अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 517, कुल 540 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्टम्
४३५
अपवारितम्—अन्य व्यक्तियों की ओर मुँह फेर कर किसी पात्र विशेष के प्रति जो किसी गुप्त रहस्य का प्रकाशन किया जाता है उसे अपवारित कहते हैं। इसकी परिभाषा विश्वनाथ भट्टाचार्य ने अपने साहित्यदर्पण में इस प्रकार की है—
..............................तद्भवेदपवारितम् ।
रहस्यं तु यदन्यस्य परावृत्य प्रकाश्यते ॥
और नाट्यदर्पण में लिखा है कि जो बात पात्र विशेष से छिपाकर अन्य पात्रों से कही जाती है उसे अपवारित कहते हैं—
रहस्यं कथ्यतेऽन्यस्य परावृत्यापवारितम् ।
पूर्वरङ्ग—नाटकीय कला की अवतारणा से पहले नटवृन्द रङ्गभूमि के विघ्नों को दूर करने के निमित्त जो कुछ भी करते हैं उसे पूर्वरङ्ग कहते हैं। विश्वनाथ भट्टाचार्य ने साहित्यदर्पण के छठे परिच्छेद में पूर्वरङ्ग की परिभाषा इस प्रकार की है—
यन्नाट्यवस्तुनः पूर्वं रङ्गविघ्नोपशान्तये ।
कुशीलवाः प्रकुर्वन्ति पूर्वरङ्गः स उच्यते ॥
अङ्क—नाटक की पूरी घटनाओं के विकास को कई भागों में विभक्त कर देने पर प्रत्येक भाग को अङ्क कहते हैं। प्रत्येक अङ्क में नायक तथा नायिका आदि पात्रों के चरित्र का प्रदर्शन होता है और प्रत्येक अङ्क में एक ही रस की प्रधानता होती है—
अङ्क इति रूढशब्दो भावैश्च रसैश्च रोहयत्यर्थान् ।
नानाविधानयुक्तो यस्मात्तस्माद् भवेदङ्कः ॥
अर्थप्रकृतियाँ और सन्धियाँ—नाटक में प्रधान कथावस्तु नायक का कोई न कोई लक्ष्य होता है उसे ही फल कहते हैं। उस फल की सिद्धि के उपाय ही अर्थप्रकृतियाँ हैं। ये पाँच हैं, बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य। अर्थप्रकृतियों के साथ सम्बन्ध होने पर सन्धियों का उद्भव होता है सन्धियाँ भी पाँच होती हैं—मुखसन्धि, प्रतिमुखसन्धि, गर्भसन्धि, अवमर्ष-सन्धि तथा उपसंहार—
अर्थप्रकृतयः पञ्च पञ्चावस्थासमन्विताः ।
यथासंख्येन जायन्ते मुखाद्या पञ्चसन्धयः ॥
मुख-प्रतिमुखे गर्भः सावमर्शोपसंहृतिः ।
बिन्दु—जहाँ किसी दूसरी कथा से विच्छिन्न हो जाने पर इतिवृत्त को जोड़ने एवं आगे बढ़ाने में जो कारण होता है, वह बिन्दु कहलाता है। यह अच्छेद कारण बिन्दु वृत्त में आगे जाकर ठीक वैसे ही प्रसारित होता है जैसे तेल की बूँद पानी में फैल जाती है। इसीलिए इसे बिन्दु कहते है—
अवान्तरार्थविच्छेदे विन्दुरच्छेदकारणम् ।
बीज—नाटक के आरम्भ में सल्पकूप से सङ्केतित वह तत्त्व जो नाटक के फल के कारण है और इतिवृत्त में अनेक रूप से पल्लवित होता है, उसे बीज कहते हैं। अल्प रूप में निर्दिष्ट हेतु बीज वृत्त के फल का साधक है और वृक्ष के बीज के समान पल्लवित होकर अनेक शाखी वृक्ष की तरह वृक्ष के रूप में बढ़ता है—