शकुन्तलायै शापवचनं नेपथ्यात्—
विचिन्तयन्ती यमनन्यमानसा
तपोधनं वेत्सि न मामुपस्थितम् ।
स्मरिष्यति त्वां न स बोधितोऽपि सन्
कथां प्रमत्तः प्रथमं कृतामिव ॥
(४६) प्रश्नः—को नाम उष्णोदकेन नवमालिका सिञ्चति इत्यस्य भावार्थो लेख्यः ?
उत्तरम्—शकुन्तलायाः शापवचननिवेदनं सर्वथानुचितमिति दृष्टान्तमुखेन प्रियंवदा कथयति—
कः जनो नाम तप्तजलेन नवमालतीलतां सिञ्चिति, यथा तप्तजलेन नवमालिका-सिञ्चनमपराद्धं तथा शकुन्तलायै शापवचनकथनं अपराधपूर्णमस्ति ।
(४७) प्रश्नः—'लोको नियम्यत इवात्मदशान्तरेषु' इति सम्पूर्णं पद्यं लिखत?
उत्तरम्—यात्येकतोऽस्तशिखरं पतिरोषधीना-
माविष्कृतोऽरुणपुरःसर एकतोऽर्कः ।
तेजोद्वयस्य युगपद् व्यसनोदयाभ्यां
लोको नियम्यत इवात्मदशान्तरेषु ॥
(४८) प्रश्नः—केन सूचितस्तातकण्वस्य शकुन्तलावृत्तान्तः ?
उत्तरम्—अग्निशरणं प्रविष्टस्य तातकण्वस्य शरीरं विना छन्दोमम्य्या वाण्या शकुन्तलावृत्तान्तः सूचितः ।
(४९) प्रश्नः—छन्दोमम्य्यां वाण्या शकुन्तलाविषये किं सूचितम् ?
उत्तरम्—अग्निशरणं प्रविष्टस्य तातकण्वस्य शरीरं विना छन्दोमम्य्या वाण्या
अतिलघूत्तरीयाणि लघूत्तरीयाणि च प्रश्नोत्तराणि
४५१
सूचितम्, यत्—
दुष्यन्तेनाहितं तेजो दधानां भूतये भुवः।
अवेहि तनयां ब्रह्मन्नग्निगर्भां शमीमिव॥
(५०) प्रश्नः—शकुन्तलाहेतोर्वनस्पतिभिः कानि पदार्थानि दत्तानि ?
**उत्तरम्—**शकुन्तलाहेतोर्वनस्पतिभिः आभरणानि दत्तानि। अथ च—
क्षौमं केनचिदिन्दुपाण्डुतरुणा माङ्गल्यमाविष्कृतं
निष्ठ्यूतश्चरणोपभोगसुलभो लाक्षारसः केनचित्।
अन्येभ्यो वनदेवताकरतलैरापर्वभागोत्थितै-
र्दत्तान्याभरणानि तत्किसलयोद्भेदप्रतिद्वन्द्विभिः॥
(५१) प्रश्नः—यास्यत्यद्य शकुन्तलेति सम्पूर्णं पद्यं लिखत ?
उत्तरम्—
यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया
कण्ठस्तम्भितवाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्।
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः
पीड्यन्ते गृहिणः कथं नु तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः॥
(५२) प्रश्नः—वन्दमानां शकुन्तलां कण्वः कः आर्शीवादः ददाति ?
**उत्तरम्—**वन्दमानां शकुन्तलां कण्वः तदनुरूपं स्नेहातिशयव्यञ्जकमाशीर्वचनं कथयति, यत्—
ययातेरिव शर्मिष्ठा भर्तुर्बहुमता भव।
सुतं त्वमपि सम्राजं सेव पुरमवाप्नुहि॥
(५३) प्रश्नः—कीदृशी शकुन्तला पतिगृहं याति ?
उत्तरम्—
पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्माष्वपितेषु या
नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्।
आद्ये वः कुसुमप्रवृत्तिसमये यस्या भवत्युत्सवः
सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्॥
(५४) प्रश्नः—शकुन्तलायाः पन्थाः कीदृशः भवतु ?
**उत्तरम्—**शकुन्तलायाः पन्थाः शान्तानुकूलपवनः शिवश्च भवतु।
(५५) प्रश्नः—कीदृशः मृगः शकुन्तलायाः पदवीं न जहाति ?
**उत्तरम्—**पतिगेहं प्रस्थितायाः शकुन्तलाया वसनाञ्चलं गृहीत्वाऽऽकर्षयन्तं मृगशिशुमवलोक्य महर्षिः कण्वः कथयति—
यस्य त्वया व्रणविरोपणमिङ्गुदीनां
तैलं न्यषिच्यत मुखे कुशसूचिविद्धे।
श्यामाकमुष्टिपरिवर्धितको जहाति
सोऽयं न पुत्रकृतकः पदवीं मृगस्ते॥
(५६) प्रश्नः—महर्षि कण्वः दुष्यन्ताय किं सन्देशं कथयति ?
**उत्तरम्—**राज्ञे दुष्यन्ताय सन्देष्टव्यमर्थं विवृण्वन् महर्षिः कण्वः कथयति—