अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
| भूत्वा चिराय | ४।१९ | वैखानसं किमनया | १।२६ |
| म | व्यपदेशमाविलयितुं | ५।२१ | |
| मनोरथाय नाशंसे | ७।१३ | श | |
| मय्येव विस्मरण० | ५।२३ | शक्यमरविन्दसुरभिः | ३।४ |
| महत्तस्तेजसो | ७।१५ | शमप्रधानेषु तपोधनेषु | २।७ |
| महाभागः कामं | ५।१० | शममेष्यति मम | ४।२० |
| मानुषीषु कथं वा | १।२५ | शान्तमिदमाश्रमपदं | १।१६ |
| मुक्तेषु रश्मिषु | १।८ | शापादसि प्रतिहता | ७।३२ |
| मुनिसुताप्रणय० | ६।८ | शुद्धान्तदुर्लभमिदं | १।१७ |
| मुहुरङ्गुलिसंवृता० | ३।२२ | शुश्रूषस्व गुरून् | ४।१७ |
| मूढः स्यामहमेषा वा | ५।२९ | शैलानामवरोहतीव | ७।८ |
| मेदश्छेदकृशोदरं | २।५ | स | |
| मोहान्मया सुतनु | ७।२५ | संकल्पितं प्रथममेव | ४।१२ |
| य | संदष्टकुसुमशयना० | ३।१५ | |
| यथा गजो नेति | ७।३१ | संरोपितेऽप्यात्मनि | ६।२४ |
| यदालोके सूक्ष्मं | १।९ | सख्यस्ते स किल | ६।३० |
| यदि यथा वदति | ५।२७ | सतीमपि ज्ञाति० | ५।१७ |
| यदुत्तिष्ठति वर्णेभ्यो | २।१३ | सरसिजमनुविद्धं | १।२० |
| यद्यत् साधु न | ६।१४ | सहजं किल | ६।१ |
| ययातेरिव शर्मिष्ठा | ४।६ | साक्षात् प्रियामुप० | ६।१६ |
| यस्य त्वया व्रण० | ४।१३ | सा निन्दन्ती | ५।३० |
| यात्येकतोऽस्तशिखरं | ४।२ | सायन्तने सवनकर्मणि | ३।२४ |
| या सृष्टिः स्रष्टुराद्या | १।१ | सिध्यन्ति कर्मसु | ७।४ |
| यास्यत्यद्य शकुन्तलेति | ४।५ | सुखपरस्य हरे० | ७।३ |
| येन येन वियुज्यन्ते | ६।२३ | सुतनु हृदयात् | ७।२४ |
| यो हनिष्यति | ६।२८ | सुभगसलिला० | १।३ |
| र | सुरयुवतिसंभवं | २।८ | |
| रथेनानुद्धात० | ७।३३ | स्तनन्यस्तोशीरं | ३।६ |
| रम्यं द्वेष्टि यथा | ६।५ | स्त्रीणामशिक्षित० | ५।२२ |
| रम्याणि वीक्ष्य | ५।२ | स्निग्धं वीक्षित० | २।२ |
| रम्यान्तरः कमलिनी | ४।१० | स्मर एव तापहेतुः | ३।९ |
| रम्यास्तपोधनानां | १।१३ | स्मृतिभिन्नमोहो० | ७।२२ |
| व | स्रस्तांसावतिमात्र० | १।२९ | |
| वसने परिधूसरे | ७।२१ | स्वप्नो नु माया | ६।१० |
| वाचं न मिश्रयति | १।३० | स्वसुखनिरभिलाषः | ५।७ |
| विचिन्तयन्ती यमनन्य० | ४।१ | स्वायंभुवान्मरीचेर्यः | ७।९ |
| विच्छित्तिशेषैः | ७।५ | स्विन्नाङ्गुलि० | ६।१५ |