अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३६ अभिज्ञानशाकुन्तलम्
अल्पमात्रं समुद्दिष्टं बहुधा यद्विसर्पति ।
फलस्य प्रथमो हेतुर्बीजमित्यभिधीयते ॥
नायक— नाटक का नायक त्यागी, यशस्वी, उच्चकुल में उत्पन्न, रूपयौवन शोभासम्पन्न उत्साही, चतुर, प्रजाओं में अनुरागपूर्ण, तेजस्वी, वाक्चतुर और शीलवान् होता है। जैसे—
त्यागो कृती कुलीनः सुश्रीको रूपयौवनोत्साही ।
दक्षोऽनुरक्तलोकस्तेजो वैदग्ध्यशीलवान्नेता ॥
विदूषक— नाटक का विदूषक कुसुम, वसन्त आदि नामवाला होता है। वह अपने कार्य, शरीर, वेश, भाषा आदि के द्वारा हास्योत्पादक, कलहप्रेमी तथा स्वकर्मज्ञ मधुर भोजन आदि का इच्छुक होता है—
कुसुमवसन्ताद्यभिधः कर्मवपुर्वेशभाषाद्यैः ।
हास्यकरः कलहरतिर्विदूषकः स्यात् स्वकर्मज्ञः ॥
कञ्चुकी— कञ्चुकी उस कार्यकुशल व्यक्ति को कहते हैं, जो जाति से ब्राह्मण वृद्ध सर्वगुणसम्पन्न एवं कार्यकुशल हो। राजा के अन्तःपुर में नियुक्त प्रबन्धक कञ्चुक पहनता है। अतः उसे कञ्चुकी कहते हैं। भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में कञ्चुकी की यह परिभाषा दी है—
अन्तःपुरचरो वृद्धो विप्रो गुणगणान्वितः ।
सर्वकार्यार्थकुशलः कञ्चुकीत्यभिधीयते ॥
विश्वनाथ कविराज ने कहा है कि कञ्चुकी रनिवास का संरक्षक वह वृद्ध व्यक्ति होता है जो सत्यवादी कामदोषरहित, व्यवहार कुशल तथा विवेकशील पुरुष हो—
ये नित्यं सत्यसम्पन्नाः कामदोषविवर्जिताः ।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नाः कञ्चुकीयास्तु ते मताः ॥
कथावस्तु या इतिवृत्त— कथावस्तु या इतिवृत्त उसे कहते हैं, जो रूपकों का भेदक हो। कथावस्तु दो प्रकार की होती है (१) आधिकारिक (२) प्रासङ्गिक। आधिकारिक कथावस्तु मुख्य होती है तथा प्रासङ्गिक गौण, कहा भी है—
इत्याद्यशेषसित वस्तुविभेदजातं रामायणादि च विभाव्य बृहत्कथाञ्च ।
आसूत्रयेत्तदनु नेतृरसानुगुण्यां चित्रां कथामुचितचारु वचः प्रपञ्चे ॥
भरतवाक्यम्— भरतवाक्य संस्कृत साहित्य में नाटकों के अन्त में आने वाले इस पद्य के लिए प्रयुक्त होता है, जिसमें राष्ट्र की गौरवपूर्ण सर्वविध समृद्धि के निमित्त किसी नाटकीय पात्र के द्वारा सामाजिकों की शुभाशंसा की जाती है। नाट्यशास्त्र के प्रणेता भरतमुनि के प्रति सम्मान प्रदर्शनार्थ ही इस अन्तिम पद्य को भरतवाक्य कहा जाता है। अथवा नाटक के किसी नटविशेष भरत की उक्ति होने के कारण इसे भरतवाक्य कहते हैं।