अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें2 चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकया समलङ्कृतम्
टीकाएँ उपलब्ध होती हैं। जैसे 1. काटयवेम की “कुमारगिरिराजीया” नामक टीका, 2. अभिराम की “दिङ्मात्रदर्शना” व्याख्या, 3. श्रीनिवासाचार्य की “शाकुन्तलव्याख्या”, 4. घनश्याम की “सञ्जीवन-टिप्पण”, 5. अज्ञातकर्तृक “चर्चा” टीका, 6. नीलकण्ठ दीक्षित की टीका, 7. नारायण पण्डित की “प्राकृत-विवृति” टीका इत्यादि।।
अभिज्ञानशकुन्तल की पाँचों वाचनाओं में से बंगाली वाचना का पाठ ही डॉ० रिचार्ड पिशेल के द्वारा सर्व प्रथम “समीक्षित-पाठ” के रूप में प्रकाशित हुआ था। तथा डॉ० दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने दुबारा इसी तरह का कार्य प्रस्तुत किया है। जिसमें उन्होंने तीन काश्मीरी पाण्डुलिपियों का भी विनियोग किया है। डॉ० काञ्जीलाल ने यह सयुक्तिक सिद्ध किया है कि अभिज्ञानशकुन्तल की सभी वाचनाओं में से बंगाली वाचना का पाठ ही प्राचीनतम है। तथापि इस वाचना के पाठ पर लिखी गयी दो टीकाओं में से एक भी टीका को प्रकाशित होने का सौभाग्य नहीं मिला था। अतः बंगाली पाण्डुलिपियों में प्रवाहित हुए इस नाटक के पाठ पर लिखी गयी चन्द्रशेखर चक्रवर्ती (ईसा की 16वीं शताब्दी) की इस “सन्दर्भदीपिका” टीका का प्रकाशन-कार्य चिरकाल से अभिलषित था। प्रस्तुत प्रकाशन से वह सम्पन्न हो रहा है।
2. टीका-ग्रन्थों के प्रकाशन की उपयोगिता
संस्कृत काव्य-साहित्य की विभिन्न कृतियों पर बहुत प्राचीन समय से टीका-टिप्पण-व्याख्यादि का प्रणयन होता रहा है। काव्य-सर्जन की प्रक्रिया के साथ साथ टीकाओं का प्रणयन होना भी स्वाभाविक ही है। क्योंकि सरस्वती का प्रथम उन्मेश कारयित्री प्रतिभा के रूप में प्रकट होता है, तथा दूसरा उन्मेश भावयित्री प्रतिभा के रूप में उदित होता है। जिसको आनन्दवर्धन ने “सरस्वत्यास्तत्त्वं कवि-सहृदयाख्यं विजयते।” इन शब्दों से कहा है। इस तरह साहित्य-जगत् में काव्यकृतियों के अनुज के रूप में टीका-ग्रन्थों का मूल्य भी महत्त्वपूर्ण है। इन टीका-ग्रन्थों के सहारे हम काव्यसौन्दर्य को पाने के लिए कदाचित् विशेष रूप से सक्षम हो सकते हैं। किन्तु आधुनिक युग में, काव्यकृतियों के रसास्वाद में सहायक ग्रन्थों के रूप में टीका-ग्रन्थों का मूल्य यथावत् रहते हुए भी क्योंकि हमारा एक दूसरे दृष्टिकोण से भी इनका महत्त्व बहुत अधिक प्रतीत होने लगा है। संस्कृत साहित्य ईसा पूर्व से चला आ रहा है और उसके पाठसंचरण का इतिहास अन्धेरे में होने से कवियों के द्वारा प्रणीत इन काव्यों के मूल पाठ का निर्धारण करना ही “इदं प्रथमतया” कर्तव्य बन गया है। पाण्डुलिपियों में सुरक्षित रहा पाठ तो दो सौ या तीन सौ साल से अधिक पुराना नहीं होता है क्योंकि पाण्डुलिपियाँ भूर्जपत्र या ताडपत्र, कागजादि जैसे अस्थाई फलक पर लिखी होने से उसके पुनर्लेखन/ प्रतिलिपिकरण की बार बार आवश्यकता रहती है। जिसके कारण आज उपलब्ध होनेवाली प्रायः सभी पाण्डुलिपियाँ दो सौ, तीन सौ साल से अधिक पुरानी नहीं होती हैं। अब पाठ-सम्पादक जब किसी भी एक-कर्तृक हो ऐसे काव्य के मूल पाठ