अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना
1. उपोद्घात
कवि कालिदास का अभिज्ञानशकुन्तल नाटक न केवल संस्कृत नाट्य-साहित्य में उत्तमोत्तम सर्जन है, किन्तु विश्वनाट्य साहित्य में भी वह प्रथम पङ्क्ति में विराजमान है। यह नाटक श्रेष्ठ एवं सर्वाधिक लोकप्रिय होने से रङ्गमञ्च पर भी उसकी प्रस्तुति बार बार होती रही है। किन्तु इसी कारण से उसके मूलपाठ में भी निरन्तर बहुविध परिवर्तन होते रहे हैं। परिणामतः आज भारत देश की विभिन्न लिपियों में लिखी गयी पाण्डुलिपियों में संचरित हुआ इस नाट्यकृति का पाठ दो पाठपरम्पराओं में प्रवाहित हुआ मिलता है। (1) बृहद् पाठ एवं (2) लघु पाठ। पहली, बृहद् पाठपरम्परा की तीन या चार वाचनायें मिलती हैं। जैसे- 1. बंगाली 2. मैथिली, 3. काश्मीरी और 4. उत्कलीय। दूसरी, लघु पाठपरम्परा की दो वाचनायें दिखती हैं-5. देवनागरी, एवं 6. दाक्षिणात्य। (इन पाँचों वाचनाओं को रंगावृत्तियों के रूप में भी देख सकते हैं। मंचन के दृष्टिकोण से देखा जाय तो बृहत्पाठवाला नाटक अभिज्ञानशकुन्तल नाम से प्रचलित हुआ है तथा लघुपाठवाला अभिज्ञान-शाकुन्तल नाम से प्रचलित हुआ है। इस नाटक की द्विविध पाठपरम्पराओं पर टीकाकारों ने जब टीका-टिप्पण लिखे तब उन्होंने अलग अलग प्रान्त में प्रचलित पाठपरम्परा को अपने सामने रखा। अतः इन टीका-टिप्पणादि का सम्बन्ध भी किन किन वाचनाओं के साथ है वह भी ज्ञातव्य है। प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कहा जाता है कि (1) बंगाली वाचना पर दो टीकायें लिखी गयी हैं:-(क) चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की “सन्दर्भदीपिका” टीका, जिसकी समीक्षितावृत्ति आपके हाथ में है। यह प्रथम बार प्रकाशित हो रही है। (ख) न्यायाचार्य की “रसिकमनोरमा” नामक टीका, जिसके सम्पादन का कार्य अभी चल रहा है। (2) मैथिली पाठ पर शङ्कर की “रसचन्द्रिका” एवं नरहरिकृत “अभिज्ञानशकुन्तलटिप्पणी”, जो मिथिला विद्यापीठ, (सन् 1957 में) दरभङ्गा से प्रकाशित हुई है। (3) काश्मीरी पाठ पर किसी ने टीका लिखी है या नहीं उसकी कोई सूचना नहीं है। (4) उत्कलीय पाठ (जिसको स्वतन्त्र पाठपरम्परा कहना मुश्किल है, उस) पर एक आधुनिक टीका मिलती है, जिसके रचयिता हैं श्रीनवकिशोरकर शास्त्री, वाराणसी। (5) देवनागरी पाठ पर राघवभट्ट ने एक टीका लिखी है, जिसका नाम “अर्थद्योतनिका” है और (6) जो दाक्षिणात्य पाठ है, उस पर अनेक