अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ
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| ४३८ | अभिज्ञानशाकुन्तलम् |
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| कुतो धर्मक्रियाविघ्नः | ५।१४ | त्वन्मतिः केवला | ६।३२ |
| कुमुदान्येव शशाङ्कः | ५।२८ | त्वमर्हतां प्राग्रसरः | ५।१५ |
| कुल्याम्भोभिः पवन० | १।१५ | त्वमसि मया चूताङ्कुर | ६।३ |
| कृतं न कर्णार्पित० | ६।१८ | द | |
| कृताभिमर्शामनु० | ५।२० | दर्भाङ्कुरेण चरणः | २।१२ |
| कृता शरव्यं हरिणा | ६।२९ | दर्शनसुखमनुभवतः | ६।२१ |
| कृत्योर्भिन्नदेशत्वाद् | २।१७ | दिष्ट्या शकुन्तला | ७।२९ |
| कृष्णसारे ददच्चक्षु | १।६ | दुष्यन्तेनाहितं | ४।४ |
| क्व वयं क्व परोक्ष० | २।१८ | न | |
| क्षामक्षामकपोल० | ३।७ | न खलु न खलु | १।१० |
| क्षौमं केनचिदिन्दु० | ४।४ | न नमयितुमधिज्य० | २।३ |
| ग | नापेक्षितो गुरुजन | ५।१६ | |
| गच्छति पुरः शरीरं | १।३३ | नियमयसि विमार्ग० | ५।८ |
| गान्धर्वेण विवाहेन | ३।२० | नीवाराः शुकगर्भ० | १।१४ |
| गाहन्तां महिषा | २।६ | नैतच्चित्रं यदय० | २।१५ |
| ग्रीवाभङ्गाभिरामं | १।७ | प | |
| च | परिग्रहबहुत्वेऽपि | ३।१७ | |
| चलापाङ्गां दृष्टि | १।२३ | पातुं न प्रथमं | ४।८ |
| चित्रे निवेश्य | २।९ | पुत्रस्य ते रणशिर० | ७।२६ |
| चूतानां चिरनिर्गता | ६।४ | पृष्टा जनेन सम० | ३।८ |
| ज | प्रजाः प्रजाः स्वा इव | ५।५ | |
| जन्म यस्य पुरोर्वंशे | १।१२ | प्रजागरात् | ६।२२ |
| जाने तपसो वीर्यं | ३।२ | प्रत्यादिष्टविशेष० | ६।६ |
| ज्वलति चलितेन्धनो | ६।३१ | प्रथमं सारङ्गाक्ष्या | ६।७ |
| त | प्रथमोपकृतं मरुत्वतः | ७।१ | |
| तत्साधुकृतसन्धानं | १।११ | प्रलोभ्यवस्तुप्रणय० | ७।१६ |
| तदेषा भवतः कान्ता | ५।२६ | प्रवर्ततां प्रकृति० | ७।३५ |
| तपति तनुगात्रि | ३।१४ | प्राणानामनिलेन | ७।१२ |
| तव कुसुमशरत्वं | ३।३ | प्राहुर्द्वादिशधा | ७।२७ |
| तव न जाने हृदयं | ३।१३ | ब | |
| तव भवतु | ७।३४ | बल्मीकाग्रनिमग्न | ७।११ |
| तव सुचरित० | ६।११ | बाष्पेण प्रतिषिद्धेऽपि | ७।२३ |
| तवास्मि गीतरागे | १।५ | भ | |
| तस्याः पुष्पमयी | ३।२३ | भवनेषु रसाधिकेषु | ७।२० |
| तीव्राघातप्रतिहत० | १।२२ | भवन्ति नम्रास्तरवः | ५।१२ |
| तुरगखुरहत० | १।३१ | भव हृदय साभिलाषं | १।२७ |
| त्रिस्रोतसं वहति | ७।६ | भानुः सकृद्युक्त० | ५।४ |